वह दिन ठीक वैसे ही शुरू हुआ जैसे उत्तर प्रदेश के उस छोटे से गाँव के अधिकतर दिन शुरू होते थे। कृष्णा की आँखें खुलीं तो सूरज की पहली किरणें अपना रास्ता बनाती हुई, कच्ची मिट्टी की दीवारों पर पड़ रही थीं। वह उठा, अपने जोड़ों का दर्द महसूस करता हुआ। साठ साल की उम्र में भी उसकी सुबह चार बजे शुरू हो जाती थी। बाहर निकला तो हवा में नमी थी और आसमान में बादलों के गहरे झुण्ड, मानो कुछ सोच-विचार कर रहे हों। उसने अपने दो बैलों—श्याम और गोरा—को पुचकारा। आज खेत में जुताई का काम पूरा करना था।
कृष्णा का जीवन एक लय में बंधा हुआ था। जुताई, बुआई, सिंचाई, कटाई। फिर वही चक्र। उसके पिता और उनके पिता भी यही करते रहे थे। कभी-कभी रात के समय, चूल्हे की लौ के सामने बैठे, उसके मन में प्रश्न उमड़ते-घुमड़ते। सब कुछ इतना निश्चित क्यों? इतनी मेहनत, इतना परिश्रम, और फिर भी साल दर साल एक जैसी ही चिंता—अगले मौसम में फसल अच्छी होगी या नहीं? उसके पड़ोसी मोहन, जो उससे कम परिश्रम करता था, उसकी फसल कई बार बेहतर हो जाती थी। और फिर वह युवक गोपाल, जो शहर से नया-नया लौटा था, उसने तो बिना खेत जोते ही नई तकनीक से टमाटर की खेती शुरू कर दी और मुनाफा कमाया। कृष्णा इन बातों को देखता रहता, पर कुछ कहता नहीं। उसकी सोच उसकी माँ की तरह गहरी और चुप थी।
उस दिन दोपहर तक आसमान और भारी हो गया। पहली बूंद गिरी तो कृष्णा ने अपना हल रोक दिया। बारिश अच्छी थी, पर उसकी आँखों में एक चिंता थी। नदी का जलस्तर पहले ही बढ़ रहा था। शाम होते-होते हल्की फुहार तेज मूसलाधार बारिश में बदल गई। गाँव वाले इकट्ठा हुए। नदी किनारे बसे उनके घर खतरे में थे। कृष्णा ने अपने परिवार—पत्नी, बेटा, बहू और दो नातिनों—को सम्भाला। रात भर वे सब स्कूल की ऊँची इमारत में, दूसरे परिवारों के साथ बैठे रहे। बारिश की आवाज और बच्चों के रोने के बीच, कृष्णा खिड़की से बाहर अँधेरे को देखता रहा। उसने जीवन में बहुत कुछ देखा था। अकाल देखा था, समृद्धि देखी थी। अचानक मौत देखी थी—उसका छोटा भाई, स्वस्थ और हँसता-खेलता, एक साँप के काटने से चला गया था। और फिर वह बुढ़िया मैना, जो गाँव की सबसे दुष्ट और लड़ाकू समझी जाती थी, वह भी उसी बुढ़ापे में शांत होकर चल बसी, जैसे कोई दीपक बिना किसी हलचल के बुझ जाता है।
सुबह हुई तो तबाही का मंजर था। नदी ने कई घर बहा दिए थे। कृष्णा का घर तो बच गया, पर उसका खेत, जिसमें उसने इतनी मेहनत से बीज बोए थे, पानी में डूब चुका था। कीचड़ और टूटी हुई फसल। वह खड़ा देखता रहा। उसके बेटे का चेहरा गुस्से और निराशा से भरा था। “इतनी मेहनत बेकार, बाबू। सब पानी-पानी।” कृष्णा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपनी टूटी हुई बाड़ को सीधा करने का प्रयास शुरू कर दिया।
कुछ दिन बाद, जब गाँव में फिर से जीवन की साधारण गति लौटने लगी, तो गाँव के मुखिया के बेटे की शादी थी। संगीत बज रहा था, लोग नाच-गा रहे थे, थालियों में खाना परोसा जा रहा था। कृष्णा भी वहाँ गया। उसने अपने साधारण कपड़े पहने, अपने हाथों की मिट्टी धोई, और बैठकर गरम-गरम रोटी और सब्जी खाई। उस पल में, संगीत की धुन पर नातिनों के नाचते हुए, उसके चेहरे पर एक मंद सी मुस्कान थी। उसने सोचा—जीवन इतना टेढ़ा है। एक तरफ तबाही, दूसरी तरफ उत्सव। एक तरफ अथक परिश्रम जो पल में बह जाए, दूसरी तरफ एक प्याली चाय और दोस्त की बात का सुख। उसे याद आया कि कैसे उसके पिता कहा करते थे, “समय और घटना सबके सामने एक जैसी है। अच्छे के लिए, बुरे के लिए, शुद्ध के लिए, अशुद्ध के लिए।”
शाम को वह अपनी छोटी सी झोपड़ी के सामने चारपाई पर बैठा था। उसकी पत्नी ने उसे चाय दी। उसने उसे देखा। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, हाथ खुरदरे थे, पर उसकी आँखों में वही शांति थी जो तीस साल पहले थी। उसने उसका हाथ थाम लिया। कोई शब्द नहीं थे। वह जानता था कि मृत्यु एक दिन आएगी। वह उस भयंकर बाढ़ की तरह अनिश्चित नहीं, बल्कि उस सूरज की तरह निश्चित है जो हर शाम अस्त होता है। पर उस पल में, चाय की गर्माहट और हाथ की उपस्थिति में, जीवन मूल्यवान लग रहा था।
उसने अगले दिन फिर से खेत में जाने का निश्चय किया। कीचड़ साफ करना होगा, कुछ नए बीज जुटाने होंगे। शायद अगली फसल बेहतर हो। शायद न हो। यह उसके हाथ में नहीं था। पर उठना, हल उठाना, और बैलों को आवाज देना—यह उसके हाथ में था। जीवन की यह विडम्बना उसे अब समझ आने लगी थी। सब कुछ व्यर्थ है, और फिर भी हर सुबह एक उपहार है। हर रोटी एक आशीष। हर मुस्कुराता हुआ चेहरा एक वरदान। परमेश्वर ने सब कुछ अपने समय में रखा है, और मनुष्य का काम है कि वह अपने हिस्से का श्रम करे, अपने हिस्से का आनन्द ले, और उस हाथ को समर्पण में छोड़ दे जो सब कुछ सम्भाले हुए है।
और इस तरह, कृष्णा ने अपनी चारपाई पर एक लम्बी साँस ली। रात के तारे निकल आए थे। कल फिर सुबह होगी।




