पवित्र बाइबल

बाबुल की नदी पर विरह

बेबीलोन की नदियों के किनारे की धूल कुछ अजीब थी। महीन और पीली, पर चिपचिपी। ऐसी लगती थी जैसे यह धरती ही नहीं, बल्कि हमारे सारे सपनों को पीसकर बनाई गई राख है। हवा चलती तो यह धूल हमारे कपड़ों, बालों, यहाँ तक कि मुँह के स्वाद में समा जाती। और हवा में हमेशा एक गंध रहती – नदी के सड़े हुए कमल के फूलों की, दूर से आती भुने हुए मांस की, और उस सबके नीचे दबी हुई, हमारे अपने पसीने की गंध।

मैं एक पुरानी जैतून की जड़ के ठूंठ पर बैठा, अपनी किन्नरी को संभाल रहा था। उसकी डोरियाँ नमी से ढीली पड़ गई थीं। बेबीलोन की यह आर्द्र हवा, यह नदियों का सतत बहाव, हमारे यहाँ के शुष्क, साफ पहाड़ों जैसा नहीं था। यहाँ सब कुछ सड़ने को आतुर रहता था। मेरी उँगलियाँ धीरे-धीरे डोरियाँ कस रही थीं, पर मेरा मन नहीं था। मन तो वहाँ था, जहाँ से इस वाद्य की आवाज़ पहली बार निकली थी।

तभी पास ही, मिट्टी के बर्तन ढोते हुए कुछ और बंधुआ चले आ रहे थे। उनमें से एक जवान लड़का, एलियाह के बेटे ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब चमक थी, वही चमक जो कभी हम सबकी आँखों में हुआ करती थी, जब हम सिय्योन के गीत गाया करते थे। उसने कहा, “बूढ़े, आज शाम…क्यों न तुम हमें कोई गीत सुनाओ? कोई गीत हमारे अपने देश का?”

उसकी आवाज़ में एक लालसा थी, जो खतरनाक थी। मैंने देखा, दूर खड़े बाबुल के पहरेदार ने अपना भाला जमीन पर टेक दिया। उनकी नज़रें हम पर टिकी थीं। वे हमारे दुःख का मनोरंजन चाहते थे, पर हमारी यादों से डरते थे।

मैंने सिर झुका लिया। मेरी उँगलियाँ किन्नरी पर रुक गईं। क्या गाऊँ? सुलैमान के प्रेमगीत? डेविद के विजयगान? हर गीत की हर पंक्ति एक चाकू की धार बनकर मेरे भीतर उतर जाती, उन यादों को कुरेदती जिन्हें दफ्न रखना ही बेहतर था। यरूशलेम की सड़कें, जहाँ बच्चों की हँसी घंटियों की तरह बजती थी। मन्दिर का आँगन, जहाँ धूप की सुगंध इतनी गहरी होती थी कि उसे तुम अपनी साँसों में उतार सकते थे। और फिर…आग। धुएँ के काले बादल। चीखें। लोहे की भयानक आवाज़। और खंडहर।

“गाओ न,” एक और आवाज़ कहीं पीछे से आई, पर वह आवाज़ टूटी हुई थी। “हम सुनना चाहते हैं।”

मैंने अपनी किन्नरी को पेड़ के सहारे टिका दिया। मेरे हाथ खाली थे, पर वे काँप रहे थे। मैंने आँखें बंद कीं। नदी के किनारे उगे那些 ऊँचे ऊँचे पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट, दूर किसी नाव के चप्पू की आवाज़, यह सब मिट जाना चाहिए था। मुझे वहाँ पहुँचना था, उन पहाड़ों तक, उस नगर तक।

मेरा गला रुंध गया। आवाज़ निकली ही नहीं। बस एक कराहनुमा साँस निकली, “हम…बेबीलोन की नदियों के किनारे बैठकर…रोते रहे…”

और फिर कुछ टूट सा गया। वह जवान लड़का ज़ोर से रो पड़ा। उसके रोने की आवाज़ में कोमलता नहीं, गुस्सा था। एक गहरा, दमित क्रोध, जो सालों से पल रहा था। मैंने अपनी आँखें खोलीं। सामने बैठे सभी चेहरे धुंधले हो रहे थे, आँसुओं से, गुस्से से, असहायता से।

तभी उनमें से एक, जिसका नाम मत्थन था और जिसका दायाँ हाथ बाबुल के लोहे से अपंग कर दिया गया था, उठ खड़ा हुआ। उसकी आवाज़ भारी थी, “हमने वहाँ अपनी किन्नरियाँ…उन विध्वंसकों की मांग पर, उन पेड़ों पर टाँग दीं। क्योंकि वे हमसे माँगते थे ‘गाओ, सिय्योन के गीत सुनाओ’।”

उसकी बात पूरी होते-होते, हवा में एक सन्नाटा छा गया। यह वह सन्नाटा नहीं था जो शांति से आता है। यह वह सन्नाटा था जो राख के ढेर के ठंडे होने पर छा जाता है। फिर मैंने बोलना शुरू किया, मेरी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी, लेकिन उसमें एक खतरनाक शांति थी, “यरूशलेम, अगर मैं तुझे भूल जाऊँ…तो मेरा दायाँ हाथ अपना काम भूल जाए। मेरी जीभ तालू से चिपक जाए, अगर मैं तुझे याद न करूँ…अगर मैं यरूशलेम को अपनी सबसे बड़ी खुशी न मानूँ।”

ये शब्द हवा में लटक गए, जैसे कोई शपथ। हर शब्द के साथ, चेहरे पत्थर की तरह कड़के होते गए। दुःख अब एक निजी बात नहीं रह गया था। वह एक प्रतिज्ञा बन गया था। एक स्मृति, जो श्राप भी थी और आश्वासन भी।

और फिर, वह अंतिम प्रार्थना, जो अपने आप ही मेरे होंठों पर आ गई। वह प्रार्थना जो हमारी चुप्पी के सबसे काले कोने से उभरती है, जब दुःख इतना गहरा हो जाता है कि उसमें से कोई अग्नि जन्म लेती है। मेरी आवाज़ धीमी थी, लेकिन हर शब्द साफ काट रहा था, “हे बेबीलोन, तू जो उजाड़ने वाला है…धन्य होगा वह, जो तेरे साथ वैसा ही करेगा जैसा तूने हमारे साथ किया। धन्य होगा वह, जो तेरे बच्चों को पकड़कर…चट्टान पर पटक देगा।”

इतना कहकर मैं चुप हो गया। कोई हलचल नहीं हुई। नदी बहती रही। पत्तियाँ सरसराती रहीं। पर कुछ बदल गया था। हमारे भीतर का रोना अब आँसुओं में नहीं, बल्कि एक लौह-दृढ़ स्मृति में बदल गया था। हम अब सिर्फ बंधुआ नहीं थे। हम वे लोग थे जो याद रखते हैं। और शायद, किसी दिन, जो लौटकर जाएँगे।

मैंने फिर से अपनी किन्नरी उठाई। इस बार उसकी डोरियाँ कसी हुई थीं। मैंने कोई गीत नहीं गाया। बस उसे छूकर, एक ऐसी धुन सुनने की कोशिश की, जो अभी दूर, बहुत दूर, पहाड़ों के पार बज रही थी। बाबुल के पहरेदार ने मुड़कर देखा, और शायद उसे लगा कि हम पराजित होकर चुप बैठे हैं। उसे क्या पता, कि हमारी चुप्पी ही अब हमारा सबसे बड़ा गीत थी।

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