कुरिन्थुस का बंदरगाह दिनभर की गर्मी के बाद एक नम, नमकीन सांस छोड़ रहा था। हवा में जहाजों के रस्सों की खटखटाहट, दूर बाजार से आती हल्दी और जैतून के तेल की गंध, और कहीं से आते यूनानी दार्शनिकों के वाद-विवाद के टुकड़े मिल रहे थे। मलिक, एक मध्यम उम्र का लिनेन का व्यापारी, अपनी दुकान के बाहर बने पत्थर के बेंच पर बैठा यह सब सुन रहा था। उसकी उंगलियां एक पुरानी चमड़े की पोथी पर टिकी थीं, जिसमें से एक पत्र निकला हुआ था – प्रेरित पौलुस का वह पत्र, जो एपैफ्रास नाम के यात्री के हाथों आया था और अब नगर की छोटी सी मण्डली में हाथ-हाथ घूम रहा था।
मलिक ने पत्र पढ़ा था। पर पढ़ने और समझने में फर्क होता है। उसकी नजर उन पंक्तियों पर टिकी रही, जहाँ पौलुस ने लिखा था – “क्योंकि मसीह की क्रूस की चर्चा, नाश होनेवालों के लिये तो मूर्खता है, परन्तु हम नाश होनेवालों के लिये परमेश्वर की सामर्थ्य है।” बाहर, एक समूह बहस कर रहा था। स्टेफनस के समर्थक थे, जो उसकी वाक्पटुता के झंडाबरदार थे। एक तरफ अपुल्लोस के चाहने वाले, जिसकी बुद्धिमत्ता और शास्त्र की जानकारी मशहूर थी। फिर कई ऐसे थे जो पतरस की रूढ़िवादी, यहूदी छाप वाली शिक्षा को पसंद करते थे। और कुछ ऐसे भी, जो सीधे पौलुस का नाम लेते, उनकी सादगी के बजाय उनके दर्शन को पकड़ने की कोशिश में। मलिक ने एक लंबी सांस ली। यही तो समस्या थी। मण्डली, जो एक थी, अब चार खेमों में बंटती जा रही थी। हर कोई अपने पसंदीदा शिक्षक को बड़ा साबित करने में लगा था, मानो वह कोई दार्शनिक स्कूल हो।
उसकी याद ताजा हो आई, जब वह पहली बार इस विश्वास के संपर्क में आया था। वह दिन अलग था। कोई तर्क नहीं था, कोई बड़ा वक्ता नहीं। बस एक बूढ़ा मलाह, जिसके हाथ जहाज के रस्सों से रगड़ खा कर खुरदुरे हो गए थे, ने एक शाम उसे येसु के बारे में बताया था। उसने क्रूस की कहानी सुनाई थी – एक ऐसी मौत, जो रोमनों के लिए कायरों और अपराधियों के लिए थी, यहूदियों के लिए श्राप की निशानी। पर उस बूढ़े की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने कहा था, “मलिक, यही वह जगह है जहाँ परमेश्वर ने दुनिया की सारी चालाकी और ताकत को शर्मसार कर दिया। वहाँ, उस क्रूस पर, उसने हमारे सारे गणित को उलट दिया।” उस दिन मलिक ने कुछ समझा था। एक सादगी थी उसमें। एक बेवकूफी भरी बात, जो दिल को छू गई।
पर अब? अब सब कुछ जटिल होता जा रहा था। लोग बुद्धि की बड़ी-बड़ी बातें करते, यूनानी तर्कशास्त्र के नियमों से परमेश्वर को समझाने की कोशिश करते। कोई कहता परमेश्वर का राज्य गूढ़ ज्ञान में छिपा है, तो कोई कहता विशेष रहस्यों की खोज में। मलिक उठा और संकरी गली से होता हुआ अपने घर की तरफ चल पड़ा। रास्ते में दीवारों पर खुदे हुए विज्ञापन दिखे – एक रहस्यमयी पंथ के गुरु का प्रचार, दूसरी तरफ स्टोइक दर्शन के व्याख्यान की सूचना। सब कुछ बेचा जा रहा था। और अब, लगता था मसीह का सन्देश भी उसी होड़ में शामिल हो गया है। क्या पौलुस का यह पत्र, जो उसकी मुट्ठी में था, सिर्फ एक और दार्शनिक पत्र था?
