यरूशलेम की उन धूलभरी गलियों की याद, जो अब खंडहर बन चुकी थीं, हनान्याह के मन में एक टीस की तरह समाई रहती। बाबुल के इस नगर में, जहाँ फरात नदी का पानी कभी साफ दिखता था और कभी कीचड़ से सना, वह अपने छोटे से घर के आँगन में बैठा हुक्का गड़गड़ाता। सामने पड़ी थी एक टूटी हुई मिट्टी की दीवार का टुकड़ा, जिस पर उसने अपने पुराने घर की नक़ल उकेरनी शुरू की थी – दरवाज़े का चौखट, ऊपर लटकता दीपक, वह खिड़की जिससे उसकी बीवी रोज सुबह झांका करती थी।
बाहर से उसके पोते, मीकाएल की आवाज़ आई, “दादा! बाज़ार से सुनकर आया हूँ। नबूकदनेस्सर के महल के पास नए कैदी आए हैं, दक्षिण से। कहते हैं यहूदा की धरती अब सिय्योन के बजाय गीद्दों का डेरा बन गई है।”
हनान्याह ने हुक्के से एक लम्बी सांस खींची। आँखों के सामने तस्वीर उभर आई – जैतून के पेड़ों के बीच से उठता धुआँ, चीख़ें, और रोमन सैनिकों के भारी जूतों की आहट। वह यहाँ बाबुल में सुरक्षित था, पर उसकी आत्मा अब भी उन पहाड़ियों पर भटकती थी।
“मीकाएल,” उसने आवाज़ दी, आवाज़ में एक कंपकंपी थी, “अंदर आ। एक कहानी सुनानी है।”
जब लड़का बैठ गया, तो हनान्याह ने अपनी पुरानी पोथी, जो मेमने की खाल पर लिखी गई थी, सम्हाल कर निकाली। उसकी उंगलियाँ उभरे अक्षरों पर टहलने लगीं।
“यह उस समय की बात है,” उसने शुरू किया, “जब हमारा नगर जल रहा था। मैं तेरे पिता को, जो तब तेरी उम्र का ही था, कंधे पर उठाए भाग रहा था। हमारे पीछे आग की लपटें थीं, और आगे… बस अनजाना अंधेरा। उसी रात, भगवान का वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा आया।”
हनान्याह ने आँखें बंद कर लीं। शब्द उसकी स्मृति में ताज़ा थे, जैसे कल ही सुने हों।
*’यहोवा का यह वचन हुआ: इस्राएल के परमेश्वर की यह उक्ति सुन ले – देख, मैं उन सब जातियों में से जहाँ तुम्हें तितर-बितर किया, तुम्हें छुड़ा ले आऊँगा। मैं तुम्हें फिर उसी स्थान में ले आऊँगा जो तुम्हारी मीरास है।’*
मीकाएल की सांस रुक सी गई। “पर दादा, हम तो यहाँ बस गए हैं। यही हमारा घर है अब।”
“घर?” हनान्याह की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “तेरी नानी की कब्र यरूशलेम में है। तेरे चाचा की हड्डियाँ सामरिया की घाटी में बिखरी हैं। हमारी जड़ें वहीं हैं, बेटे। वचन कहता है कि वह दिन आएगा जब याकूब का संकट दूर होगा। वह शान्ति और चैन से रहेगा, और कोई उसे न डराएगा।”
उस रात हनान्याह को नींद नहीं आई। भविष्यद्वाणी के शब्द उसके मस्तिष्क में गूंजते रहे – *’तुम्हारी चोट लाइलाज है, तुम्हारा घाव भयंकर है… तुम्हारा सहायक कोई नहीं।’* कितना सच था यह। यहाँ बाबुल में वे सुरक्षित तो थे, पर एक बंधुआई की शान्ति में जी रहे थे। उनकी पहचान मिटती जा रही थी, उनकी भाषा में विदेशी शब्द घुल रहे थे, उनके बच्चे बेबीलोनी देवताओं के नाम भूलकर बोलने लगे थे।
कई दिन बीत गए। एक दोपहर, जब गर्मी से हवा तप रही थी, हनान्याह बाज़ार से लौटा। रास्ते में उसने देखा कि एक युवक, शायद नए आए कैदियों में से, सिर पीट-पीटकर रो रहा था। उसकी आँखों में वही खालीपन था जो हनान्याह ने सालों पहले अपने शीशे में देखा था।
“क्यों रोते हो, बेटे?” हनान्याह ने पूछा, उसके कंधे पर हाथ रखकर।
“सब कुछ तो खो गया,” युवक के होंठ काँपे। “मंदिर की चिंगारियाँ हवा में उड़ गईं। हमारे राजा की आँखें फोड़ दी गईं। अब क्या बचा है?”
