पवित्र बाइबल

पवित्रता और पत्थरों का न्याय

सूरज ढलने लगा था, और मरूभूमि की लालिमा तम्बू के परिसर पर पड़ रही थी। हवा में धूल के कण नाच रहे थे, और दूर से बकरियों के ब्लेटने की आवाज आ रही थी। मूसा ने पवित्र तम्बू के सामने खड़े होकर एक गहरी सांस ली। आज का काम अभी बाकी था।

अंदर, पवित्र स्थान के अंधेरे में, सोने की दीवट जल रही थी। हारून के पुत्र, एलआजार की जिम्मेदारी थी कि वह उसकी लौ को निरंतर जलाए रखे। बारीक जैतून का तेल, शुद्ध और कुटला हुआ, दीवट की सात डंडियों को भरता रहता। एलआजार का हाथ एक सधे हुए कारीगर की तरह चल रहा था। वह बाती को संवारता, तेल डालता, और यह सुनिश्चित करता कि आग कभी न बुझे। यह केवल एक दीया नहीं था; यह एक वाचा थी। परमेश्वर की उपस्थिति का एक स्थिर, कोमल प्रतीक, जो इस बात की याद दिलाता था कि वह उनके बीच निवास करता है, रात-दिन, अनंत काल तक। दीवट की रोशनी दीवारों पर नाचती हुई, स्वर्णिम फर्नीचर और बुने हुए पर्दों पर अजीब सी छायाएं बनाती थी।

और फिर थी रोटी। बारह नफरियों के लिए बारह रोटियाँ। सोने की मेज पर, शुद्ध सूक्ष्म आटे से तैयार, उन्हें दो कतारों में लगाया जाता। हर शनिवार को, पुरानी रोटियाँ हटाकर नई रोटियाँ रखी जातीं। लेकिन पुरानी रोटियाँ फेंकी नहीं जाती थीं। वे हारून और उसके पुत्रों के लिए, परमेश्वर के सामने से, एक पवित्र भोजन के रूप में नियत थीं। आज नई रोटियाँ रखने का दिन था। याजकों ने सफेद सनी के वस्त्र पहने, अपने हाथ धोए, और ध्यानपूर्वक उस आटे को गूंथा जिसमें सेलाह का तेल मिला हुआ था। रोटियों को सुलगते हुए अंगारों पर सेंका गया। जब ताज़ी रोटियों की गर्माहट और खुशबू ने पवित्र स्थान को भर दिया, तो पुरानी रोटियों को सम्मानपूर्वक हटा लिया गया। एलआजार ने एक रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा। स्वाद सादा था, लेकिन उसमें एक अलग ही तृप्ति थी। यह केवल भोजन नहीं था; यह एक अनुस्मारक था कि उनका अस्तित्व, उनका जीवन, परमेश्वर के प्रति उनकी निरंतर चढ़ावट पर टिका हुआ है।

लेकिन शिविर में जीवन सिर्फ पवित्र रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं था। यह तेल और आटे, आज्ञा और आज्ञापालन की सरल दुनिया से कहीं अधिक जटिल था।

एक दिन, जब सूरज चरम पर था और रेत चमक रही थी, शिविर के किनारे पर एक झगड़ा हुआ। एक इजरायली स्त्री का पुत्र, जिसका पिता मिस्री था, और एक शुद्ध इजरायली पुरुष आमने-सामने थे। बहस किस बात पर हुई, कोई ठीक से नहीं जानता। शायद एक कुएं के पानी को लेकर, या शिविर में जगह के बंटवारे को लेकर। शब्द गर्म हो गए। गालियां दी गईं। और फिर, गुस्से में आग बबूला होकर, उस मिश्रित वंश के युवक ने एक ऐसा शब्द बोल दिया जिसने वहां मौजूद सभी की सांसें थाम दीं। उसने परमेश्वर के नाम को शाप देते हुए, उसकी निन्दा की।

एक सन्नाटा छा गया। ऐसा लगा जैसे पूरे शिविर की हवा निकल गई हो। चिड़ियों का चहकना भी बंद हो गया। वह पुरुष, जिससे वह झगड़ रहा था, उसका चेहरा भय से सफेद पड़ गया। उसने उस युवक की ओर देखा, फिर पलटकर भागा, अपने हाथों से कान बंद करते हुए, मूसा के तम्बू की ओर।

