पवित्र बाइबल

पौलुस का गलातियों को स्वतंत्रता का पत्र

येरूशलेम के पुराने रस्तों पर धूप ढल रही थी। हवा में मिट्टी और जलती हुई लकड़ी की गंध थी। शाऊल, जिसे अब सब पौलुस कहते थे, एक कमरे में टहल रहा था। उसकी उंगलियाँ एक पुरानी मेज़ की खुरदरी सतह पर टिकी थीं। बाहर, शहर की आवाज़ें – व्यापारियों का शोर, बच्चों का किलकारी – दीवारों से टकरा कर धुँधली हो रही थीं। पर उसका मन तो गलातिया में था। उन नए विश्वासियों में, जो दूर-दूर बसे थे और अब भटकाव के कगार पर खड़े थे।

उसने कलम उठाई। स्याही से भरी हुई। एक गहरी साँस ली, और शब्द उमड़ने लगे, ठीक वैसे ही जैसे दमिश्क के रास्ते पर प्रकाश उमड़ा था।

“समझो,” उसने लिखा, “एक ऐसे उत्तराधिकारी की कहानी, जो अभी नाबालिग है। सब कुछ तो उसका ही है – पिता का सारा घर, सारी संपत्ति। पर वह एक गुलाम से बढ़कर नहीं। उस पर अभिभावक हैं, संरक्षक हैं, नियमों और व्यवस्थाओं के पहरेदार। निर्धारित समय तक वह उन्हीं के अधीन रहता है। ठीक वैसे ही जैसे हम भी थे।”

पौलुस ने लिखते हुए अपने आप को देखा – फरीसी शाऊल, व्यवस्था के एक-एक अक्षर में जकड़ा हुआ। वे नियम, जो एक सुरक्षा की दीवार भी थे और एक कारागार भी। शनिवार की सीमाएँ, शुद्ध-अशुद्ध के विधान, बलिदानों का निरंतर चक्र… ये सब एक पहरेदार की तरह थे, जो परमेश्वर के पास ले जाने के लिए बने थे, पर जिनकी छाया इतनी लंबी हो गई थी कि वे स्वयं ही मार्ग बन बैठे थे।

“पर जब समय पूरा हुआ,” उसकी कलम तेज चलने लगी, “परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेja। वह स्त्री से जन्मा, व्यवस्था के अधीन जन्मा। ताकि जो व्यवस्था के अधीन हैं, उन्हें मुक्त कर सके। ताकि हमें दत्तक पुत्र होने का अधिकार मिले।”

उसने आँखें बंद कीं। उस ‘पूरे समय’ की कल्पना की – रोमी साम्राज्य की शांति, यूनानी भाषा और विचारों का फैलाव, यहूदियों की बिखरी हुई जनता… और फिर वह एक स्त्री, एक चरनी, और स्वर्गदूतों का गीत। साधारणता में छिपा हुआ वह अद्भुत विस्फोट। व्यवस्था, जो सैकड़ों वर्षों से ‘नहीं’ कहती आई थी, अब एक जीवित ‘हाँ’ बनकर आ गई थी।

“और क्योंकि तुम पुत्र हो,” वह गलातिया के लोगों को समझाता हुआ लिखने लगा, “परमेश्वर ने अपने पुत्र के आत्मा को हमारे हृदय में भेjा है, जो ‘अब्बा! हे पिता!’ पुकारता है। इसलिए अब तुम गुलाम नहीं, पुत्र हो। और यदि पुत्र हो, तो परमेश्वर के वारिस भी।”

उसे उन लोगों की चिंता थी, जो पीछे मुड़कर देख रहे थे। जो इस अनुपम स्वतंत्रता को छोड़कर फिर से पुराने नियमों के जाल में फंसना चाहते थे। वे दिन, त्यौहार, चंद्रमा और ऋतुओं का पालन करने लगे थे, मानो मसीह का आना कोई अधूरा काम रह गया हो। उसका हृदय दुख से भर गया।

“मुझे तुम पर डर है,” उसने ईमानदारी से लिखा, “कहीं ऐसा न हो कि मैंने तुम पर व्यर्थ परिश्रम किया है। उन दिनों की ओर लौटो मत, जब तुम जानते नहीं थे। उस समय तुम उन तथाकथित देवताओं की गुलामी में थे, जो देवता हैं ही नहीं। पर अब, जब तुम परमेश्वर को जानते हो, बल्कि परमेश्वर ने तुम्हें जाना है, तो फिर कैसे तुम उन निर्बल और निकम्मे आधार तत्वों की ओर फिर मुड़ते हो? उन्हीं के गुलाम बनने के लिए, जिनकी तुम पहले सेवा कर चुके हो?”

उसने कागज को सहलाया। शब्दों का वजन उसे महसूस हो रहा था। वह उनसे प्रेम करता था। वह चाहता था कि वे समझें। फिर एक उदाहरण उसके मन में आया, पुराने अब्राहम का – हाजिरा और सारा का। दासी और स्वतंत्रा। इश्माएल और इसहाक।

“लिखो, तो सुनो,” उसने लिखा, “अब्राहम के दो पुत्र थे। एक दासी से, और एक स्वतंत्रा से। दासी का पुत्र तो शरीर से जन्मा, पर स्वतंत्रा का पुत्र प्रतिज्ञा से। ये दोनों दो वाचाओं के दृष्टांत हैं। एक तो सीनै पर्वत की, जो दासत्व की ओर ले जाती है, और वह हाजिरा है। पर ऊपर की येरूशलेम स्वतंत्र है, और वही हम सब की माता है।”

पौलुस ने सीनै पर्वत को याद किया – बादलों से ढका, बिजली चमकती, और लोग दूर हट जाते हैं, डर से काँपते हैं। और फिर सिय्योन की पहाड़ी – जहाँ क्रूस पर प्रेम की विजय हुई, जहाँ कब्र खाली हुई, और जहाँ अनुग्रह का राज्य बसता है।

“हे भाइयो,” उसका स्वर मार्मिक हो उठा, “तुम इसहाक की तरह प्रतिज्ञा की संतान हो। पर जैसे तब शरीर से जन्मा हुआ आत्मा से जन्मे हुए को सताता था, वैसे ही आज भी होता है। पर शास्त्र क्या कहता है? ‘दासी और उसके पुत्र को निकाल दो, क्योंकि दासी का पुत्र स्वतंत्रा के पुत्र के साथ उत्तराधिकारी नहीं होगा।’ इसलिए, हे भाइयो, हम दासी की सन्तान नहीं, स्वतंत्रा की सन्तान हैं।”

उसने कलम रख दी। कमरे में शांति थी। बाहर की दुनिया अपनी रफ्तार से चल रही थी, पर उसे लगा जैसे उसने एक ऐसा सत्य लिख दिया है, जो समय की दीवारों को भेदकर गलातिया तक, और गलातिया से आगे भी, सदियों तक पहुँचेगा। यह स्वतंत्रता का दस्तावेज था। एक पुकार, कि अब कोई पहरेदार नहीं, कोई अभिभावक नहीं। केवल एक पिता है, और उसकी गोद में बैठने का अधिकार पाने वाले पुत्र-पुत्रियाँ।

खिड़की से झाँकती हुई संध्या की लाली ने पृष्ठों पर अपना रंग फैला दिया। पौलुस ने मुस्कुराते हुए उन्हें देखा। यह चिट्ठी पूरी हुई। यह सुसमाचार का एक और अध्याय। स्वतंत्रता का शंखनाद।

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