पवित्र बाइबल

अब्राहम और तीन दिव्य अतिथि

दिन ढल चुका था, पर मामरे के पेड़ों की घनी छाया में अभी भी दोपहर की जड़ता छाई हुई थी। अब्राहम अपने तम्बू के मुहाने पर बैठा था, उम्र के भार से कुछ झुका हुआ, पर आँखों में वही सदा की प्रतीक्षा थी। हवा स्तम्भ थी, धरती गर्म साँसें छोड़ रही थी। तभी, दूर मरुस्थल की ओर से, तीन आकृतियाँ उभरीं। पहले तो धुँधली, फिर स्पष्ट होती गईं। वे सीधे उसकी ओर बढ़ रहे थे।

अब्राहम तत्काल उठ खड़ा हुआ। मेहमान! चाहे कोई भी हो, मरुभूमि की राह में थके हुए पथिक, उनका स्वागत तो परम धर्म था। वह दौड़कर उनके पास गया, और बिना कुछ पूछे, आदर से झुक गया। “हे प्रभु, यदि मैं अब तक तेरी दृष्टि में अनुग्रह पाया हूँ,” उसने कहा, “तो अपने दास के पास से बिना रुके न जाना। थोड़ा जल लाऊँगा, तुम अपने पाँव धो लेना, और इस पेड़ के नीचे विश्राम करना। मैं थोड़ा भोजन लाता हूँ, ताकि तुम्हारा हृदय तरोताजा हो, तब आगे चले जाना।”

वे तीनों रुके। उनमें से एक ने, जिसके चेहरे पर एक अद्भुत प्रताप था, कहा, “तुम जैसा कहते हो, वैसा ही करो।” अब्राहम शीघ्रता से तम्बू के भीतर गया, सारा के पास। “शीघ्र,” उसने कहा, “तीन सेर महीन आटा गूँथकर रोटियाँ बना दो।” फिर स्वयं वह दौड़कर झुण्ड के पास गया, एक कोमल और अच्छा बछड़ा चुन लिया, और एक नौकर से उसे जल्दी से पकाने को कहा। उसकी हलचल में एक पवित्र बेचैनी थी, मानो हृदय कुछ अनहोनी की सूचना दे रहा हो।

जब दही, दूध, और उस तैयार किए हुए बछड़े को, ताज़ी रोटियों के साथ, उसने उनके सामने परोसा, तो वे पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करने लगे। अब्राहम स्वयं एक ओर खड़ा रहा, सेवक की भाँति। भोजन के बीच में, उनमें से वह एक, जो प्रतापमय था, बोला, “तुम्हारी पत्नी सारा कहाँ है?”

अब्राहम ने तम्बू की ओर संकेत किया। “वह तम्बू के भीतर है।”

तब उस प्रतापमय पुरुष ने कहा, “मैं निश्चित रूप से तेरे पास अगले वर्ष इसी समय लौटूँगा, और देखो, तेरी पत्नी सारा के एक पुत्र होगा।”

सारा तम्बू के द्वार के पीछे खड़ी सुन रही थी। यह सुनकर उसके मन में एक हँसी उमड़ आई। उसका और अब्राहम का शरीर वृद्ध हो चुका था, उसके दिन स्त्रीत्व के सामान्य चक्र से बाहर जा चुके थे। ‘क्या मेरे स्वामी के इतने बूढ़े हो जाने पर भी मेरे लिए यह सुख होगा?’ उसने मन ही मन सोचा। यह विचार उसके लिए इतना अविश्वसनीय और हास्यास्पद था कि उसके ओठों पर एक रूखी मुस्कान आ गई।

तभी वह प्रतापमय पुरुष, जो यहोवा स्वयं था, ने अब्राहम से पूछा, “सारा ने हँसकर क्यों कहा, ‘क्या सचमुच मेरा बच्चा होगा, मेरी इतनी अवस्था में?’ क्या यहोवा के लिए कोई बात अधूरी रह सकती है? नियत समय पर, मैं तेरे पास लौटूँगा, और सारा के एक पुत्र होगा।”

