वह सुबह थी जब बूढ़े दाऊद ने अपनी लिखने की तख्ती सम्हाली। महल की छत पर खड़े होकर उन्होंने यरूशलेम को निहारा, पर उनकी आँखें तो कहीं और थीं – समय के पार, उस रेतीले मैदान में, जहाँ से सब शुरू हुआ था। हवा में एक सरसराहट थी, जैसे पुराने वचनों के पन्ने पलट रहे हों। उन्होंने रीढ़ की हड्डी में एक कंपन महसूस की, और जान लिया कि आज का गीत इतिहास का गीत होगा।
उनकी उँगलियाँ चल पड़ीं, और शब्द उमड़ने लगे, बिल्कुल वैसे ही जैसे यर्दन नदी वसंत में उमड़ती है।
“हे प्रभु के लोगों, उसकी प्रशंसा करो। उसके नाम का उद्घोष करो। उसके कामों को सब लोगों में जताओ।”
शब्दों ने एक रास्ता बनाया, और वह रास्ता पीछे की ओर चल पड़ा – दर्रे पार करता हुआ, रेगिस्तानों को लाँघता हुआ, उस पल पर जा पहुँचा जब सब कुछ एक आदमी, एक वादे और एक सपने से शुरू हुआ था।
हवा गर्म और रेत भरी थी। इब्राहीम खड़ा था, अपने झोंपड़े के बाहर, उन तारों को देख रहा था जो रात के काले कैनवास पर बिखरे पड़े थे। वह बूढ़ा हो रहा था, उसकी हड्डियों में दर्द था, और उसके नाम का अर्थ ‘जनसमूह का पिता’ एक विडम्बना लगता था। तभी, एक आवाज़ – न तो बादलों से आई, न हवा से। वह आवाज़ उसकी अपनी आत्मा के भीतर से उभरी, पर इतनी स्पष्ट कि जैसे कोई पास खड़ा बोल रहा हो।
“मैं तुझे देश-देश का दान दूँगा।”
इब्राहीम ने आँखें मूँद लीं। वह केवल रेत देख सकता था, केवल अपनी बाँझ पत्नी सारा को देख सकता था। पर विश्वास… विश्वास एक ऐसा बीज है जो दिखाई न देने वाली वर्षा से पनपता है। उसने विश्वास किया। और उस विश्वास ने, दशकों बाद, इसहाक के हँसने की आवाज़ को जन्म दिया। बूढ़ी सारा का ठहाका, जो आश्चर्य और अविश्वास से भरा था, वही इसराइल का पहला राष्ट्रीय गीत बन गया।
दाऊद ने एक लम्बी साँस ली। उसकी कलम ने इसहाक, फिर याकूब का नाम लिखा। याकूब – वह धोखेबाज़, वह सपनों देखने वाला, जिसने एक पत्थर का सहारा लेकर सोते हुए स्वर्गदूतों को सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते देखा था। उस सीढ़ी से एक वाचा उतरी, वही वाचा जो इब्राहीम से की गई थी। यह कोई नया वचन नहीं था, बल्कि एक पुराने वचन की पुष्टि थी, जैसे कोई मूर्तिकार अपनी कला पर बार-बार हथौड़ा चलाता है ताकि वह और भी स्थायी हो जाए।
फिर आया यूसुफ। दाऊद की आँखें नम हो गईं। यूसुफ का किस्सा हमेशा उसे भावुक कर देता था। वह लड़का, जो अपने भाइयों के ईर्ष्या के काले हाथों में फँस गया। उसकी चितकबरी चादर फाड़ डाली गई, उसे एक गड्ढे में फेंक दिया गया, और फिर उसे गुलाम बनाकर मिस्र ले जाया गया। पर प्रभु की योजना कुएँ के अँधेरे में भी चलती रहती है। गुलामी… फिर झूठे आरोप… कारागार की सीलनभरी दीवारें… यूसुफ के पैरों में बेड़ियाँ पड़ीं, पर उसकी आत्मा कभी बंधी नहीं।
दाऊद ने लिखा, “उन्होंने उसके पाँव में बेढ़ियाँ डालीं, उसका शरीर लोहे में जकड़ दिया गया।” पर अगली पंक्ति में ही, वह विजय का स्वर मिला, “जब तक उसकी बात पूरी न हुई, तब तक प्रभु का वचन उसकी परीक्षा लेता रहा।”
कारागार की उस कोठरी में, जहाँ हवा बासी और सड़न भरी थी, यूसुफ के पास केवल दो चीज़ें थीं: अपना सपना और परमेश्वर की उपस्थिति। और वही काफी था। फिरौन के सपने आए – सात पतली गायें, सात मोटी गायों को निगल गईं। सपनों की भाषा समझने वाला एकमात्र व्यक्ति वही था जिसके अपने सपनों को रौंद दिया गया था। यूसुफ ने सत्य बताया। और अचानक, वह कैदी राजकुमार बन गया। उसके हाथ से बेड़ियाँ उतार दी गईं, और उनमें फिरौन की अँगूठी पहना दी गई। अनाज के भंडार भरे गए, ताकि अकाल के काले दिनों में रोशनी बन सके।