हनान्याह उसे अपने घर ले आया। चाय पिलाई। और फिर वही पोथी निकाली।
“सुन,” उसने कहा। “परमेश्वर कहता है – ‘मैं तुम्हारी नस-नस को जोड़ दूँगा, और तुम्हारे घावों पर पट्टी बाँधूँगा। देख, मैं तुम सब को बंधुआई से लौटा लाऊँगा, और तुम पर दया करूँगा।’ हमारी आशा मंदिर के पत्थरों में नहीं, राजसिंहासन में नहीं। हमारी आशा उस प्रतिज्ञा में है जो उसने दाऊद से की थी – कि एक दिन उसका राज फिर स्थापित होगा।”
युवक की आँखों में एक सुस्त चिंगारी सी दिखी। “पर कब? कब तक हम यूँ ही तड़पते रहेंगे?”
हनान्याह ने खिड़की से बाहर निगाह दौड़ाई। फरात नदी पर नावें तैर रही थीं, सूरज ढल रहा था। “समय उसका है, बेटे। वह कहता है – ‘उन दिनों में और उस समय मैं दाऊद के लिए एक धर्ममय अंकुर उगाऊँगा, और वह देश में न्याय और धर्म का चलाएगा।’ हमारा काम है विश्वास करना, और इंतज़ार करना। भले ही यह इंतज़ार हमारी साँसों से लम्बा हो।”
वर्ष बीतते गए। हनान्याह बूढ़ा हो गया। उसकी नज़र धुंधली पड़ने लगी, पर उसकी आवाज़ में वही दृढ़ता थी। एक शाम, जब पहली बारिश की बूँदें धरती पर गिर रही थीं, उसने मीकाएल को, जो अब जवान हो चुका था, अपने पास बुलाया।
“यह पोथी,” उसने कहा, उसे मीकाएल के हाथों में रखते हुए। “इसे संभालकर रखना। जिस दिन तू अपने बेटे को यरूशलेम की गलियों की कहानी सुनाएगा, यह वचन तेरे काम आएगा। क्योंकि यह केवल अतीत का शोकगीत नहीं है। यह भविष्य का गीत है।”
मीकाएल ने पोथी को छुआ। उस पर हनान्याह के आँसू और समय के धब्बे लगे थे। “पर दादा, क्या हम सचमुच लौट पाएँगे?”
हनान्याह ने मुस्कुराते हुए खिड़की की ओर इशारा किया। बारिश तेज हो गई थी, धरती से मिट्टी की सुगंध उठ रही थी। “देख, इस वर्षा को। यह धरती को नया जीवन देती है। परमेश्वर का वचन कहता है – ‘उनकी मण्डली फिर बनेगी, और मैं उन सब को दण्ड दूँगा जो उन पर अत्याचार करते हैं।’ यह बारिश की तरह निश्चित है। शायद हम न देखें, पर तू देखेगा। या तेरा बेटा। या उसका बेटा। क्योंकि उसकी प्रतिज्ञा कभी टूटती नहीं।”
उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई। “वह दिन आएगा जब चीख़ों की जगह गीत होंगे। घावों की जगह निशान, और निशानों की जगह कहानियाँ। और यह कहानी… यह कहानी तब तक जीवित रहेगी जब तक फरात की धारा बहती है, और यर्दन का पानी समुद्र से मिलता है।”
हनान्याह की आँखें बंद हो गईं। बाहर बारिश की सरसराहट और एक नए समय के आने का इंतज़ार, हवा में तैर रहा था। मीकाएल ने पोथी को अपने हृदय से लगा लिया। उसमें केवल शब्द नहीं, एक सम्पूर्ण जाति की धड़कन समाई थी – टूटी हुई, पर अभी तक जीवित। और उस धड़कन में, दूर क्षितिज पर, एक नए भोर का वादा छिपा था।




