पवित्र बाइबल

तीन युवक और बुद्धिमान बुजुर्ग

वह गाँव पहाड़ों की तलहटी में बसा था, जहाँ सुबह की धूप ओस से लदे खेतों को चाँदी की तरह चमकाती। एक तरफ़ नदी बहती, जिसका शोर दूर तक एक सतत प्रार्थना-सा लगता। इसी गाँव में रहता था विश्वासदास, एक बुजुर्ग, जिसकी दाढ़ी में चाँदी के धागे और आँखों में एक अद्भुत गहराई थी। वह अक्सर नीम के पेड़ के नीचे बैठकर लोगों की बातें सुनता, पर बोलता कम था। लोग कहते, वह नीतिवचन की पुरानी पोथी को जीता है।

उस समय गाँव में तीन युवक थे। पहला, अभिमान। वह सेठ रामलाल का इकलौता बेटा था। उसके कपड़े महँगे, बोली ऊँची, और विचार अपने ही घेरे में कैद। दूसरा, शांत। वह गाँव के स्कूलमास्टर का लड़का था, शब्दों से खेलना जानता, पर कान हमेशा दूसरों के मुँह पर लगे रहते। तीसरा, ज्ञान। वह एक साधारण किसान का बेटा था, जिसकी आँखें हमेशा सीखने को तैयार रहतीं, और हृदय में एक अजीब सी प्यास थी।

एक दिन गाँव में बड़ा विवाद खड़ा हुआ। सेठ रामलाल ने नदी के किनारे की उस सार्वजनिक ज़मीन पर, जहाँ गाँव की औरतें कपड़े धोतीं, बच्चे खेलते, एक बड़ा गोदाम बनाने का फैसला किया। गाँव के लोग नाराज़ थे, पर सेठ की ताकत के आगे चुप थे। अभिमान यह सुनकर आग बबूला हो गया। वह चौराहे पर जा खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा, “यह ज़मीन मेरे पिता की है! उनकी मेहनत से इस गाँव का विकास हुआ। जो कोई विरोध करेगा, उसे मैं जानता हूँ!”

उसकी आवाज़ गरजती थी, पर उसके शब्द खोखले लगते। वह सुनना नहीं चाहता था, सिर्फ़ अपनी बात थोपना चाहता था। विश्वासदास ने दूर से यह सब देखा। उनके होठों पर एक हल्की सी दुखभरी मुस्कान थी। उन्होंने धीरे से कहा, जैसे स्वयं से बात कर रहे हों, “अभिमानी व्यक्ति तो अपने ही मन की गहराई में गिरकर नष्ट हो जाता है। वह सुनने से पहले ही उत्तर देने लगता है, और यही उसकी मूर्खता और अपमान का कारण बनता है।”

दूसरे दिन, गाँव की पंचायत बुलाई गई। शांत, जो हमेशा गप्पें उड़ाने और बातें बढ़ा-चढ़ाकर सुनाने में माहिर था, वहाँ मौजूद था। सेठ ने उसे कुछ पैसे दिए थे कि वह गाँव वालों में फूट डालने वाली बातें फैलाए। शांत ने एक के कान में कुछ कहा, दूसरे के पास जाकर कुछ और। उसने झूठे वादे और डर दोनों का जाल बुनना शुरू कर दिया। उसकी बातें मीठी थीं, पर उनके पीछे की मंशा ज़हर से भरी। विवाद और बढ़ गया। भरोसा टूटने लगा। विश्वासदास ने अपनी झोपड़ी की देहली पर बैठे हुए यह सब सुना। उनकी आँखें बंद थीं। “जलती हुई जीभ दलदल है,” उन्होंने फुसफुसाया, “और मन के भीतर का जहर मौत की ओर ले जाता है। जो फूट डालता है, वह मित्रों को भी अलग कर देता है।”

इधर, ज्ञान चुपचाप सब कुछ देख रहा था। उसका मन बहुत व्यथित था। वह विश्वासदास के पास गया। बिना कुछ कहे, बुजुर्ग के सामने बैठ गया, जैसे प्रार्थना में बैठते हैं। देर तक वहाँ बैठा रहा। अंततः विश्वासदास ने आँखें खोलीं। “कहो, बेटा,” उन्होंने कोमल स्वर में कहा।

“बाबा,” ज्ञान ने कहा, “यह झगड़ा गाँव को तोड़ देगा। सत्य क्या है? मार्ग क्या है?”

विश्वासदास ने मुस्कुराया। “तूने सबसे पहले सुना, और फिर पूछने आया। यही तो आरंभ है। परमेश्वर का नाम मजबूत गढ़ है; धर्मी उसकी ओर दौड़ते हैं और सुरक्षित रहते हैं। तू सच्चाई की खोज में है, और सच्चाई तक पहुँचने का रास्ता विनम्रता से होकर जाता है।”

विश्वासदास ने उसे समझाया कि एक पक्ष की बात सुनने से पहले दूसरा पक्ष भी सुना जाए। उन्होंने कहा, “दोस्तों से पहले झगड़ा करना, उन बड़े बरगद के पेड़ की जड़ें काटने जैसा है जिसकी छाँव में तू बैठा है। वफादार मित्र उस छाँव से बढ़कर है।”

ज्ञान ने यह सब मन में रखा। उसने सेठ रामलाल से मिलने का साहस किया। डरते हुए, पर विनम्रता से। उसने कहा, “सेठजी, आपका गोदाम गाँव के लिए रोजगार लाएगा, यह तो अच्छी बात है। पर क्या वह जगह थोड़ी सरकाई जा सकती है? ताकि नदी का किनारा, जो सबकी सांझी धरोहर है, बची रहे?” सेठ ने पहले तो डाँटा, पर ज्ञान की विनम्रता और तर्कपूर्ण बातों ने उसे झुकने पर मजबूर कर दिया। फिर ज्ञान ने गाँव वालों को समझाया, शांत के फैलाए झूठ का पर्दाफाश किया। उसने दोनों पक्षों की बात कही।

आखिरकार, एक समझौता हुआ। गोदाम थोड़ी दूर पर बना। नदी का किनारा बच गया। सेठ ने भी अपनी जिद में नरमी दिखाई। विवाद शांत हुआ।

एक शाम, विश्वासदास नीम के पेड़ के नीचे बैठे थे। तीनों युवक वहाँ थे। अभिमान अब भी कुछ खिन्न था, शांत शर्मिंदा, और ज्ञान शांत। विश्वासदास ने कहा, “सुनो, बेटे। मनुष्य के हृदय में गहरे भाव छिपे रहते हैं, पर समझदार व्यक्ति उन्हें खोज निकालता है। एक उपहार मनुष्य के लिए मार्ग खोल देता है, और उसे महान लोगों के सामने ले जाता है। पर सबसे बड़ा उपहार वह है जो तुमने आज दिया – सुनने का, समझने का, और शांति बनाने का। भाई के लिए खड़ा होना मजबूत गढ़ है, पर उससे भी मजबूत वह पुल है जो दो टूटे हुए किनारों को जोड़ दे।”

उस रात नदी का शोर फिर वैसा ही प्रार्थना-सा लग रहा था। और गाँव फिर से एक हो गया था। ज्ञान समझ गया कि नीतिवचन की बातें केवल शब्द नहीं, जीने का ढंग हैं – एक ऐसा ढंग जो टूटे रिश्तों की मरम्मत करता है, और गहरी खामोशी में भी परमेश्वर की बुद्धिमता की गूँज सुनाई देती है।

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