पवित्र बाइबल

मूसा के बाद यहोशू: एक नया नेतृत्व

मोआब के उन विस्तृत मैदानों में हवा तीखी चल रही थी, ठंडी और कुछ कसैलेपन लिए हुए। जैसे वह मृत्यु और एक नई शुरुआत, दोनों का स्वाद लिए जा रही हो। यहोशू खड़ा था, उसकी पीठ पहाड़ियों की ओर थी जहाँ पिसगा का शिखर ऊँचा उठा था। वही पहाड़ जहाँ से मूसा ने उस वादा किए हुए देश को देखा था, और वहीं उसकी आँखें मूंद गई थीं। अब यह भार, यह जिम्मेदारी, एकाएक यहोशू के कंधों पर आन पड़ी थी। वह कोई युवा उत्साही नहीं रह गया था; उसके चेहरे पर रेगिस्तान की धूप की झुर्रियाँ थीं, कन्धे मिस्र की गुलामी से मुक्ति के लिए किए गए लम्बे सफर का बोझ ढोते हुए थक गए थे।

उसके मन में एक हलचल थी। मूसा जैसा नबी कहाँ? वह तो वही था जो तम्बू में जाकर आमने-सामने बातें करता था। यहोशू को याद आया, कैसे वह हमेशा उस तम्बू के पास ही रुक जाता था, दूर से, सम्मान और एक अद्भुत डर के मिश्रण के साथ। और अब… अब यह सारी भीड़, ये लोग, इनका भविष्य, सब उस पर टिका था। रात की नीरवता में उसके विचार शोर मचा रहे थे – कैसे लोगों को एकजुट रखेंगे? कैसे यरदन नदी के उस पार के उन शक्तिशाली किलों और योद्धाओं का सामना करेंगे?

तभी, एक अनुभव हुआ। यह कोई ऊँची आवाज़ नहीं थी, न ही आकाश चीरने वाली कोई बिजली। बल्कि यह उसके भीतर, उसकी आत्मा की गहराइयों में उतर आई एक स्पष्ट, दृढ़ और अटल उपस्थिति थी, जैसे कोई विशाल और अदृश्य हाथ उसके कंधे पर रख दिया गया हो। वह परमेश्वर का वचन था।

“मेरा सेवक मूसा मर गया। अब, तू ही है। तू और सब इस्राएली तैयार हो जाओ। उस देश को पार करना है जो मैं तुम्हें देने वाला हूँ।”

यहोशू की साँसें रुक सी गईं। ‘मूसा मर गया’ – इस सत्य को सुनकर भी उसका दिल एक बार फिर दुख से सिकुड़ा। पर उसके बाद के शब्दों ने उसे जमीन पर जड़ित कर दिया। ‘अब, तू ही है।’

फिर वह आदेश आया, स्पष्ट और अकाट्य, जैसे किसी पहाड़ को उखाड़ फेंकने का आदेश हो। “तेरे लिए हर वह स्थान होगा जहाँ तेरे पैर का तलवा पड़ेगा, ठीक वैसे ही जैसे मैंने मूसा से कहा था। मरुभूमि से लेकर इस लबानोन तक, और फिर महानद यूफ्रेट्स से लेकर पश्चिम के महासागर तक – यह सब तुम्हारी सीमा होगी। तुम्हारा कोई भी व्यक्ति जीवित जीवन भर तुम्हारे सामने नहीं टिक पाएगा। जैसे मैं मूसा के साथ था, वैसे ही तेरे साथ रहूँगा। मैं न तो तुझे छोड़ूँगा, न ही तुझे तजूँगा।”

यहोशू के हृदय में एक गर्मी फैलने लगी, जैसे जमी हुई नदी बसंत की धूप पाकर पिघलने लगती है। यह वाचा का वचन था। यह उस व्यक्तिगत आश्वासन का नहीं, बल्कि उस पूरी जाति के साथ किए गए वादे की पुष्टि थी, जिसे अब्राहम, इसहाक और याकूब से किया गया था। परमेश्वर समय के पार था; वह मूसा का परमेश्वर था, और अब वह यहोशू का भी परमेश्वर होगा।

“ताकतवर और हियाव बनो,” उस आवाज़ ने कहा, और यह वाक्य उसकी हड्डियों में गूँजने लगा। “क्योंकि तू ही इस लोग को वह देश देने वाला है जिसका मैंने उनके पूर्वजों से वादा किया था। बस, ताकतवर और बहुत हियाव बनो। कानून की यह पुस्तक तेरे मुँह से दूर न हो; दिन-रात इस पर मनन करना, ताकि तू उस सब के अनुसार कर सके जो इसमें लिखा है। तब तेरे काम सफल होंगे, तब तू फूला-फला रहेगा। क्या मैंने तुझे आज्ञा नहीं दी? ताकतवर और हियाव बनो। भयभीत न हो, घबरा न जा, क्योंकि तेरे साथ हर जगह तेरा परमेश्वर है।”

