धूप ढलने लगी थी जब सुलैमान यरूशलेम की ऊँची दीवारों से नीचे उतरा। उसके पिता दाऊद का नगर अब उसकी गद्दी थी, पर आज उसका मन भारी था। राजमहल की ठंडी पत्थर की सीढ़ियों पर उसकी परछाई लंबी पड़ रही थी। सेनापति, याजक, मंत्री – सब उसके निर्णय की प्रतीक्षा में थे, पर सुलैमान जानता था कि जिस फैसले की ज़रूरत है, वह मनुष्य की समझ से परे है।
अगले दिन, भोर के धुंधलके में ही काफिला चल पड़ा। गिबोन का रास्ता धूल भरा और टेढ़ा-मेढ़ा था। सुलैमान रथ पर नहीं, बल्कि एक साधारण खच्चर पर सवार था। उसके साथ केवल कुछ विश्वस्त पुरुष और याजक थे। रास्ते में जब वे जैतून के पुराने पेड़ों के पास से गुज़रे, तो उसे अपने पिता की बात याद आई – “परमेश्वर का भय मूर्खता की दवा है।” पर आज वह दवा माँगने जा रहा था।
गिबोन पहुँचते-पहुँचते सूरज चढ़ आया था। वह उच्च स्थान, जहाँ परमेश्वर की भेंट की तम्बू खड़ी थी, एक विस्तृत मैदान में स्थित था। हवा में चमड़े और लकड़ी की गंध मिली हुई थी। वहाँ मूसा के समय की वह पुरानी तम्बू, जिसमें परमेश्वर की उपस्थिति निवास करती थी, खड़ी थी। दाऊद ने उसकी देखभाल के लिए यहाँ याजक नियुक्त किए थे। सुलैमान ने उस तम्बू को देखा – उसका बैंगनी और लाल कपड़ा धूप में फीका पड़ चुका था, पर उसकी महिमा अभी भी बाकी थी।
उसने आदेश दिया। सैकड़ों बैल, भेड़-बकरियाँ लाई गईं। याजकों ने तैयारी की। सुलैमान स्वयं अपने हाथों से लकड़ियाँ सजाता रहा। यह कोई दिखावे का बलिदान नहीं था। हर पशु के चढ़ाने के साथ, उसका मन एक प्रार्थना उड़ेलता – “मैं नहीं जानता। मुझे सिखा।”
शाम होते-होते, पूरा मैदान धुएँ से ढक गया। आग की लपटें अँधेरे में टिमटिमा रही थीं। थककर चूर, पर शांत मन से सुलैमान तम्बू के पास गया। उस रात, वहीं, एक साधारण खटिया पर सोया।
और फिर स्वप्न आया।
कोई दैदीप्यमान दृश्य नहीं, कोई ज़ोर की आवाज़ नहीं। बस एक ज्ञात सी उपस्थिति, जैसे कोई पिता सोते हुए बेटे के बिस्तर के पास खड़ा हो। और एक प्रश्न, जो हवा में नहीं, बल्कि उसके भीतर उभरा – “माँग, मैं तुझे क्या दूँ?”
सुलैमान की आँखें खुल गईं। अँधेरा था, पर तम्बू में एक कोमल प्रकाश सा भरा हुआ था। उसने उत्तर दिया, पर ऊँचे स्वर में नहीं, बल्कि उस शांति में जो उसने कभी अनुभव नहीं की थी।
“तूने मेरे पिता दाऊद के साथ बड़ी करुणा दिखाई, और अब मुझे उसकी गद्दी पर बैठाया है। पर मैं तो एक बालक हूँ, मैं नहीं जानता कि इस भारी जन समुदाय का नेतृत्व कैसे करूँ। मुझे बुद्धि और ज्ञान दे, ताकि मैं तेरी प्रजा में न्याय कर सकूँ।”
एक क्षण की मौन गूँज। फिर वही आंतरिक स्वर उभरा, पर अब करुणा से भरा हुआ।
“क्योंकि तूने यह माँगा है, धन-दौलत, संपत्ति या शत्रुओं का वध नहीं, बल्कि अपने लिए बुद्धि न्याय करने को, इसलिए देख, मैं तुझे बुद्धि और ज्ञान तो दूँगा ही, पर साथ ही वह धन-दौलत और कीर्ति भी दूँगा, जो तूने नहीं माँगी। और यदि तू मेरे मार्गों पर चलेगा, जैसे तेरे पिता दाऊद चला, तो मैं तेरे दिन भी बढ़ाऊँगा।”
सुबह जब सुलैमान की आँख खुली, तो धुआँ हट चुका था और हवा साफ थी। उसका मन एक अजीब शांति से भरा था – जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो। वह जानता था कि यह केवल स्वप्न नहीं था। जिस तरह एक प्यासे की जीभ पानी का स्वाद पहचान लेती है, उसी तरह उसकी आत्मा ने सत्य का स्वाद पहचान लिया था।
यरूशलेम लौटते समय उसके कदम हल्के थे। रास्ते में जब उसने देखा कि किसान अपने खेतों में हल चला रहे हैं, व्यापारी सौदा कर रहे हैं, बच्चे रास्ते में खेल रहे हैं, तो उसे एहसास हुआ कि अब उसकी ज़िम्मेदारी और गहरी हो गई है। ये सब उसकी प्रजा थे। उनके झगड़े, उनकी आशाएँ, उनके दुख – अब उसकी समझ में आने थे।
राजमहल पहुँचकर उसने सबसे पहला काम यह किया कि महल के बीचों-बीच एक आँगन में एक साधारण सी कुर्सी रखवाई। वहीं बैठकर वह लोगों की फरियाद सुनता। पहले मामले ही ऐसे आए जो पेचीदा थे। दो औरतें एक जीवित शिशु पर दावा कर रही थीं। सबूत नहीं थे, गवाह नहीं थे। पुराने सुलैमान से शायद जल्दबाज़ी में फैसला सुनाते। पर नए सुलैमान ने एक क्षण रुककर, उस शांति को याद किया जो गिबोन की रात उसे मिली थी। फिर उसने तलवार मँगवाई और शिशु को दो टुकड़ों में बाँटने का आदेश दिया।
एक औरत बेख़बर थी, दूसरी की आँखों में आतंक उभर आया। और सुलैमान ने जान लिया। उसकी आवाज़ में दृढ़ता थी, पर क्रूरता नहीं। “शिशु जीवित है। इसे असली माँ को सौंपो।”
खबर फैली – राजा के भीतर दैवीय समझ है। लोग आश्चर्य करते। सुलैमान स्वयं आश्चर्य करता। वह जानता था कि यह उसकी बुद्धि नहीं थी। यह वह दवा थी जो उसने गिबोन के धुएँ और प्रार्थना के बीच माँगी थी। और उसे मिल गई थी। उस रात, अपने शयनकक्ष में, उसने खिड़की से बाहर तारों भरे आकाश को देखा। उसके पिता ने सच कहा था। परमेश्वर का भय – वह समझ कि हम कुछ नहीं जानते, और वह सब कुछ जानता है – ही सच्ची बुद्धि की शुरुआत है। और यह यात्रा अभी शुरू ही हुई थी।