सारा भय से काँप उठी। उसने इनकार किया, “मैंने हँसी नहीं।” क्योंकि वह डर गई थी।

पर उसने कहा, “नहीं, तूने हँसी ही है।”

यह कहकर वे तीनों उठ खड़े हुए, और सदोम की ओर देखने लगे। अब्राहम उनके साथ-साथ चलने लगा, उन्हें विदा करने। तब यहोवा ने मन में सोचा, ‘क्या मैं अब्राहम से, जिसे मैंने चुना है, वह जो आने वाली पीढ़ियों को न्याय और धर्म की शिक्षा देगा, अपनी योजना छिपाऊँ?’ और उसने कहा, “सदोम और अमोरा का चीत्कार बहुत बढ़ गया है, उनका पाप अति भारी हो गया है। मैं उतरकर देखूँगा कि जैसी चीत्कार मेरे पास पहुँची है, वैसा ही उन्होंने किया है या नहीं।”

दो पुरुष तो सदोम की ओर आगे बढ़ गए, पर यहोवा अब्राहम के सामने ठहरा रहा। अब्राहम ने नज़दीक आकर, एक साहस जो केवल विश्वास और आत्मीयता से आ सकता था, पूछा, “क्या तू धर्मी को दुष्ट के साथ नाश करेगा? शहर में यदि पचास धर्मी हों, क्या तू फिर भी उस स्थान को नाश करेगा, और उन पचास धर्मियों के लिए भी उसे क्षमा नहीं करेगा? ऐसा तो तुझसे दूर रहे! सारे संसार के न्यायी को ऐसा नहीं करना चाहिए।”

यहोवा ने कहा, “यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण मैं सारे नगर को क्षमा कर दूँगा।”

अब्राहम ने फिर कहा, वह धीरे-धीरे, विनीत भाव से, पर दृढ़ता के साथ बोल रहा था, “सुन, मैंने धूल और राख होकर प्रभु से बात करने का साहस किया है। क्या पचास धर्मियों में से पाँच कम होने पर भी तू सारे नगर को नष्ट करेगा?”

उसने कहा, “यदि पैंतालीस मिलें, तो नष्ट नहीं करूँगा।”

अब्राहम ने फिर पूछा, “शायद वहाँ चालीस मिलें?”

उसने कहा, “चालीस के कारण नहीं करूँगा।”

“कृपया प्रभु क्रोध न करे, यदि मैं और कहूँ… शायद तीस मिलें?”

“यदि तीस मिलें, तो नहीं करूँगा।”

“सुन, मैं फिर बोलने का साहस करता हूँ… शायद बीस मिलें?”

“बीस के कारण मैं नष्ट नहीं करूँगा।”

अब्राहम ने अंतिम प्रयास किया, उसका स्वर और भी मृदु हो गया, “कृपया प्रभु क्रोध न करे, मैं केवल एक बार और कहूँगा… शायद दस मिलें?”

यहोवा ने कहा, “दस के कारण भी मैं नष्ट नहीं करूँगा।”

इतना कहकर यहोवा चला गया, और अब्राहम अपने स्थान पर लौट आया। वह खड़ा रहा, उस शुष्क भूमि की ओर देखता रहा जहाँ से वे आए थे। हवा फिर से बहने लगी थी, पर अब उसमें एक गंभीरता थी, एक प्रतिज्ञा का भार और एक नगर के भाग्य का सवाल। सूरज ढल रहा था, और लम्बी होती परछाइयों ने मामरे के पेड़ों को और भी विशाल बना दिया था। उसने तम्बू की ओर देखा, जहाँ सारा अब भी शायद उस अद्भुत वचन पर विचार कर रही थी। एक नई आशा, एक असंभव सी प्रतिज्ञा, और न्याय के प्रति एक गहरी चिन्ता – यह तीनों उसके हृदय में एक साथ धड़क रहे थे। उसने अपनी आँखें बंद कीं। शाम की हवा उसके झुर्रियों वाले चेहरे को छू रही थी।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *