शीलो के टीले पर सन्नाटा पसरा था। ऊँचे स्थानों पर यरबाम ने जो सुनहरे बछड़े स्थापित किए थे, उनकी छाया लंबी होती जा रही थी। हवा में बबूल के फूलों की मीठी-कड़वी गंध थी, पर उसमें एक अजीब सी गंधिल गंध भी मिली हुई थी—जैसे दूर कहीं बलि चढ़ाए गए मेढ़ों का रक्त सूख रहा हो।
यरबाम की पत्नी, नाम जिसका इतिहास ने सुरक्षित नहीं रखा, झोपड़ी के एक कोने में बैठी थी। उसकी आँखें अपने बेटे अबीय्याह के चेहरे पर टिकी थीं, जो एक कोमल बुखार में तप रहा था। बच्चे का शरीर इतना गरम था कि उस पर हाथ रखना मुश्किल था। वैद्य आ चुके थे, जड़ी-बूटियाँ लगा चुके थे, पर बुखार टस से मस नहीं हुआ था। उसकी साँसें तेज और उथली होती जा रही थीं, जैसे कोई छोटी सी चिड़िया फड़फड़ा रही हो।
राजा यरबाम दूर दमिश्क की सीमा पर था—रोमिल्लाम के युद्ध की तैयारियों में। राजमहल में सन्नाटा था। तब उस स्त्री ने एक निर्णय लिया। वह जानती थी कि शीलो में एक बूढ़ा नबी रहता है—आहिय्याह। वही, जिसने यरबाम को भविष्यवाणी दी थी कि दस गोत्रों का राज्य उसे मिलेगा। पर अब वह बूढ़ा हो चला था, आँखों की रोशनी जा चुकी थी। लोग कहते थे, परमेश्वर का आत्मा अब भी उस पर है।
पर एक समस्या थी। यरबाम ने नबियों से रिश्ता तोड़ लिया था। वह बेतैल और दान में बने मंदिरों का राजा था। आहिय्याह के पास जाना राजद्रोह जैसा होता। तब उस स्त्री ने साधारण वस्त्र पहने—एक साधारण किसान की पत्नी का भेष। चेहरे पर घूँघट डाला। हाथ में कुछ उपहार रखे—सादी रोटियाँ, कुछ सूखे अंजीर, एक छोटा सा जैतून का तेल का पिटारा। वह दो विश्वासपात्र दासियों को साथ लेकर निकल पड़ी।
रास्ता लंबा और धूल-धूसरित था। शीलो की पहाड़ियों पर चढ़ते वक्त उसके पैरों में छाले पड़ गए। दोपहर की तेज धूप में छाया तक दूर-दूर तक नहीं थी। उसके मन में एक ही बात गूँज रही थी—”क्या वह बूढ़ा अभी जीवित होगा? क्या वह मेरे बेटे के लिए कुछ करेगा?”
आहिय्याह का घर शहर के बाहर था, एक जर्जर झोपड़ी। छप्पर टूटा हुआ था, दीवारों पर कीचड़ का प्लस्तर उखड़ रहा था। वह अन्दर पहुँची तो एक बूढ़ा आदमी एक लकड़ी के स्टूल पर बैठा था। उसकी आँखों में सफेद मोतियाबिन्द की पर्त चढ़ी थी, पर चेहरे पर एक अद्भुत प्रतीक्षा का भाव था—जैसे वह किसी के आने की बाट जोह रहा हो।
उससे पहले कि वह कुछ कहती, बूढ़े नबी की आवाज़ गूँजी: “अन्दर आ, यरबाम की पत्नी। तू अपनी पहचान छुपाने क्यों आई है? मुझे एक संदेशा मिला है, और वह तेरे लिए कठोर है।”
स्त्री स्तब्ध रह गई। उसका भेद खुल चुका था। वह घुटनों के बल बैठ गई, आवाज़ काँपते हुए बोली: “महाराज, मेरा बेटा… अबीय्याह… बीमार है।”
आहिय्याह ने अपनी धुँधली आँखें उसकी तरफ घुमाईं, मानो उसे स्पष्ट देख रहा हो। उसकी आवाज़ में कोमलता नहीं, एक अटल न्याय की कठोरता थी: “जा, यरबाम की पत्नी, अपने घर लौट जा। जैसे ही तू नगर में प्रवेश करेगी, तेरा बेटा मर जाएगा।”
झोपड़ी में हवा रुक सी गई। बूढ़े नबी ने आगे कहा, उसकी आवाज़ अब गर्जन की तरह थी: “यरबाम ने खुद को दूसरों से बढ़कर पाप करनेवाला ठहराया है। उसने अन्य देवताओं के लिए स्तम्भ और अशेरा बनाए। उसने मुझे क्रोध दिलाया। इसलिए देख, मैं यरबाम के घराने का सफाया करूँगा, जैसे कोई गोबर साफ करता है, तब तक कि बिलकुल साफ न हो जाए। जो यरबाम के घराने का नगर में मरेगा, कुत्ते उसे खाएँगे; और जो खेत में मरेगा, आकाश के पक्षी उसे खाएँगे। यहोवा ने कहा है।”
स्त्री की साँसें थम गईं। वह जिस अनुग्रह की आशा लेकर आई थी, वहाँ उसे न्याय का तूफ़ान मिला। पर नबी की आवाज़ एकदम नरम पड़ गई, जैसे बारिश के बाद की जमीन: “पर तेरे बेटे अबीय्याह के साथ ऐसा नहीं होगा। उसे सम्मान से दफनाया जाएगा, क्योंकि इज़राइल के परमेश्वर यहोवा में उसने कुछ भले भाव पाए हैं।”
वह लौटी। पैरों में जान नहीं थी। रास्ते की धूल अब उसे भारी लग रही थी। जैसे ही वह नगर के फाटक पर पहुँची, दासियाँ रोती हुई मिलीं। बच्चा चला गया था।
और हुआ वही, जैसा नबी ने कहा था। अबीय्याह को पूरे राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया। पूरा इज़राइल उसके लिए विलाप करता रहा। पर यरबाम की नीव हिल चुकी थी। वह लड़ाइयाँ लड़ता रहा, सिंहासन पर बैठा रहा, पर उसका घराना धीरे-धीरे सूखने लगा, जैसे किसी बबूल के पेड़ की जड़ें दीमक लगने से खोखली हो जाती हैं। अंत में, नादाब उसका पुत्र राजा बना, और फिर… फिर इतिहास ने अपना पाट खोल दिया।
शीलो की उस झोपड़ी में बूढ़ा नबी अभी भी बैठा रहा होगा, उसकी अँधी आँखें आनेवाले प्रलय को देख रही होंगी। और हवा में वही गंधिल गंध रही होगी—रक्त की, और दूर एक साम्राज्य के विघटन की।




