पवित्र बाइबल

टूटे बर्तन की प्रतीक्षा

वह दिन ठंड की एक साँस लेकर आया था। सुबह की धुंध, जो आम तौर पर घाटी में रेंगती है, आज पहाड़ों की चोटियों तक चढ़ गई थी, मानो आकाश स्वयं धरती को छूने के लिए नीचे उतर आया हो। हवा में चीड़ के पेड़ों की सोंधी खुशबू थी, पर उसमें एक अजीब-सी गंभीरता भी घुली हुई थी। यरूशलेम की गलियाँ, अभी तक नींद में डूबी थीं, पर मेरी आँखें जाग रही थीं। मन एक अजीब बेचैनी से भरा हुआ था।

मैंने अपनी झोंपड़ी की लकड़ी की दहलीज पर बैठकर, पूर्व की ओर देखा। सूरज अभी उगने वाला था, पर बादलों ने उसका रास्ता रोक रखा था। वे बादल साधारण नहीं लग रहे थे। लगता था जैसे कोई विशालकाय कुम्हार, अपने हाथों में गीली मिट्टी लिए, आकाश के चाक पर बैठा है। और वह मिट्टी अभी सूखी नहीं है, भारी है, और उसमें आग के अंगारे चमक रहे हैं। एक पल के लिए तो लगा, कि कहीं यह आकाश फट न पड़े। कहीं ये बादल, सिर्फ बादल न होकर, उस हा�ाथ का हिस्सा न हों, जो पहाड़ों को तोड़ सकता है।

मेरे मन में एक प्रार्थना उमड़ने लगी, पर वो शब्द नहीं बन पा रही थी। वह एक कराह थी, एक गहरी प्यास थी। हमारी हालत क्या हो गई है? हम मिट्टी के पात्र हैं, पर उस कुम्हार के हाथों से दूर जा पड़े हैं। हमें ढेला समझकर, किसी ने भट्ठी में झोंक दिया है। हमारी सुन्दरता जली हुई है, हमारे किनारे टूटे हुए हैं। और हम… हम चुपचाप पड़े हैं। हमने तेरे नाम को पुकारा नहीं। हमने अपने दुख से उबरने की कोशिश तक नहीं की। तू क्यों हम पर दयार्द्र होगा? हम तो अपने अधर्म में डूब गए हैं, और हमारे पाप हमें हवा की तरह उड़ाए ले जा रहे हैं।

एक आँधी का झोंका आया, और दूर बाँसों के झुरमुट में सनसनाहट हुई। मेरे गाँव के लोग अब जागने लगे थे। मैं उनकी सुबह की गतिविधियों की आवाजें सुन सकता था – पत्थर के हथौड़े की चोट, बकरी के बच्चे की मिमियाहट, कुएँ से पानी खींचने की चरचराहट। सब कुछ सामान्य था। पर क्या सचमुच सामान्य था? क्या यह सब, उस भयानक शून्यता को ढकने का एक प्रयास नहीं था? हम मानो उसके सामने गंदे कपड़े हो गए हैं। हमारी सारी धार्मिकता, हमारे सारे उत्सव, हमारी सारी प्रार्थनाएँ – एक मैले चीथड़े की तरह फटी हुई हैं। और हम मुरझा रहे हैं, पत्ते की तरह। हवा का एक झोंका आया, और हमारी नैतिकता, हमारा अहंकार, सब उड़कर इधर-उधर बिखर गया।

तब मैंने अपना मुँह आकाश की ओर किया। बादल अब भी वहाँ थे, भारी और गरजते हुए। और मेरी आवाज़, एक फुसफुसाहट की तरह, टूटी हुई, निकली – “हे परमेश्वर, काश तू आकाश को फाड़ डालता और उतर आता! काश पहाड़ तेरे सामने काँप उठते!” उसका नाम लेते ही मन में वो सारी कहानियाँ तैर गईं, जो बूढ़े लोग सुनाया करते थे। सीनै पर्वत पर आग और धुआँ। लाल सागर का फटना। वह समय जब वह हमारे लिए भयानक काम करता था, जिनकी हमने आशा भी नहीं की थी। कहाँ चला गया वह भय? कहाँ चला गया वह विस्मय?

अब तक सूरज की किरणें बादलों को चीरकर नीचे आने लगी थीं। धुंध हट रही थी, और यरूशलेम के पत्थरों पर सुनहरी रोशनी बिखर रही थी। पर यह रोशनी मेरे लिए एक उलाहना बन गई। देखो, वह अब भी वहीं है। वह अब भी प्रकाश है। पर हम? हमने अपने हाथों से उस अद्भुत मूर्तिकार, उस कुम्हार से अपने को छीन लिया है। हम एक बिगड़े हुए बर्तन हैं, जिसे ठीक करने की सामर्थ्य केवल उसी में है।

मैं उठा और अपनी झोंपड़ी में वापस लौटा। एक कोने में मेरी पत्नी ने सुबह की रोटी बनाने के लिए आटा गूँधना शुरू कर दिया था। उसके हाथों पर मैदा लगा हुआ था। मैंने उन हाथों को देखा – मेहनत से खुरदुरे, पर सृजन में लगे हुए। और फिर मैंने अपने हाथ देखे – शिकायत करने और अपने ही पापों से मुंह मोड़ने में निपुण। हे पिता, हम सब तेरी ही मिट्टी हैं। हम तेरी ही सृष्टि हैं। क्या तू हम पर अधिक क्रोधित रहेगा? क्या तू हमें चुपचाप सड़ने देगा?

दिन चढ़ने लगा। गाँव की ज़िन्दगी अपनी पूरी रफ़्तार से चल पड़ी। बच्चे दौड़ रहे थे, बाज़ार में कोलाहल था। पर मेरे भीतर वह प्रार्थना, एक गहरे कुएँ की तरह, और गहरी होती गई। यह कोई सिद्ध प्रार्थना नहीं थी। यह टूटे हुए वाक्यों का एक समूह था। यह विश्वास और संदेह की एक जंग थी। यह स्वीकारोक्ति थी कि हम भटक गए हैं, और यह मूक चिल्लाहट थी कि अब केवल वही हमें ढूँढ सकता है।

शाम होते-होते, जब पहाड़ियों की छाया लम्बी होने लगी, तो मैं फिर से दहलीज पर बैठ गया। आकाश साफ़ था। सारा दिन जो भारीपन था, वो अब एक शांत विश्वास में बदल रहा था। वह कुम्हार चाहे जितना क्रोधित हो, वह हमें भूला नहीं सकता। हम उसकी ही उँगलियों के निशान हैं। और शायद, बस शायद, वह फिर से अपने चाक पर बैठेगा। वह इस टूटे हुए बर्तन को फिर से गूँथेगा। वह इसे नया रूप देगा। हमें केवल इतना करना है कि हम उसकी पनाह में लौट आएँ। हमें केवल इतना स्वीकार करना है कि हम मिट्टी हैं, और वह हमारा बनाने वाला।

रात के तारे टिमटिमाने लगे। दूर, मन्दिर की ओर से, संभवतः सन्ध्या-बलि की सुगन्ध हवा में तैर रही थी। मैंने आँखें बन्द कीं। और चुपचाप, अपने सारे टूटेपन के साथ, उसकी प्रतीक्षा करने लगा।

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