वह साल था जब गर्मियाँ अपनी पूरी निर्ममता के साथ धरती पर पसर गई थीं। समरा का गाँव, जो हमेशा हरा-भरा और जीवंत रहता था, अब एक धूलभरी, उदास जगह बनकर रह गया था। कुएँ सूख चुके थे, खेतों में दरारें पड़ गई थीं, और लोगों के चेहरों पर एक अजीब सी बेचैनी और थकान थी। ऐसे में गाँव के मुखिया, अवधि, ने एक फैसला किया।
“हमें अपने बल पर कुछ करना होगा,” उसने गाँव वालों को इकट्ठा करके कहा। “हम प्रतीक्षा नहीं कर सकते। हमें एक ऐसा प्रतीक चाहिए जो हमारी एकजुटता दिखाए, हमारी शक्ति बने।”
गाँव के पुराने ओझा, मीशा, ने सिर हिलाया। “लेकिन अवधि, हमारे पूर्वजों ने तो हमेशा…”
“पूर्वजों के रास्ते अब काम नहीं कर रहे,” अवधि ने उसकी बात काट दी। “देखो न क्या हाल है। हमें कुछ नया, कुछ ठोस चाहिए। कुछ ऐसा जिसे देखकर हमारा हौसला बढ़े।”
और इस तरह शुरू हुआ वह प्रयास। गाँव के बाहर एक छोटी सी पहाड़ी पर, सबने मिलकर एक विशाल बैल की मूर्ति गढ़नी शुरू की। चमकती हुई सोने की परत चढ़ाने के लिए लोगों ने अपने गहने, अपनी बचत दान में दे दी। यह काम महीनों चला। उस दौरान एक बूढ़ा आदमी, एलियाह, जो गाँव के बाहर एक टूटी-फूटी कुटिया में रहता था, अक्सर वहाँ आता और चुपचाप खड़ा देखता रहता।
एक दोपहर, जब मूर्ति लगभग पूरी हो चुकी थी, एलियाह ने धीरे से कहा, “यह सोना तुम्हारा नहीं है। यह तुम्हारी श्रद्धा को लूटकर बना है। यह बैल बचाएगा नहीं, डुबोएगा।”
कुछ लोग हँस पड़े। कुछ ने उसे अनदेखा किया। अवधि ने कहा, “बूढ़े हो गए हो एलियाह, तुम्हारी बातों का अब कोई अर्थ नहीं रहा। देखो, यह प्रतीक कितना शक्तिशाली है! इसके सामने हम सब एक हैं।”
आखिरकार वह दिन आया जब मूर्ति स्थापित कर दी गई। एक भव्य उत्सव हुआ। मीशा ओझा ने लंबे-चौड़े मंत्र पढ़े। लोग नाचे-गाए। ऐसा लगा मानो सारी विपदा दूर हो गई हो। लेकिन आसमान में बादल का एक टुकड़ा तक नहीं दिखा। हवा अब भी सूखी और गर्म थी।
कुछ हफ्तों बाद, पड़ोस के एक शक्तिशाली गाँव ने, समरा की इस नई ‘समृद्धि’ की खबर सुनकर, हमला कर दिया। उन्होंने कहा, “तुम्हारे पास सोना है, हमारे पास अनाज नहीं। हम लेंगे उसे।” लड़ाई हुई। समरा के लोग बुरी तरह हारे। वह सोना, जो मूर्ति पर चढ़ा था, लूट लिया गया। मूर्ति टूटकर गिर पड़ी, उसकी चमक फीकी पड़ गई।
उसी रात, तूफान आया। लेकिन वह आशीष नहीं लाया, अभिशाप लाया। इतनी तेज बारिश हुई कि सूखी धरती उसे सोख न सकी। पहाड़ी से पानी का बहाव नीचे गाँव में आया, और उसने टूटी हुई मूर्ति के मलबे को बहाकर खेतों में फेंक दिया। सुबह तक, जहाँ हरियाली की उम्मीद थी, वहाँ कीचड़ और पत्थरों का ढेर था।
एलियाह अपनी कुटिया के सामने खड़ा था, जो ऊँची जगह पर थी। उसकी आँखों में दुख था, लेकिन आश्चर्य नहीं। वह बुदबुदाया, जैसे खुद से कह रहा हो, “उन्होंने राजा बनाया, पर मेरी इच्छा के बिना। उन्होंने मूर्तियाँ ढालीं, पर वे व्यर्थ हैं। उनका बोया हुआ अनाज, हवा उड़ा ले जाएगी। बिना जड़ का पौधा, कुछ भी नहीं पैदा कर सकता। वे एक ऐसी वाचा तोड़ चुके हैं जिसे फिर से जोड़ा नहीं जा सकता। अब वह सब कुछ लिख देगा जो उन्होंने किया है… और उनकी गलतियों का फल उन्हें भुगतना होगा।”
गाँव वाले अब उस टूटी मूर्ति के पास इकट्ठा थे। चमक गई, आशा गई। अवधि की आँखें नम थीं। मीशा ओझा सिर झुकाए खड़ा था। उन्होंने जो सोचा था वह शक्ति का स्रोत है, वही उनकी कमजोरी का कारण बन गया था। उन्होंने अपने हाथों से अपने विनाश के बीज बोए थे, और अब फसल काटने का समय आ गया था। आकाश साफ हो गया था, लेकिन उनके दिलों पर एक गहरा स्याह बादल छाया हुआ था, जो शायद कभी नहीं हटने वाला था।