घर पहुँचकर उसने दीपक जलाया। पत्र फिर से खोला। पौलुस की बात सीधी थी, पर काटने वाली। “देखो, भाइयों, कि तुम कैसे बुलाए गए हो: न तो बहुत से बुद्धिमान मनुष्य शरीर के अनुसार, न बहुत से सामर्थी, न बहुत से कुलीन बुलाए गए हैं। परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि बुद्धिमानों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है, कि सामर्थ्यवानों को लज्जित करे।”
मलिक की नजर अपने हाथों पर पड़ी – साधारण, काम करते हाथ, जिन पर लिनेन के धागे ने रेखाएं खींच दी थीं। वह न तो यूनानी दार्शनिक था, न रोमन सेनापति, न धनी व्यापारी। वह बस मलिक था। और फिर उसे एहसास हुआ – यही तो बात है। परमेश्वर की पसंद उलटी है। जब सब लोग ताकत और प्रभाव की तलाश में हैं, वह कमजोरी को चुनता है। जब सब ज्ञान और बुद्धि का ढिंढोरा पीट रहे हैं, वह एक साधारण, बेवकूफी भरी सच्चाई – क्रूस – को अपनी सामर्थ्य बना देता है।
अगले रविवार, जब मण्डली इकट्ठा हुई, तो वहां का माहौल तनावपूर्ण था। बहस छिड़ने ही वाली थी। तभी मलिक, जो आमतौर पर चुप ही रहता था, खड़ा हुआ। उसकी आवाज शुरू में धीमी थी, फिर मजबूत होती गई। उसने कोई जटिल व्याख्या नहीं दी। उसने उस बूढ़े मलाह की कहानी सुनाई। उसने कहा कि जब से उसने खुद को किसी समूह का हिस्सा बताना शुरू किया है – ‘मैं पौलुस का हूँ’, ‘मैं अपुल्लोस का हूँ’ – तब से वह उस सादगी को भूलता जा रहा है जो उसे पहली बार खींच लाई थी। “हम सब,” उसने कहा, “इस लिए झगड़ रहे हैं कि कौन ज्यादा बुद्धिमान है, किसका तर्क बेहतर है। पर भाइयों, क्या हम वही नहीं बन गए हैं जिससे पौलुस हमें बचाना चाहते हैं? क्रूस का सन्देश दुनिया की नजर में मूर्खता है। और हम क्या कर रहे हैं? हम उसे दुनिया की नजरों में ‘बुद्धिमान’ साबित करने में लगे हैं। शायद, इसी कोशिश में हम उसकी ताकत खो रहे हैं।”
उसकी बात के बाद एक सन्नाटा छा गया। बहस करने वालों के चेहरों पर एक अलग सी चुप्पी थी। यह कोई तर्क नहीं था जिसका जवाब दिया जा सके। यह एक अनुभव था, एक याद दिलाना था उस मूल बात की, जो इन सब विद्वताओं और विभाजनों के बीच कहीं खो सी गई थी।
उस शाम, जब मलिक बंदरगाह की तरफ टहलने निकला, तो उसे लगा जैसे पहली बार उस पत्र की गहराई समझ में आई है। पौलुस ने लिखा था – “क्योंकि यहूदियों ने चिन्ह माँगा और यूनानी बुद्धि की खोज में रहते हैं। पर हम तो क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का प्रचार करते हैं।” हवा में अब भी वही नमक की सुगंध थी, पर अब वह ताजगी लग रही थी। चमकते हुए तारों के नीचे, उसे एहसास हुआ कि परमेश्वर की बुद्धि मनुष्य की बुद्धि से एकदम अलग है। वह चमकदार वक्तृत्व में नहीं, गूढ़ ज्ञान में नह




