पवित्र बाइबल

अनंत धन की खोज

वह दिन बहुत भारी था। हवा में उमस थी, और आसफ़ के मन का बोझ हवा से भी ज़्यादा गहरा। चलते-चलते उसके पाँव उसे शहर के बाहर, एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे ले आए, जहाँ से पूरा नगर दिखाई देता था। ऊँचे-ऊँचे महलनुमा घर, चमचमाते रथों की आवाज़ें, और हँसते-खेलते लोग जिनके चेहरे पर एक तरह की निश्चिंत चमक थी। आसफ़ ने अपनी मोटी सनी का चोगा सँभाला, जिसके किनारे फट रहे थे, और एक लम्बी साँस भरी।

“क्या बात है,” वह धीरे से बुदबुदाया, “इन दुष्टों का तो सब कुछ मिलता है। उनके शरीर ताज़गी और चर्बी से भरे हैं। उनकी आँखें सदा सन्तुष्टि से चमकती हैं। वे मानवीय संकट से कोसों दूर रहते हैं।”

उसकी आँखें एक विशाल हवेली पर टिक गईं, जहाँ एक जुलूस निकल रहा था। सोने के आभूषणों से लदे लोग, महँगे इत्र की महक जो वहाँ तक आ रही थी, और ऊपर छत पर मस्ती से झूमते युवक। उनकी बातें अभद्र और घमंड से भरी थीं, फिर भी आसमान उन पर अपनी कृपा बरसाता प्रतीत होता था। धन, सत्ता, सुख – सब कुछ उनकी मुट्ठी में। वे ईश्वर को चुनौती देते थे: “हमें ज्ञान क्या चाहिए? परमात्मा हमें क्या सिखाएगा?”

आसफ़ ने अपने हाथ देखे, शुष्क और काँटों के चुभने के निशान से भरे। सारा जीवन उसने सीधे रास्ते पर चलने, आज्ञाओं का पालन करने में बिता दिया था। हर सुबह प्रार्थना, हर रात आत्म-चिंतन। फिर भोर होते ही वही पिसान, वही तंगहाली, और वही दर्द जो उसकी पसलियों में चुभता रहता। “मेरे लिए तो हर नया दिन एक सज़ा लेकर आता है,” उसने सोचा। उसका विश्वास डगमगा रहा था, जैसे रेत का महल ज्वार के सामने। क्या सच में धर्म का कोई मूल्य है? क्या पवित्र रहने का कोई फल है?

यह विचार उसे इतना डरावना लगा कि वह उठ खड़ा हुआ। वह शहर की ओर नहीं, बल्कि एक सुनसान पहाड़ी की तरफ़ चल पड़ा, जहाँ एक छोटा सा मंदिर था। वहाँ पहुँचने तक साँझ होने लगी थी। मंदिर के भीतर, दीपक की टिमटिमाती लौ ने पुरानी दीवारों पर अजीब छायाएँ बनाईं। आसफ़ ने सिर झुकाया, पर उसके होंठों से कोई प्रार्थना न निकली। सिर्फ़ एक कराह थी, एक गूँजती पीड़ा।

तभी, एक घटना घटी। शब्दों में नहीं, बल्कि एक ज्ञान में, एक दर्शन में। ऐसा लगा जैसे उसकी आँखों पर पड़ा धुंधला पर्दा एकदम हट गया। उसने उन धनी, घमंडी लोगों को फिर से देखा, लेकिन अब एक भिन्न परिप्रेक्ष्य से। उसे उनका अंत दिखाई दिया। वह चमक-दमक, वह ऐश्वर्य, सब कितना नाशवान था। वे एक ऐसी चिकनी जगह पर खड़े थे जो अचानक ही फिसलन भरी हो गई। एक पल में, वे भयानक विनाश में गिरते दिखे। एक स्वप्न की तरह जो चीख़ते हुए टूट जाता है। उनकी सारी ताकत, सारी योजनाएँ, धूल में मिल गईं।

आसफ़ का दिल जोर से धड़का। “मैं कितना मूर्ख था,” वह फुसफुसाया, “एक पशु की तरह, जो सिर्फ़ देखे गए चारे को समझता है। मैं तुम्हारे सामने लगातार रहा, पर सच्चाई नहीं देख पाया।”

उसने अनुभव किया कि परमेश्वर की उपस्थिति उसकी दाहिनी ओर है, एक मज़बूत, शान्त चट्टान की तरह। उसके सारे प्रश्न, सारी ईर्ष्या, उस चट्टान से टकराकर बिखर गए। उसे एहसास हुआ कि उसकी गरीबी, उसका संघर्ष, वह भी एक तरह की कृपा थी। क्योंकि उसने उसे इस चट्टान से चिपकाए रखा था। शहर के ऐश्वर्य ने तो लोगों को उस चट्टान से दूर, खिसकती रेत पर धकेल दिया था।

एक नया गीत उसके हृदय में उमड़ने लगा। “तुम्हारे सिवा मेरी आकांक्षा और किसी की नहीं। मेरा शरीर और मेरा हृदय शायद कमज़ोर हो जाएँ, पर तुम सदा मेरे हृदय का अंश और मेरा भाग रहोगे।” उसके लिए अब धन या सांसारिक सफलता महत्वहीन थी। सच्चा धन तो वह था जो नाश नहीं होता – ईश्वर की निकटता।

जब वह मंदिर से बाहर निकला, तो रात के तारे टिमटिमा रहे थे। वही पहाड़ी, वही रास्ता, लेकिन सब कुछ बदला हुआ लग रहा था। अब वह शहर की ओर देखता, तो उसे उन हवेलियों में नाश का बीज दिखाई देता। और अपनी झोंपड़ी की याद आती, तो उसमें एक अदृश्य, अटूट धन का भाव मिलता। उसके कदम अब भारी नहीं थे। वह जानता था कि उसका मार्ग अँधेरे में भी रोशन है, और अंत उसका, उन लोगों से कहीं बेहतर है, जो केवल इसी क्षण की चमक में जीते हैं। उसने अपना सिर ऊँचा किया, और अँधेरे में घर की ओर चल दिया, एक शान्त गुनगुनाहट उसके होठों पर।

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