पवित्र बाइबल

बाबुल के पतन की दृष्टि

यह वह समय था जब दुनिया अपनी धुरी से टूटती प्रतीत हो रही थी। मेरे कक्ष की छत पर लकड़ी का पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था, मगर हवा में कोई शीतलता नहीं थी, केवल एक भारी, दमघोंटू गर्मी थी जो आने वाले तूफ़ान का संकेत देती थी। मैं यरूशलेम के पुराने घर में बैठा हुआ था, और मेरी आत्मा बेचैन थी। परमेश्वर का हाथ मुझ पर भारी था, एक दबाव जो हड्डियों तक को कंपा देता था।

फिर दृष्टि आई।

मैं स्वयं को एक सुनसान, उजाड़ भूमि में खड़ा पाया। चारों ओर रेत के टीलों के सिवाय कुछ नहीं – “वीराने का देश” जैसा कि वचन कहता है। दिन का प्रकाश एक विषैले पीले रंग में डूबा हुआ था। और तभी, दूर क्षितिज पर, एक अश्वारोही आता दिखा। नहीं, केवल एक नहीं; पहले एक, फिर उसके पीछे दूसरा। घोड़ों की टापों की आवाज़ रेत को चीरती हुई, एक लयबद्ध, अशुभ गर्जना की तरह सुनाई दे रही थी। पहला सवार खच्चर पर सवार था, दूसरा ऊँट पर। वे इतनी तेजी से आ रहे थे कि उनके चेहरे धुंधले से थे, केवल उनकी चाल में एक बेकरारी, एक संकट की सूचना साफ़ झलक रही थी।

मैं चिल्लाना चाहता था, पूछना चाहता था, “पहरेदार! रात कितनी हुई?” मगर मेरा गला सूना था। और फिर, ऐसा लगा मानो मैं स्वयं ही वह पहरेदार बन गया हूँ, जो एक ऊंचे मीनार पर खड़ा है, जिसकी आंखें रेगिस्तान की ओर तनी हुई हैं। घंटों बीत गए। रात का अंधेरा और भी गहरा, और भी भयावह हो गया। तभी, दूर, पूर्व दिशा में, एक झिलमिलाती रोशनी दिखाई दी। बाबुल। वह महान नगर, अहंकार और वैभव का प्रतीक, जो फरात नदी के किनारों पर जगमगा रहा था।

किंतु उस चमक में कुछ गड़बड़ थी। वह एक रोगी की आंखों-सी चमक रही थी। और फिर आवाज़ें आनी शुरू हुईं। पहले तो दूर से, फिर नज़दीक से। चीखें। घोड़ों की हिनहिनाहट। धातु के टकराने की भयानक आवाज़। यह एक विजय का कोलाहल नहीं था, बल्कि एक पतन की गड़गड़ाहट थी। मेरी आत्मा के भीतर एक चीत्कार उठी: “बाबुल गिर गया! वह गिर गया!” यह वह वाक्य था जो मेरे होठों पर था, मगर जैसे कोई और मेरे द्वारा बोल रहा हो। उसके सब मूर्तियों के टुकड़े-टुकड़े भूमि पर पड़े हैं। परमेश्वर का हथौड़ा उस पर पड़ चुका है।

दृष्टि इतनी स्पष्ट थी कि मेरे शरीर में एक कंपकंपी दौड़ गई। मैं अपने कमरे में वापस था, मेरी पीठ पसीने से तर थी। मेरे सामने बैठे लोगों के चेहरे पीले पड़ गए थे। उन्होंने पूछा, “इसायाह, तुम्हें क्या हुआ?” मैं केवल इतना कह सका, “कड़वी बातें देखी हैं मैंने।”

फिर मेरा ध्यान दूसरी ओर मुड़ा – दुमा की ओर। सेईर के देश की ओर। वहां के लोग अंधेरे में टटोल रहे होंगे, यह पूछते हुए कि रात कब टलेगी। उनके लिए मेरे पास कोई सांत्वना नहीं थी, केवल एक कठोर प्रतिध्वनि: “सवेरा तो आता है, पर अभी रात ही है। फिर भी तुम पूछोगे, तो फिर आकर पूछ लेना।”

और अंत में, अरब की घाटियों का दृश्य। देदान के काफिले भय से सहमे हुए, झाड़ियों में छिपने को मजबूर। उन्हें पानी और रोटी लेकर भागना पड़ा। वे सैनिकों से, तलवारों से, और उस तनावपूर्ण धनुष से बचने के लिए दौड़ रहे थे जो हर ओर से खिंचा हुआ था।

मैंने अपनी गीली आंखें मूंद लीं। यह दृष्टि केवल बाबुल के बारे में नहीं थी। यह उन सभी राज्यों के बारे में थी जो अपनी शक्ति पर घमंड करते हैं, जो परमेश्वर को भूल जाते हैं। वह घड़ी जब उनकी नींव हिल उठती है, तब उनके सारे गौरव का ढांचा धूल में मिल जाता है। मैंने मेज पर पड़ी एक मोमबत्ती को देखा। उसकी लौ टिमटिमा रही थी, एक तेज़ हवा के झोंके का इंतज़ार कर रही थी। मेरा हाथ कांप रहा था जब मैंने अपनी पट्टी और कलम उठाई। इन शब्दों को लिखना ही था, चाहे वे कितने ही भारी क्यों न हों। क्योंकि पहरेदार का कर्तव्य है कि वह जो देखे, उसकी सूचना दे। चाहे सुनने वालों के लिए वह सुखद हो या न हो।

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