पवित्र बाइबल

स्वप्न सीढ़ी और याकूब

भूमि बेरस थी। रेत और कंकड़ के बीच से झाड़ियाँ कंटीली और धूसर निकल रही थीं, मानो धूप ने उनका सारा रस सोख लिया हो। याकूब के पैरों के नीचे मिट्टी चटखती थी। हर कदम पर एक धूल भरी गर्म हवा उठती, उसके चोगे से लिपट जाती। वह अकेला था। इतना अकेला कि अपनी साँसों की आवाज़ और दिल की धड़कन के सिवा कुछ नहीं सुनाई देता था।

भाई एसाव के क्रोध से भागा हुआ वह आदमी, अब सिर्फ एक थका हुआ शरीर था जो हारान की ओर बढ़ रहा था। सूरज डूबने लगा था। पश्चिम का आकाश लाल और सुनहरे रंगों में सुलग रहा था, जैसे कोई विशाल अंगारा। उसने एक जगह देखी, जहाँ पत्थरों का एक ढेर था। शायद कोई पुरानी चबूतरा, या फिर बस प्रकृति का बिखराव। थकान ने उसकी हड्डियों में सीसा भर दिया था। उर नगर से दूर, इस सुनसान में, रात कहीं ठहरने का स्थान ढूँढना ज़रूरी था।

उसने अपना सामान, बस एक थैला और लाठी, एक तरफ रखी। पत्थरों में से एक चपटा पत्थर चुनकर, उसने उसे सिरहाने के लिए बड़ी सावधानी से रख लिया। यह कोई समारोह नहीं था, बस एक साधारण, थके हुए मनुष्य की व्यावहारिकता। जमीन कठोर थी। वह लेटा, और आकाश उसके ऊपर एक विशाल, गहरा नीलामणि का टुकड़ा बन गया। तारे टिमटिमाने लगे, एक-एक कर, फिर झुंड के झुंड। इतनी निर्मम सुन्दरता के बीच वह अपने विचारों से घिरा रहा। पिता का आशीर्वाद, माँ रिबका की योजना, भाई का चेहरा जो घृणा से तमतमा रहा था… यह सब उसके मन में चक्कर काट रहा था। क्या यह सब ठीक था? कहीं वह अपने ही घर से, अपनी जड़ों से, हमेशा के लिए उखड़ तो नहीं गया?

निद्रा धीरे-धीरे आई, एक भारी चादर की तरह। और फिर, नींद की उस गहरी खाई में, स्वप्न आया।

यह कोई साधारण सपना नहीं था। एक सीढ़ी थी, जो धरती पर खड़ी थी, और उसका शिखर स्वर्ग को छू रहा था। लकड़ी की नहीं, पत्थर की नहीं, बल्कि जैसे प्रकाश और छाया से बुनी हुई, एक ज्योति का पुल। और उस पर ईश्वर के दूत, स्वर्गदूत, ऊपर चढ़ रहे थे और नीचे उतर रहे थे। उनके चेहरे शांत थे, उनके वस्त्र धुँधले प्रकाश से झिलमिलाते थे। चढ़ना और उतरना… एक अनवरत, शांत गति। और फिर, स्वयं प्रभु उस सीढ़ी के ऊपर प्रकट हुए। कोई रूप नहीं, कोई चेहरा नहीं, पर एक उपस्थिति… जो सब कुछ भर देने वाली, भयभीत करने वाली, पर विश्वास देने वाली थी।

और एक वाणी हुई। वह आवाज़ न तो कानों में पड़ी, न ही हवा में कंपन हुई। वह सीधे आत्मा में उतरी, जैसे प्यासी जड़ों में पानी।

