यह उस समय की बात है जब हिजकिय्याह राजा यरूशलेम में राज करता था, और अश्शूर के सिपाही देश के चारों ओर छावनी डाले हुए थे। हवा में डर का स्वाद था, मानो आने वाले तूफ़ान की गंध। हमारे गाँव के खेत सूखे पड़े थे, जैसे लोगों के विश्वास। लोग दिनभर कड़ी धूप में काम करते, पर रात को चर्चा केवल युद्ध और अकाल की होती।
एक दोपहर, जब आकाश तपता हुआ तांबे जैसा लग रहा था, हमारे गाँव में एक व्यक्ति आया। वह युवा नहीं था, पर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे दूर किसी ऐसी चीज़ को देख रहा हो जो हमें दिखाई नहीं देती। उसने अपना नाम नहीं बताया, पर गाँव के बुज़ुर्गों ने उसे फल और पानी दिया। वह हमारे नीम के पेड़ के नीचे बैठ गया, और लोग, थके हुए और उदास, धीरे-धीरे उसके चारों ओर इकट्ठा होने लगे।
उसने अपनी आवाज़ उठाई, और वह आवाज़ ऐसी थी जैसे पहाड़ों से उतरती हुई कोई नदी – गहरी, साफ़, और अटल।
“सुनो,” उसने कहा, “अभी तुम पर ऐसे लोग शासन करते हैं जो बहरे हैं। वे तुम्हारी पुकार नहीं सुनते। वे ऐसे हैं जैसे बारिश के मौसम में बादलों से मुँह फेर लें। गरीब की कराह उनके कानों तक नहीं पहुँचती। वे केवल अपने महलों की ठंडी छाया में बैठे रहते हैं, और तुम्हारी प्यास पर पानी की एक बूंद भी नहीं बहाते।”
हम सब चुप थे। हवा भी रुक सी गई थी। उसकी बात सीधे हमारे दिल में उतर रही थी, क्योंकि हमने ऐसे ही अधिकारियों को देखा था – जो न्याय के बदले रिश्वत लेते, जो सच्चाई के बदले मीठे झूठ बोलते।
“पर एक दिन आएगा,” उसकी आवाज़ में एक नया स्वर भर गया, “जब एक राजा न्याय से राज करेगा, और प्रधान ईमानदारी से शासन करेंगे। वह आदमी हवा के झोंकों से बचाने के लिए ढाल की तरह होगा। वह जंगली इलाके में बहती हुई नदी की तरह होगा। वह थके हुए यात्री के लिए भारी चट्टानों के बीच छाया देने वाली शिला की तरह होगा।”
मैंने अपने आस-पास लोगों के चेहरे देखे। किसी की आँखों में आँसू थे। किसी के होंठ हिल रहे थे, मानो प्रार्थना कर रहे हों। यह वादा इतना स्पष्ट था, इतना ठोस, मानो हम उस राजा की छाया अभी महसूस कर सकते हों।
फिर उस व्यक्ति ने हमारी स्त्रियों की ओर देखा, जो चिंता से अपने हाथों में साड़ी का पल्लू मसल रही थीं। “तुम स्त्रियाँ, जो अभी निश्चिंत और आराम से रहती हो, सावधान हो जाओ,” उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में डाँट नहीं, दुख था। “वह दिन दूर नहीं जब अंगूर की फसल काटी जाएगी, पर त्योहार नहीं मनाया जाएगा। खेतों में फसल लहलहाएगी, पर तुम्हारे भंडार घर खाली रहेंगे। काँटे और झाड़ियाँ महलों के बाग़ों में उग आएंगी, और गधे वहाँ चरने आएंगे, जहाँ अभी तक राजकुमारियाँ टहलती हैं।”
एक सन्नाटा छा गया। हमने अपने खेत देखे, अपनी झोपड़ियाँ देखीं। यह चेतावनी हमारे घर की दहलीज़ तक आ पहुँची थी।
पर उसने बात ख़त्म नहीं की। उसने अपने हाथ आकाश की ओर उठाए, जैसे आशीर्वाद दे रहे हों। “पर जब तुम पर अंत में आत्मा ऊपर से उंडेली जाएगी,” उसने कहा, और उसका चेहरा चमक उठा, “तो जंगल उपजाऊ खेत बन जाएगा, और उपजाऊ खेत जंगल समझा जाएगा। न्याय मरुभूमि में रहने का स्थान बनेगा, और धर्म चिरस्थायी शांति का अड्डा। मेरे लोग शांति के निवास, निश्चिंत के आराम और सदैव की निर्भयता के धाम में बसेंगे।”
वह इतना कहकर चला गया, जैसे आया था वैसे ही – चुपचाप। पर उसके शब्द हमारे साथ रह गए, जैसे बीज जो सूखी भूमि में गिरे हों।
कई वर्ष बीत गए। अश्शूर आए और चले गए। अकाल आया और गया। हमारे गाँव में कुछ बूढ़े लोग अब भी उस दोपहर की बात करते हैं। जब भी कोई युवक अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाता है, तो वे कहते हैं, “याद करो, एक राजा आने वाला है। न्याय की नदियाँ बहने वाली हैं।” जब भी हम सूखे के दिनों में बादलों को देखते हैं, तो हमें विश्वास रहता है कि एक दिन, वह आत्मा की वर्षा अवश्य आएगी, और हमारी सूखी ज़मीन फिर से हरी-भरी हो उठेगी। वह व्यक्ति कौन था, हम नहीं जानते। पर उसके शब्द हमारे लिए एक कुआँ बन गए हैं, जिससे हम थकान और निराशा के दिनों में आशा का पानी पीते रहते हैं।




