सूरज ढलने लगा था, और हवा में केसर और सूखी मिट्टी की महक तैर रही थी। सुलेखा बरामदे की मुंडेर पर बैठी, दूर अंगूरों के बाग की ओर देख रही थी। उसकी उंगलियां चिकनी लकड़ी के कोरे पर बेसब्री से थिरक रही थीं। आनंद कब आएगा? उसका मन एक अजीब-सी बेचैनी से भरा हुआ था—वही बेचैनी जो बारह साल की उम्र से उसके साथ थी, जब से आनंद पहली बार उसके भाई के साथ खेतों से लौटा था और उसकी झोपड़ी में पानी मांगा था।
वह दिन भी ऐसा ही था। धूप तेज थी, और आनंद के चेहरे पर पसीने की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। सुलेखा ने जल से भरा मटका उसकी ओर बढ़ाया, और उसकी उंगलियां एक पल को छू गईं। उस छूने में एक ऐसी करंट थी जिसने सुलेखा के होश उड़ा दिए। तब से, यह प्रेम एक गहरी नदी की तरह बहता रहा, कभी शांत, कभी उफान पर, लेकिन हमेशा मौजूद।
आवाज सुनकर वह चौंकी। आनंद खड़ा था, उसके चेहरे पर थकान और मुस्कान का मिला-जुला भाव। “तुम सोच में डूबी थीं,” उसने कहा, आवाज में वही मिठास जो सुलेखा के दिल की धड़कनें बढ़ा देती थी।
“तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी,” उसने साधारण सा जवाब दिया।
वे चलने लगे, उस रास्ते पर जो जैतून के पेड़ों की कतारों से होकर गुजरता था। हवा ठंडी होने लगी थी। सुलेखा का मन अचानक एक गहरी इच्छा से भर गया। उसने कहा, “काश तुम मेरे भाई होते, जो मेरी मां के गर्भ से ही मेरे साथ पला-बढ़ा। तब मैं तुम्हें बाहर मिलती, तुम्हें चूमती, और कोई मुझ पर ताना नहीं कसता। मैं तुम्हें अपने घर ले जाती, तुम मुझे दाखरस पिलाते… वो रस जो अनार के रस से भी मीठा होता।”
आनंद ने उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में समझदारी थी। वह जानता था कि यह इच्छा सिर्फ शारीरिक निकटता की नहीं थी। यह एक ऐसा रिश्ता चाहने की थी जिसे समाज बिना शक के स्वीकार कर ले, जो इतना प्राकृतिक हो जैसे खून का रिश्ता। पर प्रेम तो इससे भी बढ़कर था। प्रेम तो अग्नि की लपट थी, यहोवा की ज्वलंत ज्योति, जिसे बुझाया नहीं जा सकता। बाढ़ के पानी की धाराएं भी इसे डुबो नहीं सकतीं। कोई इसके सामने अपना सब कुछ दे देगा, पर इसे खरीद नहीं सकता।
वे एक छोटी पहाड़ी पर चढ़कर रुके। नीचे, गांव की झोपड़ियों से धुआँ उठ रहा था। सुलेखा को अपने छोटे भाई की याद आई, जब वह छोटा था। उसकी बहनों ने कहा था, “उसके लिए हम क्या करें? जब वह बोलने लगेगा, तब उसके लिए क्या करेंगे?” पर अब वह बड़ा हो गया था। और सुलेखा खुद… वह एक दीवार थी, और उसके स्तन गढ़े हुए बुर्ज की तरह। आनंद की नजरों में वह शांति पाती थी, जैसे शलोमोन के बाग में शांति मिलती हो।
आनंद ने उसकी ओर देखा। “सुलेखा,” उसने धीरे से कहा, “तुम वह बाग हो जहाँ मैं आराम करता हूँ। तुम्हारे फल सबसे उत्तम हैं। तुम्हारी साँसें सेब के वृक्षों की सुगंध लिए होती हैं।”
सुलेखा ने उसकी बाँह पकड़ ली। “तुम भी मेरे लिए वैसे ही हो। मैं चाहती हूँ कि तुम हमेशा मेरे साथ रहो। मुझे अपने हृदय पर, अपनी बाँह पर लगा लो, क्योंकि प्रेम मृत्यु जैसा बलवान है। इसका सामर्थ्य अधोलोक जैसा दृढ़ है। इसकी चिंगारियां अग्नि की ज्वालाएं हैं, यहोवा की ज्वलंत ज्योति है।”
आनंद ने उसके हाथों को अपने हाथों में लिया। “हमारे पास छोटा-सा दाखबारी है,” उसने कहा। “हम उसकी रखवाली करेंगे। मैं तुम्हें अपना हर कुछ दूंगा। और तुम… तुम वह फव्वारा हो जो इस बाग को हरा-भरा रखेगी।”
सुलेखा ने मुस्कुराते हुए कहा, “हवा चलने दो, दाखलताएं फलने दो। मैं यहां तुम्हारे पास हूँ। मैं तुम्हें जगाऊंगी, हम साथ-साथ चलेंगे।”
और फिर, बहुत ही कोमलता से, उसने वे शब्द कहे जो उसके दिल में बसते थे। “भागो, हे मेरे प्रिय। उस मृग की तरह, या उस हिरन के बच्चे की तरह, सुगंधित पहाड़ों पर।”
आनंद ने उसकी ओर देखा, और उसकी आँखों में सारा जवाब था। वह भागा नहीं। वह वहीं खड़ा रहा, क्योंकि वह पहले ही उस पहाड़ पर पहुंच चुका था जहां सुलेखा थी। और उसकी सुगंध उसके लिए किसी दाखबारी से कम नहीं थी।
शाम ने धीरे-धीरे अपना नीला आंचल बिछा दिया। दूर, किसी चरवाहे की बांसुरी की धुन हवा में तैर रही थी। दोनों चुपचाप खड़े रहे, एक दूसरे की उपस्थिति में पूर्ण। यह प्रेम था, साधारण और गहरा, जैसे जमीन में जड़ें, जैसे आकाश में तारे। और वह जानते थे कि यह यहोवा का दिया हुआ वरदान है, जिसकी न तो कोई शुरुआत थी, न अंत। बस एक निरंतरता, जो इस छोटी सी पहाड़ी से होकर अनंत तक फैलती चली जाती थी।




