पवित्र बाइबल

पहाड़ों से बड़ा खजाना

वह दिन भी एक साधारण सा दिन था। पहाड़ियों की चोटियाँ सुबह की धुंध में डूबी हुई थीं, और हवा में गीली मिट्टी की महक थी। किशन लाल, जो अपने खेतों में फसल काटने जा रहा था, रुक गया। उसकी नज़र दूर, पश्चिम की ओर पहाड़ों में कट रही एक नई सड़क पर पड़ी। दिन-रात वहाँ धमाके होते रहते थे—पत्थर तोड़ने की आवाज़। लोगों की बस्ती से दूर, जहाँ जंगली बकरियाँ भी ठहरना पसंद नहीं करतीं, वहाँ इंसान पत्थरों का सीना चीर रहे थे।

किशन के मन में एक ख्याल कौंधा। उसके दादा जी कहा करते थे कि इन्हीं पहाड़ों की गहराइयों में, अंधेरी गुफाओं में, चमकती चीजें छिपी हैं। सोना, चाँदी, नीलम। उसने सुना था कि कैसे खनिक लोग पहाड़ों की जड़ें हिला देते हैं, रस्सियों से लटककर अंधेरे कुँओं में उतरते हैं, और नदियों के सूखे रास्तों को भी पलट डालते हैं। यह सब किस लिए? एक छोटे से टुकड़े के लिए, जो सूरज की रोशनी में टिमटिमाता है।

वह आगे बढ़ा, अपने खेत की मेड़ पर बैठ गया। नीचे घाटी में, एक छोटी सी धारा बह रही थी, जिसके किनारे कंकर-पत्थर चमक रहे थे। उसने सोचा—इंसान की महेनत कितनी अद्भुत है। अंधेरे को रोशन कर देता है, पत्थर को पिघला देता है, लोहे को काट देता है। पहाड़ों के हृदय तक पहुँचने का रास्ता बना लेता है। पर एक चीज है जो इस सब खुदाई, सब तलाश में नहीं मिलती।

किशन की यादों में वह बूढ़ा साधु आ गया, जो कभी-कभार गाँव आया करता था। एक बार उसने पूछा था—”बाबा, ये दुनिया कैसे चलती है? दुःख क्यों आते हैं? सही रास्ता कौन सा है?” साधु ने मुस्कुराते हुए कहा था, “बेटा, बुद्धि की खान तो हर जगह है, पर उसकी चाबी हर किसी के पास नहीं। समुद्र की गहराई भी कहती है, ‘मेरे पास नहीं।’ और मोती की खान भी कहती है, ‘मेरे यहाँ नहीं।'”

उस दिन शाम को, जब आकाश में सूरज लोहित हो रहा था, किशन अपने घर लौटा। उसकी पत्नी ने आँगन में दीया जलाया। दीपक की लौ हवा में हिल रही थी, और उसके चारों ओर एक कोमल प्रकाश का घेरा था। उसे अचानक वह श्लोक याद आया, जो उसने किसी धर्मग्रंथ में पढ़ा था—”बुद्धि का मूल्य माणिक्य से भी अधिक है। उफ्रात नदी के मोती भी उसके बराबर नहीं हो सकते।”

वह बाहर चबूतरे पर बैठ गया। रात का अंधेरा घिर आया था, और आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। उसने सोचा—हम इंसान कितने अद्भुत हैं। हम पक्षियों की नज़र से भी दूर का रास्ता बना लेते हैं, शेर के शिकारी बच्चों को भी नहीं दिखने वाले रास्तों से गुज़र जाते हैं। पहाड़ों को काट देते हैं, नदियों का रुख मोड़ देते हैं। पर जब जीवन के गहरे सवाल आते हैं—इस सबका क्या अर्थ है? क्यों जन्म, क्यों मृत्यु, क्यों दुःख?—तो हमारे सारे उपकरण, हमारी सारी ताकत बेकार हो जाती है।

एक ठंडी हवा का झोंका आया। किशन ने अपनी चादर ऊपर खींच ली। उसके मन में शांति थी, एक गहरी समझ। वह जान गया था कि बुद्धि बाजार में खरीदने की चीज़ नहीं है, न ही वह पहाड़ों की गहराइयों में दबी है। वह तो वायु में विचरती है, समुद्र की लहरों में गूंजती है, पर उसका स्रोत कहीं और है।

उसने आकाश की ओर देखा। तारे चमक रहे थे, मानो कोई अनंत ज्ञान उनमें से टपक रहा हो। और फिर वह बात उसके हृदय में उतर आई, जैसे कोई मधुर स्वर—”परमेश्वर ही बुद्धि का स्रोत है। उसी ने हवा का वजन तौला, पानी को नापा, वर्षा के लिए विधान बनाया, और बिजली के मार्ग तय किए। मनुष्य के लिए उसने कहा—’प्रभु का भय ही बुद्धि है, और बुराई से दूर रहना ही समझ है।'”

दीपक की लौ अब स्थिर हो गई थी। अन्दर से उसके बच्चों की हँसी आ रही थी। किशन लाल ने एक गहरी सांस ली। उसे कोई खजाना नहीं मिला था, कोई चमकता पत्थर नहीं। पर उसे एक शांति मिली थी, एक ज्ञान, जो सोने-चाँदी से कहीं अधिक मूल्यवान था। वह उठा, और अपने घर के अंधेरे द्वार से होता हुआ, उस प्रकाश की ओर चल पड़ा, जो अन्दर उसके परिवार का इंतज़ार कर रहा था। रात के सन्नाटे में, पहाड़ों से पत्थर तोड़ने की आवाज़ आनी बंद हो गई थी। केवल तारे चमक रहे थे—मौन, गहरे, और अथाह ज्ञान से भरे हुए।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *