(यह कहानी एस्तेर की पुस्तक के सातवें अध्याय पर आधारित है। सभी पात्र और घटनाएँ बाइबिल के अनुरूप हैं, किन्तु उनके भावों, वातावरण और संवादों को विस्तार से चित्रित किया गया है।)
शाही भोजन-कक्ष में हवा तैलीय और भारी लग रही थी। दीवारों पर टंगे बाबिल के बुने हुए कालीनों से सूखी धूल की महक आती थी, जो शराब की तेज़ ख़ुशबू और भुने हुए मांस की गंध में घुल मिल जाती थी। दूसरा दावत था यह, केवल राजा अहश्वेरोश, रानी एस्तेर और हामान के लिए। चाँदी के कटोरे में हरी और काली अंजीरें सजी थीं। प्याले में दाखमधु गहरे लाल रंग का था, जैसे कोई कीमती पत्थर पिघल गया हो।
राजा ने अपना प्याला हल्का सा आगे बढ़ाया। उसकी आँखों में दावत और शराब से उपजी एक कोमल सुस्ती थी, लेकिन जिज्ञासा भी कौंध रही थी। पिछले दावत में एस्तेर ने जो वादा किया था, आज उसका रहस्य खुलेगा। उसने आवाज़ दी, जो गलीचों के गहरेपन में कुछ धुँधली सी लगी।
“रानी एस्तेर, अब बोलो। तेरी याचना क्या है? तेरी माँग क्या है? राज्य का आधा भाग भी तुझे दे दिया जाएगा।”
एस्तेर ने अपनी साड़ी के पल्लू के किनारे को सीधा किया, एक बिल्कुल सामान्य, मानवीय हरकत, जैसे शब्दों को इकट्ठा कर रही हो। उसका चेहरा दीपकों की रोशनी में पीला दिख रहा था। उसने सीधे राजा की ओर देखा। नज़रें न हटीं।
“यदि मैं राजा की दृष्टि में अनुग्रह पाई हूँ, और यदि राजा को उचित जान पड़े,” उसकी आवाज़ काँपी नहीं, लेकिन उसमें एक विचित्र-सा खिंचाव था, जैसे हर शब्द को किसी गहरे कुएँ से निकाल रही हो, “तो मेरा निवेदन यह है कि मेरा प्राण मुझे बख्शा जाए, और मेरी जाति के लोग भी। क्योंकि हम बेचे गए हैं, मैं और मेरी जाति, नष्ट कर दिए जाने, घात किए जाने और नाश हो जाने के लिए।”
वह रुकी। कक्ष में सन्नाटा और गहरा हो गया। केवल दूर कहीं एक दीपक की बत्ती का फुफकारने जैसा स्वर सुनाई दिया। राजा की भौंहें एकदम चढ़ गईं। उसकी आँखों की सुस्ती किसी तेज़ चाकू की धार की तरह तेज हो उठी।
“कौन है वह? कहाँ है वह मनुष्य जिसने ऐसा करने का साहस किया है?”
एस्तेर का हाथ, जो अब तक अपनी गोद में पड़ा था, उठा। उसकी उँगली ने हवा में एक सीधी रेखा खींची, उस सोफे की ओर जहाँ तीसरा व्यक्ति बैठा था। उसकी आवाज़ अब पत्थर की तरह ठोस और स्पष्ट थी।
“वह शत्रु, वह हिंसक व्यक्ति… यह हामान ही है!”
