पवित्र बाइबल

काना का चमत्कार

काना गाँव की गलियाँ उस दिन शादी के गीतों से गूंज रही थीं। हवा में केसर और इलायची की खुशबू तैर रही थी, और दोपहर की धूप नीम के पेड़ों से छनकर आँगन में चाँदी के सिक्कों की तरह बिखर रही थी। दूल्हे का परिवार तीन दिनों से मेहमानों के आगमन और भोजन की व्यवस्था में उलझा हुआ था। और अब, समारोह के चरम पर, एक कुंभकार के घड़े की तरह एक समस्या फूटी – दाखरस ख़त्म हो गया था।

यह कोई साधारण कमी नहीं थी। सम्मान का प्रश्न था। गाँव के सारे लोग, रिश्तेदार, यहाँ तक कि दूर के फ़कीर भी यहाँ जमा थे। ऐसे में मेज़बानी में कमी पड़ जाना उस परिवार के लिए सदा के लिए कलंक की बात होती। दूल्हे के पिता का चेहरा मटमैला पड़ गया। सेवा कर रहे नौकर फुसफुसाते हुए एक-दूसरे से बचते फिर रहे थे। खुशियों के बीच एक अनकही चिंता की ठंडी परछाईं सबके चेहरों पर दौड़ गई।

उसी भीड़ में, एक साधारण सी महिला, मरियम, खड़ी थी। उसकी आँखों ने वह संकट पढ़ लिया जो दावत की आवाज़ों के पीछे छिपा था। वह धीरे से अपने बेटे यीशु के पास गई, जो अपने नए चेलों के साथ चुपचाप बैठा हुआ था, गाँव के लोगों की बातचीत को सुन रहा था। मरियम ने उसके कान में कहा, “उनके पास दाखरस नहीं रहा।”

यीशु ने उसकी ओर देखा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दबाव था, वह दबाव जो केवल एक माँ की आवाज़ में हो सकता है, जो अपने बेटे की शक्ति को जानती है, पर उसके समय को नहीं। यीशु ने उत्तर दिया, “हे नारी, मुझे तुझ से क्या काम? अभी मेरा समय नहीं आया।”

वह उत्तर कठोर लग सकता था, पर मरियम के चेहरे पर कोई निराशा नहीं आई। उसने सेवकों की ओर देखा, जो पास ही बेचारगी से खड़े थे, और उनसे कहा, “जो कुछ वह तुमसे कहे, वही करना।”

वहाँ आँगन के एक कोने में, यहूदियों की शुद्धता की रीति के अनुसार, छ: पत्थर के बड़े-बड़े जग रखे हुए थे। हर एक में दो-दो या तीन-तीन माप पानी आ सकता था। वे खाली पड़े थे, सूखे हुए, केवल एक रस्म निभाने के लिए वहाँ रखे हुए। यीशु ने उन सेवकों की ओर इशारा किया, “जगों में पानी भर दो।”

सेवक हैरान हुए। पानी? अभी तो दाखरस चाहिए था। पर मरियम के शब्द उनके कानों में गूंज रहे थे। बिना कुछ सोचे, उन्होंने कुएँ से पानी भर-भर कर उन सारे जगों को ऊपर तक लबालब भर दिया। पत्थर के जग ठंडे और भारी हो गए, पानी उनके ऊपरी किनारों से सहजता से लहरा रहा था।

तभी यीशु ने फिर कहा, “अब निकाल कर पीने भेज दो।”

सेवकों में से एक ने एक लोटा उठाया, जग में डुबोया। जैसे ही वह पानी निकाल रहा था, उसकी आँखें फैल गईं। रंग! पानी का रंग बदल चुका था। वह साफ, बेरंग पानी नहीं था। एक गहरा, शहद जैसा लाल रंग लोटे में चमक रहा था। उसने हिचकिचाते हुए उसे चखा। उसके मुँह में एक स्वाद फैला – अंगूर के सारे सूरज, पकी हुई बेलों की सारी मिठास, जैसे किसी रहस्यमय बाग़ की सारी उपज एक साथ उस पानी में समा गई हो। यह कोई साधारण दाखरस नहीं था। यह उससे कहीं बेहतर, कहीं समृद्ध था, जो अब तक पिया गया था।

वह सेवक चकित होकर दूल्हे के पास गया, जो अभी भी अनजान था कि क्या हुआ है। उसने वह दाखरस दूल्हे को पिलाया। दूल्हे ने एक घूँट लिया, और उसका चेहरा चमक उठा। उसने दावत के मुखिया, जो दूल्हे के पिता का विश्वासपात्र था, को बुलाया। “देखो!” उसने कहा, “हर कोई पहले अच्छा दाखरस परोसता है, और जब मेहमान पीकर थक जाते हैं, तब कम अच्छा। पर तुमने तो यह उत्तम दाखरस अब तक के लिए रख छोड़ा था!”

मुखिया ने भी चखा, और उसकी भौंहें तन गईं। वह समझ नहीं पा रहा था। यह दाखरस कहाँ से आया? उसने सेवकों की ओर देखा, जो चुपचाप मुस्कुरा रहे थे, रहस्य को अपने भीतर दबाए हुए। केवल वे ही जानते थे कि यह पानी था, जो अब दाखरस बन चुका था।

भीड़ में यीशु शांत बैठा रहा। उसके चेले, जिन्होंने यह सब देखा था, उसकी ओर देख रहे थे। उनकी आँखों में एक नया विश्वास उभर रहा था, एक गहरी पहचान। उन्होंने पहली बार उसकी महिमा को झलकते देखा था, जो पत्थर के जगों और साधारण पानी के माध्यम से प्रकट हुई थी। यह कोई आडम्बर नहीं था, कोरा चमत्कार नहीं था। यह एक कृपा थी, जो एक परिवार की लाज बचाने के लिए, एक खुशी को पूरा करने के लिए, चुपचाप, बिना शोर के, घट गई।

दावत फिर से उमड़ पड़ी। गीत और नृत्य का सिलसिला और भी जोश के साथ शुरू हो गया। दूल्हे के पिता का सिर गर्व से ऊँचा था। पर उस रहस्य को केवल कुछ ही लोग जानते थे – वे सेवक, मरियम, और वे चेले। और उनके हृदय में एक बात बैठ गई थी कि जिसने पानी को दाखरस बना दिया, वह केवल बाहरी चीज़ों को ही नहीं, बल्कि हृदय के सूखेपन को भी, मिठास से भर सकता है। काना की उस शाम ने केवल जगों को ही नहीं, बल्कि कई आस्थाओं को भी एक नया रस, एक नया अर्थ भर दिया था।

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