समुद्र का किनारा वैसा ही था, जैसा सदियों से रहा आया था – अनंत, गहरा, और रहस्यों से भरा। मछुआरे अपनी दैनिक दिनचर्या में लगे थे, और आकाश में चीलें चीख रही थीं। पर उस दिन, हवा में एक अजीब सी गंध थी, जैसे लोहे और बिजली का मिश्रण। पानी, जो हमेशा एक लय में चलता था, अचानक स्तब्ध हो गया। लहरें रुक गईं, और एक गहरा, दम घोंट देने वाला सन्नाटा छा गया।
फिर समुद्र फटा।
यह कोई प्राकृतिक उथल-पुथल नहीं थी। यह ऐसा था मानो सृष्टि का ताना-बाना ही किसी ने चीर दिया हो। पानी उबलता हुआ, काले और सफेद फेन के गुबार उड़ाता, केंद्र में एक शून्य सा बना रहा था। और उस शून्य से ‘वह’ प्रकट हुआ। एक जीव, पर जीव नहीं। एक रूप, पर रूप नहीं। उसका शरीर तेंदुए जैसा चंचल था, पर पैर भालू के से मजबूत और मुंह सिंह का सा गर्जनकारी। उसके सात सिर थे, जिन पर ईशनिन्दा के नाम खुदे हुए थे – नाम जो सत्ता, लोभ और घमंड के प्रतीक थे। दस सींगों पर दस मुकुट, सारी मानवीय राजशक्ति का दावा करते हुए।
लोग भागे नहीं। एक विचित्र मोह ने उन्हें जकड़ लिया था। उसकी आंखों में एक ऐसी चमक थी जो आत्मा को भेद देती थी, और उसके चेहरे पर एक घाव का निशान था – गहरा, मौत का, पर अजीब तरह से जीवित। यह घाव उसकी शक्ति का स्रोत और प्रमाण दोनों था। समुद्र किनारे खड़े लोगों में से एक, एक बूढ़ा मछुआरा, अपने घुटनों पर गिर पड़ा। वह डरा नहीं था, बल्कि एक अज्ञात आकर्षण से भर गया था। उसने देखा कि घाव सचमुच ठीक हो गया। एक चमत्कार था, पर उल्टा। मृत्यु ने जीवन दिया था। और फिर एक स्वर उठा, पहले एक, फिर दस, फिर सैकड़ों में – “इसके समान कौन है? इससे युद्ध करने को कौन सामर्थ्य रखता है?”
उस जीव, पशु ने, बोलना शुरू किया। उसकी आवाज़ में संगीत था, तर्क था, वादा था। उसने शांति की बात की, एक नए युग की, जहां अंतहीन समृद्धि होगी। उसने धर्मों की पुरानी कट्टरताओं को कोसा, और एक नए, व्यावहारिक भक्ति का आह्वान किया – उसकी भक्ति, जो सीधे सफलता और सुरक्षा से जुड़ी थी। उसने चालीस दो महीने का समय मांगा। और संसार ने, थके-हारे, टूटे हुए संसार ने, उसे दे दिया। राजाओं ने उसके आगे सिर झुकाया। बाज़ारों ने उसका गुणगान किया। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर – सबके दरवाजे उसकी मूर्तियों के लिए खुल गए।
पर यह आधा चमत्कार था। असली चमत्कार तो तब हुआ जब पृथ्वी ने अपना उपहार दिया। एक दूसरा पशु प्रकट हुआ। वह मेमने के समान मृदु लगता था, उसके दो सींग थे। पर उसकी आवाज़ ड्रैगन की थी – पहले पशु की ही प्रतिध्वनि। उसका काम स्पष्ट था : पहले की आराधना को संभव बनाना। वह बड़े चमत्कार दिखाता : आकाश से आग बरसाता, मूर्तियों को बोलने की शक्ति देता। उसने एक छवि बनाई, पहले पशु की, जो सचमुच सांस लेती थी। और उसने एक कानून बनाया : हर किसी को, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, आज़ाद-गुलाम, अपने दाहिने हाथ या माथे पर एक चिन्ह लेना होगा। बस एक छोटा सा निशान, एक कोड, जो खरीद और बिक्री की चाबी थी। बिना उस चिन्ह के, अब कोई कुछ भी खरीद नहीं सकता था। न रोटी, न दवा, न आश्रय।
गाँवों और शहरों में एक अजीब सी व्यस्तता छा गई। लोग उत्साह से उस निशान को ग्रहण करने लगे। “इतना छोटा सा काम,” वे कहते, “इतना बड़ा फायदा।” भय और लालच ने उनकी आत्माओं को जकड़ लिया। पर कुछ लोग थे जो पीछे हट गए। वे चुपचाप, दृढ़तापूर्वक खड़े रहे। एक बूढ़ी औरत, जिसने अपना सारा जीवन प्रार्थना में बिताया था, ने कहा, “मेरी आत्मा पर केवल एक ही नाम लिखा जा सकता है।” एक युवक, जिसका परिवार उससे किनारा कर गया, अपनी छोटी सी झोंपड़ी में बैठा रहा, भूखा, पर स्वतंत्र।
अब चुनाव स्पष्ट था। एक ओर थी जीवन की सारी सुविधा, पर आत्मा की गुलामी। दूसरी ओर थी दुनिया की नफरत और यातनाएं, पर अंतरात्मा की पुकार। पशु की छवि के सामने न झुकने वालों को पकड़ा जाने लगा। उनकी हंसी उड़ाई जाती, फिर यातनाएं दी जातीं, और अंत में… शांत कर दिया जाता। संसार ने एक नया गीत गाना सीख लिया था – गणित का गीत, ६६६ का अंक, जो बुद्धि और प्रगति का प्रतीक बन गया।
पर समुद्र का किनारा अब भी वहीं था। रात होती, तो आकाश में तारे टिमटिमाते, उसी क्रम में जैसे सृष्टि के आरंभ से थे। और कहीं दूर, उन अंधेरी घाटियों में, जहां अब कोई नहीं जाता था, वे लोग इकट्ठा होते – चिन्हविहीन, डरे हुए, पर आशा में बंधे। वे एक पुरानी किताब की पन्नों को पलटते, उन वचनों को पढ़ते जो कहते थे कि यह संघर्ष नया नहीं है। यह तो उसी पुराने झूठ की नयी परत है। और वे प्रार्थना करते, न किसी दृश्य मूर्ति के लिए, बल्कि उस अदृश्य, असीम प्रेम के लिए जिसका नाम उनके मस्तक और हृदय में पहले से ही अंकित था। रात गहराती जाती, और समुद्र की लहरें फिर से अपना पुराना गीत गाने लगतीं – एक ऐसा गीत जो चिरकाल से बह रहा था, और सब कुछ समाप्त हो जाने के बाद भी बहता रहेगा।