हामान का मुँह एकदम बेजान हो गया। वह जैसे अपने ही शरीर में कैद होकर रह गया। अभी कुछ क्षण पहले तक वह राजा और रानी के साथ दाखमधु पी रहा था, अपने मन में शायद अगली चालें सोच रहा था। और अब… यह आरोप? यह पहचान? एक सेकंड में सब कुछ उलट गया। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया, न क्रोध का, बल्कि उस शून्य भय का, जो आत्मा को जड़वत कर देता है।
राजा अहश्वेरोश क्रोध से उबल रहा था। वह दावत से उठा, शराब का प्याला लुढ़क कर फर्श पर गिर पड़ा, लाल रंग का दाग फैल गया, जैसे खून का एक छोटा-सा तालाब। वह बग़ीचे की ओर चला गया, अपने क्रोध पर काबू पाने के लिए, शायद यह सोचने के लिए कि अब क्या करना है। हर शाही फरमान अटल था, लेकिन यहाँ तो रानी स्वयं ही उस फरमान की शिकार बनने वाली थी!
हामान को एहसास हुआ कि उसका जीवन एक धागे पर लटक गया है। वह डगमगाता हुआ एस्तेर के पास गया, उसके सोफे के पास गिर पड़ा। उसके हाथ रानी के आसन के किनारे पर पड़े थे। “महारानी! दया! मैं नहीं जानता था! मैं नहीं जानता था कि आप…” उसकी वाणी में गिड़गिड़ाहट और आतंक का ऐसा मिश्रण था जो झूठा नहीं लगता था।
ठीक उसी क्षण, राजा बग़ीचे से लौटा। और उसने जो दृश्य देखा, वह उसके क्रोध पर घी का काम कर गया। उसकी नज़रों में, यह दृश्य और कुछ नहीं, बल्कि रानी के साथ उसके अपने महल में ही छेड़छाड़ का प्रयास था। एक और अपराध, सरेआम।
“क्या तू रानी को मेरे सामने, मेरे ही घर में बलात्कार करने का साहस रखता है?” राजा की गर्जना सुनकर द्वार पर खड़े हुबाल नामक एक खोजे ने सिर झुका लिया। उसके माथे पर पसीना चमक रहा था।
राजा के मुँह से निकले शब्द ही हामान के लिए मृत्यु की सजा सिद्ध हो गए। हुबाल ने तुरंत आगे बढ़कर हामान का सिर ढक लिया। यह प्रथा थी – दोषी को मृत्यु के लिए तैयार करना। हामान की साँसे अटक-अटक कर निकल रही थीं, उस काले कपड़े के नीचे से उसकी हाँफने की आवाज़ आ रही थी।
तभी एक और खोजा, जिसका नाम हरबोना था, बोला। वह बहुत देर से चुपचाप खड़ा सब देख रहा था। उसकी आवाज़ में एक विचित्र उत्सुकता थी, जैसे किसी पहेली का अंतिम टुकड़ा जोड़ रहा हो। “महाराज, देखिए, हामान ने मोर्दकै के लिए, उसी व्यक्ति के लिए जिसने राजा का प्राण बचाया था, पचास हाथ ऊँचा एक फाँसी का तख़्ता भी अपने घर में बनवा रखा है।”
यह अंतिम बात थी। राजा ने तुरंत आदेश दिया, “उसी पर उसे चढ़ा दो।”
कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। उस शाम, जब सूरज शूशन के महलों के पीछे डूब रहा था और लंबी-लंबी परछाइयाँ पड़ रही थीं, हामान के भाग्य का फैसला हो गया। वही तख़्ता, जो उसने मोर्दकै के लिए बनवाया था, उसकी अपनी मृत्यु का साधन बना। न्याय का एक विचित्र, परिपूर्ण चक्र पूरा हुआ। और जब यह समाचार नगर में फैला, तो एक पूरी जाति, जो मृत्यु के साये में जी रही थी, ने राहत की वह गहरी साँस ली, जो केवल ईश्वरीय समय और साहस के मिलन से ही संभव होती है। राजा का क्रोध शांत हुआ, एस्तेर के चेहरे पर पहली बार सच्ची शांति दिखी, और मोर्दकै के द्वार पर अगले दिन राजकीय वस्त्र पहने हुए लोगों की कतार लग गई। पर यह सब, एक और कहानी का हिस्सा था। आज की रात तो न्याय की रात थी।




