यरूशलेम के पास एक छोटा-सा गाँव था, जो जैतून के पेड़ों की ढलानों से घिरा हुआ था। उस गाँव में एक कुम्हार रहता था, एलियाब नाम का। उसके हाथ मिट्टी से सने रहते, पर उसका मन हमेशा उन पहाड़ों की ओर उठता जो यरूशलेम को घेरे खड़े थे। सुबह-सुबह, जब सूरज की पहली किरणें सिय्योन की चोटी को सुनहरा कर देतीं, एलियाब अपनी झोंपड़ी के द्वार पर बैठकर चाक चलाने लगता। मिट्टी घूमती, उसकी उंगलियाँ आकार गढ़तीं, और उसका मन एक ही भजन को दोहराता—”जो यहोवा पर भरोसा रखते हैं, वे सदैव के लिए सिय्योन के पर्वत के समान हैं; जो हिल नहीं सकता, वह सदा बना रहता है।”
एक दिन, अचानक खबर फैली। उत्तर से एक सेना चली आ रही थी, लुटेरों की एक टोली, जो गाँव-दर-गाँव ध्वस्त करती हुई यरूशलेम की ओर बढ़ रही थी। गाँव में खलबली मच गई। कुछ लोग सामान बाँधकर पहाड़ियों में छिपने लगे। कुछ ने हथियार बनाने शुरू किए। एलियाब की पत्नी मीका ने डरे स्वर में कहा, “चलो, हम भी कहीं दूर चले जाएँ। यहाँ क्या रखा है? मिट्टी के ये बर्तन तो वे भी तोड़ देंगे।”
पर एलियाब चुपचाप अपना काम करता रहा। उसने एक नई डलिया मिट्टी निकाली, उसे गूंथा, और चाक पर रखकर घुमाने लगा। “मीका,” उसने धीरे से कहा, “सुन। जब मैं छोटा था, तब मेरे पिता कहा करते थे—यरूशलेम के चारों ओर यहोवा का घेरा है, जैसे ये पहाड़ इसे घेरे हैं। और जैसे ये पहाड़ हिलते नहीं, वैसे ही वह अपने लोगों की रक्षा करता है। यह डर, यह उथल-पुथल… यह तो बाहर की बात है। हमारा भरोसा तो उस पहाड़ जैसा अटल होना चाहिए।”
मीका ने आँखें पोंछीं, पर उसके मन की घबराहट शांत नहीं हुई। अगले कई दिन गाँव में एक सन्नाटा छाया रहा। आसमान में काले बादल मंडराने लगे, मानो प्रकृति भी आने वाले संकट को महसूस कर रही हो। फिर एक शाम, जब हवा में ठंडक बढ़ गई और दूर से धूल का एक बादल उठता दिखाई दिया, एलियाब ने अपने परिवार को इकट्ठा किया। उसने अपने दोनों बेटों—याकूब और नूह—को पास बैठाया।
“देखो,” उसने कहा, और उंगली से बाहर उन ऊँची पहाड़ियों की ओर इशारा किया, जो अब साँझ की लालिमा में रक्तिम दिख रही थीं। “वो सिय्योन का पर्वत। उस पर यहोवा का मंदिर। क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि वह पहाड़ हिल जाए? नहीं। हज़ारों वर्षों से वह वैसा ही खड़ा है। बाढ़ आई, भूकंप आए, युद्ध हुए… पर वह अडिग रहा। हमारा विश्वास वैसा ही होना चाहिए। डर हमारे आस-पास हो सकता है, जैसे कि ये घाटी इन पहाड़ों से घिरी है। पर हमारा जो भीतर है, वह हिलने वाला नहीं।”
रात ढलते-ढलते, लुटेरों का एक झुंड गाँव के द्वार पर आ धमका। उनकी मशालों की लपटों ने अंधेरे को डरावनी लाली में नहला दिया। वे चिल्लाते, द्वार खटखटाते। गाँव के कुछ युवकों ने प्रतिरोध करने की ठानी, पर एलियाब ने उन्हें रोक दिया। वह स्वयं आगे बढ़ा, उसके हाथ में कोई हथियार नहीं, बस एक छोटा सा मिट्टी का दीपक था, जिसे उसने उसी दिन बनाया था।
