यह बात उस समय की है जब यरूशलेम अब भी उजड़े हुए शहर की तरह पड़ा था। हवा में ईंटों का सफेद धूल-सा महीन चूर्ण उड़ता रहता, और बचे-खुचे खंडहरों के बीच झाड़ियाँ उग आई थीं। जकर्याह उस शाम अपने आवास की छत पर खड़ा हवा के झोंकों को महसूस कर रहा था। उसके चेहरे पर यातना के वर्षों की थकान थी, पर आँखों में एक अधीर प्रश्न भी था। वह जानता था कि यहोवा ने उसके पूर्वजों से बात की थी, पर अब सन्नाटा था—एक गहरा, भारी सन्नाटा।
तभी अचानक, उसे ऐसा लगा जैसे हवा का रुख बदल गया हो। नीचे की घाटी में, जहाँ एक समय घने पेड़ हुआ करते थे, अब केवल कुछ दुर्बल झाड़ियाँ और एकाकी पेड़ दिखाई देते थे। उन्हीं के बीच, उसने एक असामान्य दृश्य देखा। घने हरे पत्तों वाली एक छोटी सी दाखलता नहीं, बल्कि मर्दारू के पेड़ों का एक समूह था, जिनकी पत्तियाँ हल्की हवा में मंद रूप से हिल रही थीं। और उन पेड़ों के नीचे, कुछ आकृतियाँ थीं—घोड़ों पर सवार। उनका रंग अलग-अलग था: एक लाल, एक भूरा, एक सफेद। वे चुपचाप खड़े थे, मानो प्रतीक्षा कर रहे हों।
जकर्याह की साँस रुक गई। उसने पूछना चाहा, “प्रभु, यह क्या है?” पर शब्द उसके गले में अटक गए। तभी, उसने एक व्यक्ति को देखा जो उन घोड़ों के पीछे खड़ा था। उसका वस्त्र साधारण नहीं लग रहा था, और चेहरे पर एक अद्भुत प्रकाश था। जकर्याह समझ गया—यह कोई दूत था।
वह दूत धीरे से बोला, “ये वे हैं जिन्हें यहोवा ने पृथ्वी पर घूमने के लिए भेजा है।”
घोड़े चुपचाप आगे बढ़े, और सवारों ने अपनी टकटकी जकर्याह पर जमा दी। तभी लाल घोड़े पर सवार ने आवाज़ दी, जो हवा में गूंजती हुई लग रही थी, “हमने सारी पृथ्वी का भ्रमण किया है, और देखा है कि सब शांत और निश्चिंत है।”
यह सुनकर जकर्याह के मन में एक वेदना उठी। शांति? जब उसका अपना लोग दर्द और अपमान में जी रहा था? उसने दूत की ओर देखा, जो मानो उसके विचारों को पढ़ रहा हो। दूत ने हाथ उठाया और यहोवा के दूत से बात करने लगा, जो अचानक उन मर्दारू के पेड़ों के बीच प्रकट हुआ था।
यहोवा के दूत ने एक गहरी, करुणामयी आवाज़ में कहा, “हे सेनाओं के यहोवा, तू कब तक यरूशलेम और यहूदा के नगरों पर दया नहीं दिखाएगा, जिन पर तूने इस सत्तर वर्ष से क्रोध किया है?”
तभी, यहोवा के दूत ने जकर्याह से कहा, “तू यह कह दे कि सेनाओं के यहोवा यों कहता है: मैं यरूशलेम के लिए, और सिय्योन के लिए, बड़ी ईर्ष्या करता हूँ। और जिन जातियों से मैं कुछ क्रोधित था, उन पर मैं अब भी क्रोधित हूँ, क्योंकि उन्होंने इस दुःख को बढ़ाया है।”
हवा में एक गर्म झोंका आया, मानो उन शब्दों में अग्नि समाई हो। जकर्याह ने देखा कि यहोवा के दूत ने मापने का एक सुनहरा डोरा निकाला है। वह बोला, “यरूशलेम फिर बसेगा। उसकी सड़कें चौड़ी होंगी, और उसकी दीवारों में फिर जीवन की गूंज होगी। यहोवा अपने लोगों को दिलासा देगा।”
पर इतना कहने के बाद, उसकी आवाज़ गम्भीर हो गई, “लेकिन सुन, जातियाँ जो अब सुखपूर्वक रह रही हैं, उनके नगर उजाड़े जाएँगे। जिन्होंने तुम्हें दुःख दिया, उन्हें भी दुःख भोगना पड़ेगा।”
दृश्य धीरे-धीरे धुँधला पड़ने लगा। मर्दारू के पेड़ों की छाया लम्बी हो गई, और घोड़े तथा सवार धुएँ की तरह विलीन होने लगे। जकर्याह अकेला खड़ा रहा, उसकी आँखों में अब भी उस दृश्य की झलक थी। उसने महसूस किया कि उसकी थकान कहीं गायब हो गई है। हवा अब भारी नहीं, बल्कि एक प्रतिज्ञा की सी हल्की लग रही थी।
वह धीरे-धीरे नीचे उतरा। अँधेरा घिर आया था, पर दूर, यरूशलेम के खंडहरों के पीछे, आकाश में पहला तारा टिमटिमा रहा था। जकर्याह ने एक गहरी साँस ली। प्रभु की आवाज़ फिर सुनाई देने लगी थी—चिल्लाहट नहीं, बल्कि एक फुसफुसाहट की तरह, जो उसकी आत्मा में उतर रही थी। वह जान गया कि अब सन्नाटा नहीं रहा। एक नई शुरुआत का संकेत आ चुका था, और वह इसका साक्षी था।




