पवित्र बाइबल

पौलुस का पत्र तीमुथियुस का साहस

एफेसुस की गलियाँ शाम की धुंध में डूबी हुई थीं, और तीमुथियुस की कोठरी की खिड़की से आती ठंडी हवा ने दीपक की लौ को झिंझोड़ दिया। कागज का एक पत्र, जो अब मुड़ा हुआ और किनारों से फटा हुआ था, मेज पर पड़ा था। उस पर लिखे हर शब्द ने उसके मन में एक तूफान खड़ा कर दिया था। यह पौलुस का लिखा हुआ था, उस पौलुस का, जो अब रोम की एक कोठरी में कैद था, और जिसकी आवाज़ इन काले रंग से उतरकर सीधे तीमुथियुस के हृदय में उतर रही थी।

“मेरे प्रिय पुत्र तीमुथियुस…”

यह संबोधन ही उसकी आँखों में नमी ले आया। उसे याद आया लुस्त्रा का वह दिन, जब पौलुस पहली बार उनके घर आए थे। तीमुथियुस तब सिर्फ एक लड़का था, अपनी यूनानी पिता की छाया और अपनी यहूदी माँ एुनिखे की शांत, दृढ़ आस्था के बीच खड़ा। उसकी दादी लोइस का चेहरा याद आया, जो शनिवार की हर शाम सब्त की मोमबत्ती जलाते हुए दाऊद के भजन गुनगुनाया करती थीं। वही विश्वास, जो पीढ़ियों से चला आ रहा था, अब उसकी अपनी पलकों पर सिमट आया था, एक जिम्मेदारी की तरह, जो कभी-कभी साँस लेने में भी दिक्कत कर देती थी।

पौलुस का पत्र कहता था, “मैं उस विश्वास का स्मरण करके, जो तुझ में है, रात-दिन तेरा स्मरण करके परमेश्वर की प्रार्थना करता हूँ।”

तीमुथियुस ने खिड़की के बाहर देखा। बाज़ार की आवाज़ें धीमी पड़ रही थीं। उसे एफेसुस की कलीसिया की चिंता सता रही थी – झूठे शिक्षकों का बढ़ता प्रभाव, विवाद, डर। कभी-कभी वह स्वयं से पूछता, क्या वह इन सबके लिए पर्याप्त है? उसकी उम्र, उसका संकोची स्वभाव… क्या वह उस महान विरासत को संभाल पाएगा?

लेकिन पौलुस के शब्द एक मरहम की तरह थे: “क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय की नहीं, पर सामर्थ्य, और प्रेम, और संयम की आत्मा दी है।”

यह वाक्य उसके मन में गूँजता रहा। उसे वह दिन याद आ गया जब पौलुस ने उसे हाथ रखकर सेवा के लिए अलग किया था। उस पल की गरिमा और डर, दोनों एक साथ महसूस हुए थे। पौलुस ने लिखा था, “इसलिए तू उस उपहार को जोते रहना, जो तुझ में है, और जो भविष्यवाणी के द्वारा मेरे हाथों रखे जाने से तुझे मिला है।”

दीपक की लौ फिर से ऊपर उठी। तीमुथियुस ने पत्र को फिर से पकड़ा। पौलुस ने अपनी दशा का वर्णन किया था – श्रृंखलाएँ, परित्याग, कठिनाई। फिर भी, वह लिख रहे थे, “मैं लजाता नहीं; क्योंकि मैं जिस पर विश्वास करता हूँ, मैं जानता हूँ कि वह मेरी उस धरोहर की, जो मुझे सौंपी गई है, उस दिन तक रक्षा करने में सामर्थ्य रखता है।”

ये शब्द तीमुथियुस के भीतर किसी स्फूर्ति का संचार कर रहे थे। डर नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प। उसकी माँ का चेहरा सामने आया, जो चुपचाप, बिना किसी शोर के, अपने विश्वास में डटी रहती थी। उसकी दादी की आवाज़, जो भजन गाते हुए उसे सुलाती थी। यही तो वह ‘शुद्ध मन’ का विश्वास था, जिसकी बात पौलुस कर रहे थे।

उसने पत्र के अंतिम भाग को पढ़ा, जहाँ पौलुस ने उसे सच्चाई के वचन को मानने, प्रेम से दृढ़ रहने, और उस भली धरोह की रक्षा करने की चेतावनी दी थी। शब्द अब सिर्फ शब्द नहीं रह गए थे। वे एक जीवित आह्वान बन गए थे।

तीमुथियुस ने अपनी मेज पर रखे हुए पुराने चर्मपत्रों को देखा, जिन पर उसने प्रेरितों की शिक्षाएँ लिखी थीं। एक गहरी साँस लेकर उसने फिर से कलम उठाई। डर पीछे छूट गया था। अब केवल कर्तव्य था, और उस विश्वास की एक ज्वाला, जो उसकी दादी से होती हुई, उसकी माँ से गुज़रती, पौलुस के हाथों से स्पर्श पाकर, अब उसकी अपनी आत्मा में जल रही थी। रोम की कोठरी में बंद एक बूढ़े प्रेरित का पत्र, एफेसुस की इस शाम को, एक नए साहस का स्रोत बन गया था। और तीमुथियुस जानता था कि अब वह पीछे नहीं हटेगा।

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