यिर्मयाह को पता था कि आज का दिन कठिन होगा। सुबह की धूप यरूशलेम की पथरीली गलियों पर पड़ रही थी, पर उसकी आत्मा में एक ठंडक बैठी हुई थी। भगवान का वह शब्द, जो अक्सर उसके भीतर एक जलती हुई आग की तरह उठता था, आज विशेष रूप से भारी था। वह अपनी कोठरी से निकला, उसके हाथ में एक साधारण मिट्टी का घड़ा था, जो कुम्हार की दुकान से नया खरीदा गया था। उसका स्पर्श ठंडा और खुरदुरा था, पर उसमें एक संभावना छिपी थी—पानी ढोने की, या फिर टुकड़े-टुकड़े हो जाने की।
वह नगर के दक्षिणी द्वार की ओर चल पड़ा। रास्ते में लोग उसे देख रहे थे। कुछ की निगाहों में उपहास था, कुछ में डर, तो कुछ सिर्फ उदासीन थे। यिर्मयाह ने कभी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। उसकी नज़र हिन्नोम की घाटी पर टिकी हुई थी, जो नगर के बाहर एक गहरी, उदास खाई जैसी थी। लोग उस जगह को ‘तोपेत’ कहते थे, पर यिर्मयाह के लिए वह सिर्फ एक चीख का नाम था—वह चीख जो उन मासूमों की थी, जिन्हें इसी घाटी में मोलेक की अग्नि में होम कर दिया जाता था। हवा में आज भी वही गंध थी—धुएँ की, राख की, और किसी अनकही पीड़ा की।
घाटी के किनारे पहुँचते-पहुँचते उसके पाँव धूल से सने हुए थे। वहाँ कुछ बुजुर्ग याजक और नगर के पुरनिए खड़े थे, जिन्हें उसने पहले ही बुलवाया था। उनके चेहरे पर हैरानी और अधीरता थी। “फिर क्या उपदेश देना है, यिर्मयाह?” एक ने कर्कश स्वर में पूछा। यिर्मयाह ने कोई जवाब नहीं दिया। वह घाटी के किनारे खड़ा हो गया, जहाँ से नीचे की ओर ढलान थी, और चारों ओर बिखरी हुई मानव की हड्डियाँ सफेद धब्बों की तरह दिख रही थीं।
उसने अपनी आवाज़ उठाई। वह आवाज़ हवा में काँपती हुई फैल गई, एकदम साफ, बिना लाग-लपेट के। “सुनो! यहोवा का यह वचन सुनो, हे यहूदा के राजाओं और यरूशलेम के निवासियो!” उसकी बात शुरू हुई तो आसपास की हवा भी स्तब्ध लगने लगी। उसने उन अभिशापों की बात की, जो इस स्थान पर आने वाले थे। उसने उनकी कठोर गर्दनों की, बाल देवताओं के लिए बनाए गए उसके उच्च स्थानों की, और निर्दोषों के रक्त से सनी हुई इस भूमि की बात की। “इसीलिए,” उसकी आवाज़ में एक गहरा दर्द उभरा, “यह स्थान अब तोपेत या हिन्नोम की घाटी नहीं, बल्कि ‘हत्या की घाटी’ कहलाएगा।”
वह रुका। उसने अपने हाथ में पकड़े मिट्टी के घड़े को देखा। सूरज की रोशनी में वह चमक रहा था, मानो उसमें अभी भी जीवन हो। फिर, भगवान के शब्द उसके कंठ से फूटे, “मैं इस लोग की योजना को ऐसे ही तोड़ दूंगा, जैसे कोई मनुष्य कुम्हार के बनाए बर्तन को तोड़ देता है, जिसे फिर जोड़ा नहीं जा सकता।”
एक गहरी सांस लेकर उसने अपना हाथ ऊपर उठाया। सबकी निगाहें उस घड़े पर टिक गईं। और फिर, एक तीव्र, कर्कश ध्वनि के साथ, उसने उसे ज़मीन पर पटक दिया। मिट्टी का घड़ा तत्काल टूट गया, उसके अनगिनत टुकड़े चारों ओर बिखर गए। कुछ छोटे-छोटे कण हवा में उड़े, कुछ बड़े टुकड़े उसकी टांगों के पास गिरे। वह पूरी तरह नष्ट हो चुका था। उसमें से कुछ भी बचा नहीं था, न कोई आकार, न कोई उपयोगिता।
खामोशी छा गई। वे टुकड़े, जो अभी तक एक सुंदर पात्र थे, अब महज मिट्टी के ढेर थे। यिर्मयाह ने उन टुकड़ों की ओर इशारा करते हुए कहा, “यहोवा ऐसे ही इस लोग और इस नगर को तोड़ेगा। इसे ऐसे ही तोड़ा जाएगा जैसे कुम्हार का बरतन टूट जाता है। और तोपेत में लोग इतने दफनाए जाएंगे कि दफनाने की जगह ही नहीं बचेगी।”
वह इतना बोलकर चला गया। उसके पीछे वे बुजुर्ग खड़े रहे, एक टूटे हुए घड़े के टुकड़ों को निहारते हुए। घाटी में से एक ठंडी हवा का झोंका उठा, जिसने मिट्टी के उन चूरों को और भी दूर फैला दिया। यिर्मयाह शहर की ओर लौट रहा था, उसके कपड़ों पर मिट्टी की धूल लगी थी। उसे पता था कि लोग उसकी बात नहीं मानेंगे। वे उसे पागल कहेंगे। पर वह टुकड़े वहीं पड़े रहेंगे—एक गूँगी चेतावनी की तरह, जब तक कि भगवान का वह दिन नहीं आ जाता, जब यह सब वास्तविकता बन जाएगा।
वह द्वार से होकर अंदर गया। कुछ बच्चे दौड़ते हुए निकले, उनकी हँसी हवा में गूँज रही थी। यिर्मयाह ने एक पल को अपनी आँखें बंद कीं। उसने उस हँसी में भविष्य की चीख न सुननी चाही। पर भगवान का शब्द उसके भीतर अब भी गूँज रहा था—साफ, निर्मम, और टूटे हुए मिट्टी के एक-एक टुकड़े की तरह अटल।