लुटेरों का सरदार, एक बड़े कद का आदमी जिसके चेहरे पर युद्ध के निशान थे, आगे बढ़ा। “तुम्हारे गाँव में सोना, चाँदी, अनाज… सब कुछ हमारा है,” वह गरजा।
एलियाब ने दीपक ऊपर उठाया। उसकी लौ ने उसके शांत चेहरे को रोशन किया। “हमारे पास वो सब है जो तुम ले सकते हो,” उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। “पर एक चीज़ है जो तुम नहीं ले जा सकते। वह है यहोवा का वह घेरा, जो इस गाँव और उस पर्वत के चारों ओर है, जैसे ये पहाड़ हमें घेरे हुए हैं।”
एक अजीब सी खामोशी छा गई। लुटेरा सरदार कुछ पल एलियाब को देखता रहा, फिर उसकी नज़र दूर अंधेरे में खड़े those विशाल, अटल पर्वतों पर गई, जो रात के आकाश में और भी विशाल और रहस्यमय लग रहे थे। किसी ने कहा नहीं, पर उस आदमी के चेहरे पर एक हल्का-सा भय दिखाई दिया, वह भय जो प्रकृति की उन शक्तियों को देखकर उत्पन्न होता है जो मनुष्य की समझ से परे हैं। उसने अपने साथियों को इशारा किया, और वे सब, बिना कुछ छुए, बिना किसी को नुकसान पहुँचाए, धीरे-धीरे गाँव से पीछे हट गए, और अंधेरे में विलीन हो गए।
सुबह होते ही गाँव वाले बाहर निकले। सब कुछ सही-सलामत था। एलियाब अपनी झोंपड़ी के सामने बैठा था, और उसके सामने चाक पर एक नया बर्तन घूम रहा था। मीका ने उसके पास आकर बैठकर कहा, “तुम सही कहते थे। हमारा भरोसा वाकई उस पहाड़ जैसा ही रहा।”
एलियाब ने मुस्कुराते हुए कहा, “भजनकार ने सच कहा है। वह दुष्टों का अंकुश उसी तरह बनाए रखेगा, जैसे ये पहाड़ हमें घेरे हैं। नहीं तो धर्मी भी अधर्म के हाथों में खेलने लगें।” उसने बर्तन को चाक से अलग किया और उसे धूप में सूखने के लिए रख दिया। “देखो, यह मिट्टी का पात्र। नाजुक है। टूट सकता है। पर जिसने इसे बनाया, उसने इसे एक आकार दिया है, एक उद्देश्य दिया है। हम भी वैसे ही हैं। बाहर से नाजुक, अशक्त। पर भीतर यहोवा का हाथ हमें सहारा देता है, एक आकार देता है। और वह हाथ, वह घेरा… वह कभी हटता नहीं।”
उस दिन के बाद, गाँव में कुछ बदल सा गया। लोगों की बातचीत में डर कम हुआ, एक गहरी शांति बढ़ी। एलियाब तो हर सुबह उन पहाड़ों को देखकर मुस्कुराता, और उसके हाथ मिट्टी को नए-नए रूप देते रहते। और जब भी कोई संकट की बात करता, वह बस इतना कहता, “याद रखो, हम सिय्योन के पर्वत के समान हैं। हिलने वाले नहीं। क्योंकि जो हमें घेरे हुए है, वह हमेशा से वैसा ही है, और हमेशा रहेगा।”
समय बीतता गया। पहाड़ वैसे ही खड़े रहे। और उनकी छाया में, एक छोटा-सा गाँव, एक साधारण कुम्हार, और एक अटल विश्वास की कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रही।