शब्द समाप्त हुए। वह उपस्थिति अब भी थी, पर वह आवाज़ शांत हो गई। यहोशू ने एक गहरी, काँपती हुई साँस ली। उसकी आँखों के सामने अब डर के बादल नहीं, बल्कि एक राह दिखाई देने लगी थी। यह कानून था – वही नियम और आदेश जो सीनै पर्वत पर दिए गए थे। यही उसकी तलवार और ढाल होगी। यही वह मार्गदर्शक स्तम्भ था जो बादल और आग के स्तम्भ की जगह लेगा।

अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरणें मोआब की पहाड़ियों पर पड़ीं, यहोशू ने लोगों को इकट्ठा किया। भीड़ में एक अजीब सी खामोशी थी – शोक और अनिश्चय का मिश्रण। यहोशू मंच पर चढ़ा। वह लम्बा नहीं था, पर आज उसके खड़े होने का ढंग कुछ और ही था। उसकी आवाज़, जो शुरू में कुछ भारी लगी, जल्द ही दृढ़ और स्पष्ट हो गई।

“लोगो, सुनो!” उसने कहा। “हमारे परमेश्वर ने हमसे बात की है। अब हमें अपने डेरे समेटने हैं। तीन दिन के भीतर हम इस यरदन को पार करने वाले हैं, उस देश में प्रवेश करने वाले हैं जो हमारे परमेश्वर ने हमें विरासत में दिया है।”

भीड़ में सनसनी फैल गई। कुछ चेहरों पर अविश्वास था, कुछ पर डर, पर कईयों की आँखों में वह पुरानी चिंगारी फिर से जल उठी, वह चिंगारी जो लाल सागर के किनारे देखी गई थी।

यहोशू ने आगे कहा, “परमेश्वर का वचन है – ताकतवर और हियाव बनो। भयभीत मत हो। वह स्वयं हमारे साथ चलेगा। पर याद रखो, उसकी आज्ञाओं पर चलना हमारा काम है। लेवी के वंश के लोग, तुम्हारी ज़िम्मेदारी है कि वाचा के सन्दूक को उठाओ और लोगों के आगे-आगे चलो।”

लेवी के लोगों के चेहरे गम्भीर हो गए। यह कोई साधारण ड्यूटी नहीं थी; यह सम्पूर्ण जाति की आध्यात्मिक केन्द्रीयता को उठाने का काम था।

फिर यहोशू ने उन दो गोत्रों – रूबेन, गाद और मनश्शे के आधे गोत्र की ओर रुख किया, जिन्होंने यरदन के पूर्व की उपजाऊ ज़मीन माँग ली थी। उसकी आवाज़ में एक चुनौती थी। “तुम्हें याद है तुमने मूसा से क्या वादा किया था? कि तुम अपने भाइयों के आगे-आगे लड़ोगे, जब तक वे भी अपनी विरासत नहीं पा लेते। अब परमेश्वर तुम्हें आराम दे रहा है, तो क्या तुम अपना वचन पूरा करोगे?”

उनके सरदार, जिनके चेहरे सख्त और धूप से तपे हुए थे, आगे बढ़े। उनमें से एक बोला, “यहोशू, जो कुछ तू हमें आज्ञा देगा, हम वही करेंगे। और जहाँ कहीं तू हमें भेजेगा, हम वहीं जाएँगे। जैसे हमने मूसा की सुनी, वैसे ही तेरी भी सुनेंगे। बस, परमेश्वर तेरे साथ रहे, जैसे वह मूसा के साथ था। जो कोई तेरी आज्ञा का विरोध करे, या तेरी बात न माने, उसे मृत्युदंड दिया जाए। बस, तू ताकतवर और हियाव बन।”

यहोशू ने उनकी ओर देखा। यह कोरी कूटनीति नहीं थी; यह एक जनरल को मिली वफादारी थी। उसने धीरे से सिर हिलाया। एकता बनी हुई थी। परमेश्वर के वचन ने न केवल उसे, बल्कि उन सभी को एक सूत्र में बाँध दिया था।

तीन दिन। यह समय तैयारी का था। छावनी में एक नई चेतना दिखाई देने लगी। लोग अपने हथियार साफ़ करने लगे, अपने डेरों की रस्सियाँ कसने लगे। डर अब भी था, पर उसके साथ एक निश्चय भी जुड़ गया था। यहोशू खुद अपने तम्बू में बैठा, उन पुरानी चर्मपत्रों को देख रहा था जिन पर व्यवस्था लिखी थी। वह शब्द, जो उसने रात में सुने थे, अब उसकी साँस-साँस में गूँज रहे थे। ‘ताकतवर और हियाव बनो।’ यह एक आदेश नहीं, एक वादा था – कि वह शक्ति द

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