और फिर वह पल आया। भुखमरी ने कनान की भूमि को जकड़ लिया। याकूब के पुत्र, वही जिन्होंने यूसुफ को बेचा था, रोटी की भीख माँगते हुए मिस्र के द्वार पर खड़े थे। वे उसे नहीं पहचान सके। पर वह उन्हें पहचान गया। और उस क्षण में, बदले की नहीं, बल्कि करुणा की जय हुई। “तुमने मेरे विरुद्ध बुराई का विचार किया था, परमेश्वर ने उसे भलाई के लिए बदल दिया।” यूसुफ के इन शब्दों में ही सम्पूर्ण इतिहास का रहस्य छिपा था। परमेश्वर मनुष्य की गलतियों को भी अपनी महान योजना के ताने-बाने में बुन लेता है।
दाऊद ने देखा, अब कहानी तेज़ी से बढ़ रही है। याकूब का परिवार, मात्र सत्तर जन, मिस्र में उतरा। गोशेन का उपजाऊ प्रदेश उनका नया घर बना। वे फूले-फैले। उनकी संख्या बढ़ी, उनकी ताकत बढ़ी। मिस्रियों की आँखों में एक नई चिंता दिखाई देने लगी – ये परदेशी, जो अब परदेशी नहीं रहे।
तब राजा बदला, जिसने यूसुफ को नहीं जाना। उसकी नज़रों में, ये लोग अब मेहमान नहीं, खतरा थे। उसने कहा, “आओ, हम इनपर छल से प्रबन्ध करें।” और फिर शुरू हुआ दमन का दौर। मिट्टी के ईंटों के भट्ठे, जहाँ हवा आग और धूल से भरी थी। कोड़ों की चोट, अधिकारियों की चिल्लाहट, और एक ऐसा दर्द जो केवल शरीर में ही नहीं, आत्मा में भी समा जाता है। इब्राहीम की संतानें गुलाम बना दी गईं।
पर दाऊद जानता था कि रात जितनी गहरी होती है, भोर उतनी ही निश्चित होती है। उनकी कराह प्रभु के सिंहासन तक पहुँची। और प्रभु ने सुना। वह सुनता ही है।
फिर मूसा का प्रवेश हुआ। नदी के किनारे से निकला हुआ वह बच्चा, जिसे एक टोकरी में बचाया गया था। मिद्यान के रेगिस्तान में उसका प्रशिक्षण हुआ। और फिर वह जलती झाड़ी – वह दृश्य जो हर नबी के हृदय में अंकित है। आग, पर झाड़ी जलती नहीं। एक आवाज़, “अपनी चप्पल उतार दे, क्योंकि जिस स्थान पर तू खड़ा है वह पवित्र भूमि है।”
दाऊद ने लिखा, “उसने अपना दास मूसा भेजा, वही जिसे उसने चुना था।” चुना हुआ। चुनाव का यह रहस्योद्घाटन उसकी कलम से निकला। यह योग्यता के कारण नहीं, बल्कि प्रभु की दया के कारण था।
और फिर आए वे चिह्न। मिस्र के महलों में डर फैलाने वाले चिह्न। नील नदी का लहू बनना। मेंढकों का आक्रमण। धूल का कीड़ा बन जाना। अँधेरा, जो इतना घना था कि उसे छुआ जा सकता था। हर आपदा एक दावा था – इस्राएल का परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर है। फिरौन का दिल पत्थर की तरह कठोर होता गया, जब तक कि अंतिम, सबसे भयानक आपदा न आई – हर पहिलौठे की मृत्यु।
उस रात, जब विनाश की आत्मा ने मिस्र में उड़ान भरी, इस्राएल के घरों के द्वार पर भेड़ के लहू का चिह्न था। और वह आत्मा उन द्वारों को लाँघ गई। यह छुटकारा था, बलिदान के बदले में मिली मुक्ति। उसी रात, वे जल्दी में, कढ़ाही में फूला हुआ आटा लिए, बंधन से मुक्त हुए। मिस्र ने, दुख से दबे हुए, उन्हें जाने दिया। वे चले, और उनके साथ चली वह विशाल भीड़ – मिश्रित भीड़, जो देखना चाहती थी कि यह परमेश्वर क्या करेगा।
दाऊद की कलम एक गीत बन गई। वह बादल के खम्भे की बात करने लगा, जो दिन में छाया देता था। आग के खम्भे की, जो रात में रोशनी देता था। चट्टान से पानी निकलने की, जिसने रेगिस्तान में प्यास बुझाई। और आकाश से मन्ना बरसने की, जो सुबह-सुबह ओस के साथ जमीन पर छितरा पड़ा होता था। हर चमत्कार एक सबक था: तुम अकेले नहीं हो। तुम्हारा पालनहार मार्गदर्शक है।
और फिर, अंतिम छवि। लाल सागर का तट। फिरौन की सेना पीछे, पहाड़ दाएँ-बाएँ, और आगे खुला हुआ समुद्र। एक पल का ठहराव। फिर मूसा का हाथ उठा, और समुद्र ने अपना मार्ग खोल दिया। दीवारें पानी की बन गईं, और सूखी भूमि दिखाई दी। वे दौड़े। और जब अंतिम इज़राइली ने दूसरे किनारे पर कदम रखा, तो वही पानी की दीवारें, जो उनकी रक्षा कर रही थीं, उनके शत्रुओं पर गिर पड़ीं। घोड़े और




