पवित्र बाइबल

प्रार्थना से मिली नई सुबह

वह रात ऐसी थी मानो अँधेरे ने सब कुछ निगल लिया हो। हेमंत की हवा में सन्नाटा बोल रहा था, और मैं अपनी झोंपड़ी के कोने में सिकुड़ा, अपने दर्द से लड़ रहा था। बुखार तो था ही, पर उससे भी ज्यादा एक भीतरी टूटन थी जो हड्डियों तक को कचोट रही थी। डॉक्टर वाले कह चुके थे, “अब ऊपर वाले का ही भरोसा है।” यही वो पल था जब मेरा अभिमान, मेरी सब ताकत, रेत की दीवार की तरह ढह गई। आँखें बंद करके मैंने फुसफुसाया, “हे प्रभु, तू ही मेरा सहारा है।”

सुबह का पहला उजाला जब खिड़की की झिर्री से आकर मेरे चेहरे पर पड़ा, तो एक अजीब सी हल्कापन महसूस हुआ। बुखार उतर रहा था, जैसे कोई भारी पत्थर हट गया हो। धीरे-धीरे, दिन बीतते गए। ताकत लौटी, गालों पर फिर से रंग आया। एक दिन मैं दहलीज पर बैठा था, और सामने खड़े जैतून के पेड़ पर एक चिड़िया की चहचहाहट सुन रहा था। उसकी आवाज में एक गीत था, एक उत्सव। तभी अचानक मन में बात आई – यह जान तो उसी की देन है, यह सुबह उसी की कृपा से मिली है।

मुझे याद आया अपने बचपन के दिन, जब पिता के साथ यरूशलेम की ओर चढ़ाई चढ़ते हुए हम गाते थे, “तेरा क्रोध तो एक पल रहता है, पर जीवन भर तू अनुग्रह करता है।” उस वक्त समझ नहीं थी उन शब्दों की गहराई। आज लग रहा था जैसे वो पंक्तियाँ मेरे अपने अनुभव से निकली हों।

एक शनिवार की सुबह, मैं पूरी तरह ठीक हो चुका था। मैंने अपने सबसे अच्छे कपड़े निकाले, और पैदल ही मन्दिर की ओर चल पड़ा। रास्ते में लोग मिले, हैरानी से पूछा, “क्या हुआ, इतने चेते कैसे?” मैं मुस्कुरा देता, बस इतना कहता, “प्रभु ने सुन लिया।”

मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए पैरों में एक नया जोश था। भीतर, धूप का सुगन्धित धुआँ हवा में लहरा रहा था, और लेवी याजकों का गान गूँज रहा था। मैंने वहीं, उस पवित्र स्थान में, अपना सिर झुकाया। आँखों से आँसू बह निकले, पर ये दुख के नहीं, बल्कि उस अकथनीय कृतज्ञता के थे जो शब्दों से बाहर थी। मन ही मन मैं गुनगुनाया, “तूने मेरा विलाप नृत्य में बदल दिया, मेरे टाट उतारकर मुझे आनन्द का वस्त्र पहनाया।”

घर लौटते वक्त शाम ढल रही थी। पहाड़ियों के पीछे से सूरज की लालिमा फैली हुई थी। मेरे मन में एक गीत उमड़ रहा था, शब्द अपने आप बनते जा रहे थे। मैंने एक लोहे का छोटा सा बरतन और एक डंडा उठाया, और धीमे-धीमे उस पर थाप देकर गाना शुरू किया – “हे प्रभु, मैं तुझे स्तुति करूंगा, क्योंकि तूने मुझे खींच लिया और मेरे शत्रुओं को मेरे विषय आनन्दित न होने दिया।”

पड़ोस के बच्चे इकट्ठा हो गए, और मैं उन्हें अपना गीत सुनाने लगा। उनकी चमकती आँखों में मैंने देखा – यह गवाही सिर्फ मेरी नहीं रही। यह उन सबके लिए एक सबक थी जो समझते हैं कि जीवन की डोर हमारे हाथ में है। नहीं, वह तो उसकी मुट्ठी में है, जो रात को रोने के लिए देता है, पर सुबह आनन्द अवश्य लाता है।

आज, वो रातें बीते जमाने की बात हो गई हैं। पर उसकी स्तुति का गीत मेरे होंठों से कभी दूर नहीं हुआ। क्योंकि मैंने जान लिया है – मनुष्य का अभिमान उसे गिरा देता है, पर विनम्र प्रार्थना उसे फिर से जीवन के सिंहासन पर बिठा देती है। और यही सच्चाई, इस मिट्टी के बरतन में छिपी हुई, मेरे गीत की हर पंक्ति में धड़कती है।

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