खबर आग की तरह फैली। लोग इकट्ठा हुए, चिंतित, कांपते हुए। उस युवक को पकड़ लिया गया और हिरासत में ले लिया गया, तब तक के लिए जब तक कि यहोवा की इच्छा स्पष्ट न हो जाए। वह एक तम्बू में बंद था, शायद अपने कृत्य की भयावहता को समझते हुए, या शायद अभी भी गुस्से में जलता हुआ। परमेश्वर का नाम… उसकी निन्दा… यह कोई छोटा अपराध नहीं था। यह उस वाचा की ही नींव को हिला देने वाला कार्य था, जिस पर यह पूरा समाज, यह पूरी यात्रा टिकी हुई थी।

मूसा ने सभा को बुलाया। लोग चारों ओर इकट्ठा हुए, उनके चेहरे गंभीर थे। हवा में डर का भाव था। मूसा ने परमेश्वर से पूछा। और उत्तर आया, स्पष्ट और अटल।

“जो कोई परमेश्वर की निन्दा करे, उसे अवश्य मार डाला जाए। पूरी सभा उसे पत्थरवाह करे। चाहे देशी हो या परदेशी, जो निन्दा करे, वह मार डाला जाए।”

यह कोई नया नियम नहीं था। यह उस वाचा का एक स्वाभाविक, दुखद परिणाम था। यदि परमेश्वर ही वह आधार है जिस पर सब कुछ टिका है, तो उसके नाम, उसके सार को अपवित्र करना समुदाय की आत्मा पर हमला है। यह एक ऐसा विष है जो फैल सकता है।

निर्णय के दिन, पूरी सभा शिविर से बाहर एक स्थान पर इकट्ठी हुई। उस युवक को लाया गया। उसकी आँखों में अब गुस्सा नहीं था, बल्कि एक खालीपन था, एक गहरी समझ का भय। गवाहों ने, उन लोगों ने जिन्होंने उस शापित शब्द को सुना था, अपने हाथ उसके सिर पर रखे। यह एक भारी, भीषण कार्य था। गवाही का भार, न्याय का भार। फिर, पूरी सभा ने, एक इकाई के रूप में, पत्थर उठाए।

पत्थरवाह की प्रक्रिया तेज नहीं थी। यह एक भयानक, विचारशील कार्य था। हर पत्थर जो उछाला गया, वह उस वाचा की पवित्रता की पुष्टि करता था। वह युवक जिसने नाम को भुनभुनाकर बोला था, अब उसी नाम की पवित्रता के लिए एक चेतावनी बन गया था। जब सब कुछ समाप्त हो गया, तो एक गहरा सन्नाटा था। कोई विजय की भावना नहीं, कोई संतुष्टि नहीं। केवल एक भारी दुख, और एक गहरा, दर्दनाक सम्मान उस नाम के प्रति जिसे उन्होंने सुना था पर कभी अपनी आँखों से नहीं देखा था।

मूसा शिविर में वापस लौटा। दिन ढल चुका था। उसने पवित्र तम्बू के पास जाकर खड़े होकर देखा। अंदर, सोने की दीवट की लौ स्थिर और निरंतर जल रही थी। सोने की मेज पर, रोटियाँ परमेश्वर के सामने विराजमान थीं। जीवन और प्रकाश। व्यवस्था और अनुग्रह। और अब, एक कानून जोड़ा गया था, पत्थरों पर खून से लिखा हुआ: “जिसने निन्दा की है, उसके लिए भी एक ही नियम; देशी और परदेशी एक समान हैं।”

वह वहाँ कुछ देर खड़ा रहा। रोटी का सादा स्वाद अभी भी उसकी जीभ पर था। दीवट की रोशनी उसकी आँखों में परावर्तित हो रही थी। और दूर, शिविर के बाहर, पत्थरों का एक ढेर, एक कठोर अनुस्मारक कि पवित्रता कोई खेल नहीं है। यह जीवन और मृत्यु का विषय है। यह उस आधार के प्रति समर्पण है जो स्वयं जीवन को धारण करता है। हवा में ठंडक आने लगी। मूसा ने एक कंबल अपने कंधों पर डाला और धीरे-धीरे अपने तम्बू की ओर चल पड़ा। आसमान में तारे निकल आए थे, अनगिनत और चमकदार, ठीक उसी तरह जैसे वाचा के वचन, स्पष्ट और अटल, उनके जीवन के ऊपर टिमटिमा रहे थे।

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