पवित्र बाइबल

श्राप और निष्ठा के बीच राजा दाऊद

(यह कहानी 2 शमूएल अध्याय 16 की घटनाओं पर आधारित है, जिसे एक साहित्यिक वर्णनात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।)

धूप तेज थी, और जंगल के रास्ते की धूल दाऊद के जूतों में समा रही थी। यरूशलेम छूटे अब कई घंटे बीत चुके थे। उसके साथ चल रहे थे कुछ विश्वस्त सैनिक, उनके चेहरों पर थकान और अविश्वास का मिला-जुला भाव था। अपने ही बेटे अबशालोम से हारकर भागना… यह दाऊद के लिए एक अजीब तरह का सपना था, जिसमें वह फंसा हुआ था। हवा में उदासी का एक बोझ था, जो उनके कदमों को और भारी कर रहा था।

तभी रास्ते में एक जगह आई, जहां ऊंचाई पर एक गांव दिखाई दे रहा था। बहरिम नामक वह स्थान। वहां से एक आदमी तेजी से नीचे की ओर आता हुआ दिखा। उसने पुराने कपड़े पहन रखे थे, और उसके हाथों में कुछ चीजें थीं। जैसे-जैसे वह नजदीक आया, दाऊद ने पहचान लिया – शिमी, बिन्यामीन के गोत्र का, शाऊल के कुल का।

शिमी की आंखें चमक रही थीं, जैसे किसी ने उसमें आग लगा दी हो। वह रुका, और फिर अचानक एक तीखी, कर्कश आवाज निकालते हुए चिल्लाया, “दूर हो, दूर हो, हे खूनी! हे अधर्मी!”

दाऊद के सैनिकों ने तुरंत हाथ अपनी तलवारों पर रख दिए। अबीशय, जोवाब का भाई, गरजा, “यह मरा हुआ कुत्ता मेरे स्वामी राजा को इस तरह श्राप दे रहा है? मुझे आज्ञा दो, मैं इसका सिर धड़ से अलग कर दूं।”

लेकिन दाऊद ने एक हाथ उठाकर उसे रोक दिया। उसकी आंखों में कोई क्रोध नहीं था, बल्कि एक गहरा, दुखद आत्मचिंतन था। शिमी अब पत्थर फेंक रहा था, और धूल उड़ा रहा था, उसके शब्द छुरों की तरह चुभ रहे थे। “तूने शाऊल के घराने का सारा खून बहाया है, और इसलिए तुझे राज्य मिला! अब देख, यहोवा ने तेरा राज्य तेरे बेटे अबशालोम के हाथ में दे दिया है! तू खूनी है, इसलिए यह दुर्गति तुझे मिली है!”

एक पत्थर दाऊद के पास गिरा, धूल उसके राजसी, अब मैले हो चुके वस्त्रों पर जम गई। उसके सैनिक सांस रोके खड़े थे। फिर दाऊद ने धीरे से, एक थकी हुई आवाज में कहा, “छोड़ो, अबीशय। यहोवा ने ही उसे मेरे विरुद्ध यह कहने को कहा है। शायद यहोवा मेरे दुख को देखेगा, और मेरे आज के अपमान के बदले मुझे अच्छाई ही देगा।”

यह कहकर वह आगे बढ़ गया, शिमी के श्राप और पत्थरबाजी को पीछे छोड़ते हुए। उसके कदमों में एक अजीब सी गरिमा थी – हारा हुआ राजा, परन्तु अभी भी वह सब कुछ यहोवा की इच्छा मानकर सह रहा था।

रास्ता और दुर्गम होता गया। जब वे ओलों के पहाड़ की चोटी पर पहुंचे, तो सामने से एक और व्यक्ति आता दिखाई दिया। लेकिन इस बार दाऊद के चेहरे पर राहत की एक झलक दौड़ गई। यह हुशै अर्की था, उसका विश्वासपात्र मित्र, जिसे उसने अबशालोम के पास जासूसी करने के लिए यरूशलेम में ही छोड़ दिया था। हुशै के वस्त्र फटे हुए थे, और सिर पर धूल डाल रखी थी – शोक का प्रतीक।

दाऊद ने पूछा, “तू यहां कैसे, हुशै? तूने मेरे साथ नहीं आना चाहा था।”

हुशै ने सिर झुकाकर कहा, “नहीं, हे मेरे राजा। मैं उसी का हूं जिसे यहोवा और यहूदा की सभा और सब इस्राएली चुनें। मैं तेरे साथ रहूंगा। परन्तु मैं वापस लौटूंगा। अबशालोम को विश्वास दिलाना होगा कि मैं उसके पक्ष में हूं, ताकि मैं तेरी सभी योजनाओं को उसके यहां निष्फल कर सकूं। जिस याजकों के पास तूने संदेश भेजे हैं, सादोक और अब्यातार, उनके पुत्र वहीं हैं, मैं उनके द्वारा तुझे सब समाचार पहुंचाता रहूंगा।”

दाऊद ने हुशै के कंधे पर हाथ रखा। उस आंखों में आंसू थे, कृतज्ञता के। “जा,” उसने कहा, “और वह कर जो तू ठीक समझे।” और फिर हुशै वापस उसी रास्ते चला गया, जहां से आया था, जंगल की ओर।

दाऊद ने आगे बढ़ते हुए पीछे मुड़कर देखा। यरूशलेम दूर, धुंधला सा दिखाई दे रहा था। उसकी स्थिति अजीब थी – एक ओर शिमी का विषैला श्राप, जो उसके अतीत के पापों की याद दिला रहा था, और दूसरी ओर हुशै की निष्ठा, जो भविष्य की एक किरण की तरह थी। वह जानता था कि यहोवा का हाथ इन सब पर था। आज वह राजा नहीं, बल्कि एक पिता था, एक पश्चातापी प्राणी था, और एक मनुष्य था जो अपने परमेश्वर पर भरोसा किए हुए, अनिश्चितता के एक लंबे, धूल भरे रास्ते पर चल पड़ा था।

उसने अपने ओढ़ने का कोट और ऊपर कस लिया, और अपने थके हुए दल को आगे बढ़ने का संकेत दिया। सामने अभी लंबा सफर था।

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