“मैं तेरे दादा इब्राहीम का परमेश्वर हूँ, और इसहाक का परमेश्वर। वह भूमि जिस पर तू सो रहा है, मैं उसे तुझे और तेरे वंश को दूँगा। तेरा वंश भूमि की धूल के कणों के समान अनगिनत होगा। तू पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में फैलेगा। तेरे द्वारा, और तेरे वंश के द्वारा, पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी। और स्मरण रख, मैं तेरे संग हूँ। जहाँ कहीं तू जाएगा, मैं तेरी रक्षा करूँगा, और तुझे इसी भूमि पर वापस ले आऊँगा। मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूँगा, जब तक कि मैंने वह सब कुछ पूरा नहीं कर दिया जो मैंने तुझसे कहा है।”

सपना टूटा। भोर की पहली किरण ने अँधेरे को बाँटा। याकूब चौंककर उठ बैठा। उसका शरीर काँप रहा था, पर मन में एक अद्भुत भय और आश्चर्य का मिश्रण था। वह आसपास देखने लगा। वही पथरीली जमीन, वही झाड़ियाँ। पर कुछ बदल गया था। हवा में एक पवित्रता तैर रही थी। वह स्थान अब साधारण नहीं रहा था।

वह बोल उठा, अपने ही स्वर से डरता हुआ, “वास्तव में, प्रभु इस स्थान पर है… और मैं अनभिज्ञ था!”

एक श्रद्धा का भय, एक गहरा रोमांच उसके रोंगटे खड़े कर रहा था। उसने कहा, “यह क्या है? यह तो ईश्वर का घर है! और यह स्वर्ग का द्वार!”

उसने सुबह की उजली रोशनी में वह पत्थर देखा जो उसने सिरहाने रखा था। अब वह एक साक्षी था। उसने उसे धीरे से उठाया, और उसे एक स्तम्भ की तरह खड़ा किया। फिर उसने अपने थैले से जो थोड़ा सा तेल था—शायद यात्रा के लिए रखा हुआ—वह लिया और उस पत्थर के स्तम्भ पर उड़ेल दिया। तेल की बूँदें पत्थर पर चमकने लगीं, एक भेंट की तरह, एक चिह्न की तरह।

और उसने उस स्थान का नाम ‘बेत-एल’ रखा—परमेश्वर का घर। पर उससे पहले, वहाँ लूज़ नाम का एक छोटा सा स्थान था। अब वह बदल गया था।

फिर याकूब ने एक प्रतिज्ञा की। वह ज़ोर से नहीं, पर दृढ़ता से बोला, जैसे ईश्वर को, जो अब दूर नहीं था, अपना वचन दे रहा हो।

“यदि परमेश्वर मेरे संग रहेगा, और इस यात्रा में मेरी रक्षा करेगा, मुझे खाने के लिए रोटी और पहनने के लिए वस्त्र देगा, और मुझे कुशलतापूर्वक मेरे पिता के घर वापस ले आएगा… तब प्रभु ही मेरा परमेश्वर होगा। और यह पत्थर, जिसे मैंने स्तम्भ बनाया है, ईश्वर का घर होगा। और जो कुछ भी तू मुझे देगा, उसका दशमांश मैं अवश्य तुझे दूँगा।”

यह सौदा नहीं था। यह एक भयभीत, अनुग्रह पाए हुए इंसान की प्रतिक्रिया थी। ईश्वर ने बिना शर्त वादा किया था। और याकूब, अपनी मानवीय सीमाओं में, विश्वास के पहले कदम पर खड़ा होकर, उत्तर दे रहा था।

उसने अपना सामान उठाया। सूरज अब पूरी तरह से उग आया था। रेत का रंग सुनहरा हो गया था। वह पत्थर का स्तम्भ पीछे छूट गया, एक मूक गवाह। याकूब ने एक बार पीछे मुड़कर देखा। वह स्थान अब उसकी स्मृति में हमेशा के लिए अंकित हो गया था। फिर वह आगे बढ़ा, हारान की ओर। अब उसके कदमों में वह भारीपन नहीं था। अकेलापन था, पर उसमें एक साथी का आभास भी था। भय था, पर उसके साथ एक आशा भी जगी थी। जिस भूमि पर वह सोया था, वह उसकी विरासत थी। और जिस ईश्वर ने उसे स्वप्न दिखाया, वह अब उसके साथ चलने लगा था।

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