पवित्र बाइबल

सृष्टि की सुबह में बुद्धि का आह्वान

एक समय की बात है, जब सृष्टि की सुबह थी और समय के पैमाने पर ओस की बूंदें टपक रही थीं। वह प्राचीन दिन, जब पर्वतों की नींव भी नहीं रखी गई थी, और सागर की गर्जना अभी सपने में भी नहीं सुनाई देती थी। उस अथाह, निराकार गहराई में, एक आवाज़ थी। कोई चिल्लाहट नहीं, कोई ज़ोर नहीं, बल्कि एक सतत, मधुर स्वर—जैसे किसी अनंत स्रोत से फूटता झरना।

वह स्वर था बुद्धि का।

वह सदा से वहाँ थी। जब अकेले परमेश्वर ने आकाश को नापा, और गहराइयों को एक चौड़ाई दी, तब वह उसकी सहचरी थी। एक कुशल कारीगर की तरह, प्रभु के पास रहकर वह हर रचना में आनंदमग्न हो उठती। वह उसके पास खड़ी रहती, जब धरती की नींव के खंभे गड़े जा रहे थे। वह मुस्कुराती रहती, जब समुद्र को उसकी सीमा दी जा रही थी और उसकी लहरें उस रेखा से आगे नहीं बढ़ सकती थीं। बादलों के ऊपर, जब सुबह के तारे मिलकर गीत गा रहे थे, बुद्धि वहीं थी—प्रत्येक अणु, प्रत्येक नियम, प्रत्येक सामंजस्य में समाई हुई।

और फिर मनुष्य आया। धरती पर पग-ध्वनि सुनाई दी। तब बुद्धि ने अपना मुख मोड़ा। अब वह केवल सृष्टि के रहस्यों में नहीं रह गई थी। वह मार्गों के किनारे, शहर के फाटकों पर, द्वारों के मुहाने पर आ खड़ी हुई। उसका स्वर बदला नहीं था—वही मधुर, वही टिकाऊ—पर अब वह मनुष्य की ओर उन्मुख था।

“हे मनुष्यों, मैं तुम्हें पुकारती हूँ,” उसकी आवाज़ हवा में तैरती। “मेरी आवाज़ सुनो। मैं सरल बातें कहती हूँ, सीधी और स्पष्ट। सच बोलना मेरे अधरों से टपकता है। मेरे मुख से दुष्टता नहीं, केवल न्याय निकलता है। जो मुझे पाते हैं, वह जीवन पाते हैं, और प्रभु की कृपा।”

पर कितने सुनते? कुछ तो दौड़ते हुए निकल जाते, अपनी व्यस्तताओं में डूबे। कुछ ठहरते, कान लगाकर सुनते, पर फिर चालाकी के घने जंगल में भटक जाते। कुछ उसकी आवाज़ को पहचानते, पर मिट्टी के खिलौनों में ही उलझे रह जाते। पर बुद्धि निराश नहीं हुई। वह प्रतिदिन, प्रतिक्षण उसी स्थान पर खड़ी रहती—शहर के उसी कोलाहलपूर्ण चौराहे पर, जहाँ जीवन की दौड़ सबसे तेज होती है।

एक दिन, एक युवक वहाँ से गुजरा। उसके चेहरे पर उलझन के बादल थे, जीवन के निर्णयों का बोझ उसके कंधों को झुकाए दे रहा था। उसने वह आवाज़ सुनी। पहले तो उसने सोचा, कोई भिखारी गा रहा है, या कोई पागल बड़बड़ा रहा है। पर आवाज़ में एक ऐसा आकर्षण था, जो उसे खींचता चला गया। वह ठहर गया।

“तुम कौन हो?” उसने पूछा, अपने चारों ओर देखते हुए। कोई स्पष्ट रूप नहीं दिखा।

“मैं वह हूँ जो सत्य के मार्ग पर चलाती हूँ,” आवाज़ आई, कोमल पर दृढ़। “मैं धन-दौलत से बढ़कर हूँ, क्योंकि मेरा फल सोने-चाँदी से उत्तम है। मैं न्याय से प्रेम करती हूँ, और बुराई से घृणा। राजाओं का राज्य मेरे द्वारा स्थिर रहता है, और शासक मेरे द्वारा ही धर्म से शासन कर पाते हैं।”

युवक बैठ गया, एक पत्थर पर। उसने अपना सिर हाथों में टिका लिया। “पर मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूँ। मेरे पास कोई सिंहासन नहीं है। मेरे निर्णय तो केवल मेरे छोटे-से जीवन को प्रभावित करते हैं। तुम मुझसे क्या चाहती हो?”

एक मृदु हँसी हवा में गूँजी, जैसे पत्तियों का सरसराना। “मैं हर एक को चाहती हूँ जो मुझे चाहता है। मैं उस बच्चे के पास होती हूँ जो सत्य बोलने का साहस जुटाता है। मैं उस कारीगर के पास होती हूँ जो अपना काम ईमानदारी से करता है। मैं उस माँ के पास होती हूँ जो धैर्य से बच्चे को समझाती है। मैं राज्य नहीं, चरित्र चाहती हूँ। मैं सिंहासन नहीं, सत्य के प्रति प्रेम चाहती हूँ। मुझे खोजो, और तुम पाओगे। द्वार खटखटाओ, और तुम्हारे लिए खोला जाएगा।”

युवक ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसने जीवन भर की दौड़ में कभी रुककर सोचा ही नहीं था। सब कुछ प्राप्त करना था—धन, मान, सफलता। पर यह आवाज़ कुछ और ही दे रही थी—शांति, स्थिरता, एक अटल आधार। उसने एक गहरी सांस ली।

“ठीक है,” उसने कहा, “मैं तुम्हें खोजना चाहता हूँ। मुझे बताओ कि कहाँ शुरू करूँ।”

“यहीं से,” बुद्धि की आवाज़ फुसफुसाई। “इसी क्षण से। जब तुम न्याय करो, तब मैं तुम्हारे साथ हूँ। जब तुम दयादिखाओ, तब मैं वहाँ हूँ। जब तुम सरल रहो, तब मैं तुम्हारे भीतर बसी हूँ। मैं कोई दूर की वस्तु नहीं हूँ। मैं तो उसी की सहचरी हूँ, जिसने यह सब बनाया। और वह तुमसे प्रेम करता है। मुझमें आनंदित होने वाला, वास्तव में, उसी में आनंदित होता है।”

सूरज ढलने लगा था। चौराहे पर भीड़ कम हो गई थी। युवक उठ खड़ा हुआ। उसके चेहरे की उलझन अब पिघल गई थी, एक शांत संकल्प की रेखाओं में बदल गई थी। उसने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराया और चल पड़ा। उसके कदम अब भारी नहीं थे।

और बुद्धि वहीं खड़ी रही, अगले पथिक की प्रतीक्षा में, जैसे वह सदियों से करती आई है। उसका आह्वान थमता नहीं। वह तो सृष्टि के प्रारंभ से है, और सृष्टि के अंत तक रहेगी—हर उस मनुष्य के कानों में एक मधुर, अविरल गूंज, जो सुनने का साहस जुटा पाए।

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