गिलबोआ के उन निर्जन पहाड़ों पर सांझ की हवा ने एक अजीब सी सनसनी फैला रखी थी। ऐसा लग रहा था जैसे पहाड़ियाँ खुद ही दुख की एक भारी चुप्पी ओढ़े हुए थीं। दिन भर से युद्ध की गड़गड़ाहट धीरे-धीरे विलीन हो रही थी, और उसकी जगह एक भयानक, सुनसान शांति ने ले ली थी। शाऊल, इस्राएल का राजा, अपने भारी कवच के साथ एक चट्टान के सहारे खड़ा था। उसके चारों ओर उसके वफादार सैनिकों के शव बिखरे हुए थे, और दूर, मैदान में, पलिश्तियों की सेना की आवाज़ें स्पष्ट सुनाई दे रही थीं – विजय के उन्माद में चीखते-गरजते हुए।
उसकी आँखों के आगे सब कुछ धुँधला सा हो गया था। शरीर में तीरों के घावों से रिसता लहू उसके राजकीय वस्त्रों को भीगो रहा था, पर दर्द से कहीं ज्यादा तीखा एक और एहसास उसके भीतर कुलबुला रहा था। वह एहसास था परमेश्वर की उस सुनसान ख़ामोशी का, जो अब उसके जीवन का स्थायी भाग बन चुकी थी। उसे याद आया वह दिन, जब शमूएल ने उससे कहा था कि यहोवा का आत्मा उससे विमुख हो गया है। आज, इस पराजय के क्षण में, वह बात उसकी हड्डियों तक में कहर की तरह व्याप्त थी।
“हे राजन,” उसके पास खड़े उसके शस्त्रवाहक की आवाज़ काँप रही थी। “वे नज़दीक आ रहे हैं। देखिए, वे हमारे शिविर की ओर बढ़ रहे हैं।” शाऊल ने पलटकर देखा। उसका युवा शस्त्रवाहक, जिसका चेहरा मृत्यु के भय से विवर्ण हो रहा था, उसकी ओर देख रहा था। उसकी आँखों में एक सवाल था – अब क्या?
शाऊल की निगाह दूर, अय्यालोन की घाटी की ओर गई, जहाँ से एक दिन वह विजयी राजा के रूप में लौटा था। फिर उसने अपने हाथ में भारी तलवार का मूठ कसकर पकड़ा। यह वही तलवार थी जिससे उसने कितने ही शत्रुओं का अंत किया था। आज, वही तलवार उसके अपने अंत का साधन बनने वाली थी। उसने एक गहरी, थकी हुई साँस ली। पलिश्ती उसे जीवित पकड़ेंगे, और फिर मनमानी करेंगे। एक राजा के रूप में, यह उससे बर्दाश्त नहीं होगा। उसने अपने शस्त्रवाहक से कहा, “तू अपनी तलवार निकाल कर मुझे भोंक दे, कि ये खतनारहित लोग आकर मेरे साथ दुराचार न करें।”
पर उस युवक के हाथ काँप उठे। वह पीछे हट गया, उसकी आँखों में अविश्वास और भक्ति के भय का मिश्रण था। “हे राजन, मैं… मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं आप पर हाथ कैसे उठा सकता हूँ?” उसकी आवाज़ दबी हुई, टूटी हुई थी।
शाऊल ने उसकी ओर एक अंतिम बार देखा। कोई क्रोध नहीं, कोई फटकार नहीं। बस एक गहरी, निराशाजनक समझदारी। उसने कहा कुछ नहीं। फिर, अपनी पूरी शक्ति एकत्र कर, उसने अपनी ही तलवार की धार को अपने सीने के सामने किया, और अपने ही भारी शरीर को उस पर गिरा दिया। एक करारा, भीषण ध्वनि हुई। और फिर, सन्नाटा।
उसका शस्त्रवाहक वहाँ खड़ा कुछ पल रहा, मूक, स्तब्ध। उसके राजा का शव चट्टान से सटा पड़ा था। दूर से पलिश्तियों के जयकारे और निकट आते घोड़ों की टापों की आवाज़ तेज होती जा रही थी। एक क्षण के भीषण द्वंद्व के बाद, उस युवक ने भी वही राह चुनी। उसने अपनी तलवार उठाई, और अपने प्राण त्याग दिए, अपने स्वामी के पास ही गिरकर।
दूसरे दिन, जब पलिश्ती लाशों को लूटने निकले, तो उनकी निगाहें सीधे राजा शाऊल पर गईं। उन्होंने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया, और उसके भारी-भरकम हथियारों को उतार लिया। यह खबर उनके सारे देश में आग की तरह फैल गई। उन्होंने शाऊल के अस्त्र-शस्त्र अपने देवताओं के मंदिर में रखवा दिए, और उसका सिर दागोन के मंदिर में टांग दिया, ताकि सब देख सकें कि इस्राएल के शक्तिशाली राजा का क्या हश्र हुआ।
पर उसकी लाश, उसके पुत्रों – योनातान, अबीनादाब और मल्कीशुआ – की लाशों के साथ, गिलबोआ की उन्हीं पहाड़ियों पर पड़ी रह गई थी, बिना किसी संस्कार के, उजाड़ में। यह समाचार जब यबेश गिलाद के वीरों तक पहुँचा, तो उन्होंने वह सब याद किया जो शाऊल ने एक बार उनके शहर की रक्षा करते हुए किया था। वे चुपके से रात के अंधेरे में निकले, पहाड़ों पर चढ़े, और राजा तथा उसके पुत्रों के शवों को वहाँ से उतार लाये। उन्होंने उन्हें यबेश में लाकर सम्मानपूर्वक दफनाया, और सात दिन तक उपवास रखा, एक युग के अंत का शोक मनाते हुए।
इस सब का समाचार दाऊद के पास पहुँचा, जो उन दिनों सिकलग में था। जब उसने सुना, तो उसका हृदय भारी हो गया। उसने अपने वस्त्र फाड़े, और उसके साथ सभी पुरुषों ने रोया और साँझ तक उपवास किया। शाऊल ने उसका कितना पीछा किया था, उसे मार डालने का कितना प्रयास किया था। पर इस समय, वह सब कुछ भूलकर, दाऊद ने केवल एक बात देखी – यहोवा के अभिषिक्त का अंत। उसने एक विलाप गीत गाया, जिसमें गिलबोआ के पहाड़ों को शाप दिया गया था, और शाऊल-योनातान की वीरता का गुणगान किया गया था। वह जानता था कि शाऊल का पतन उसकी अवज्ञा के कारण हुआ था, उसने परमेश्वर का वचन नहीं रखा था, और एक तंत्र-मंत्रिनी की सहायता लेने गया था। इसलिए यहोवा ने उसे मार डाला, और राज्य इस्राएल के एक और व्यक्ति, दाऊद के हाथ में दे दिया।
और इस तरह, गिलबोआ के सुनसान पहाड़ों पर एक राजवंश का सूर्य अस्त हो गया, और एक नए युग के उदय की पृष्ठभूमि तैयार होने लगी।




