(एक काल्पनिक कथा, व्यवस्थाविवरण 25 के विषयों पर आधारित)
उस साल अवध की धरती सूखी थी, जैसे ईश्वर ने आकाश का मुँह बंद कर दिया हो। हवा में धूल के बवंडर उठते, और दूर-दूर तक जैतून के पेड़ों की पत्तियाँ मुरझाई हुई लटकतीं। शहर के फाटक के पास, वही पुराना पत्थर का चबूतरा, जहाँ छोटे-मोटे मुकदमों की सुनवाई होती, आज भीड़ जमा थी। लोगों की आँखों में एक अलग तरह की बेचैनी थी। कोई फसल नहीं, कोई काम नहीं, तो यही वक़्त था पुराने झगड़े निपटाने का।
एलियाब, जो शहर के बुजुर्गों में से एक था, अपनी लाठी टेकते हुए आगे बढ़ा। उसकी दाढ़ी सफ़ेद हो चुकी थी, पर आँखों में वही पुरानी तीखी चमक बची थी। सामने खड़े थे दो भाई – अजरी और उसका छोटा भाई हनन। पिता की मृत्यु के बाद से ही दोनों में ज़मीन को लेकर तनाव चल रहा था। मामला सीधा था : बंटवारा। पर हनन का आरोप था कि अजरी, जो घर का बड़ा बेटा था, उसके हिस्से की ज़मीन हड़पना चाहता है।
“यह सब बकवास है,” अजरी का स्वर कर्कश था, “पिता जी के मुँह से कभी ऐसा कहते सुना था क्या?”
एलियाब ने दोनों को चुप कराया। उसने आसपास की भीड़ पर नज़र दौड़ाई, जहाँ कुछ लोग उत्सुकता से, तो कुछ बेरुखी से तमाशा देख रहे थे। फिर उसकी निगाह एक कोने में बैठी उस युवती पर टिक गई, जिसका चेहरा घूँघट से ढका था। मीराम। अजरी की पत्नी, जिसका पति तीन महीने पहले एक दुर्घटना में चल बसा था। अब उसका देवर हनन ही था, जो परिवार की लड़ाई में उलझा हुआ था।
एलियाब ने गहरी साँस ली। वह व्यवस्था की बात जानता था। “हनन,” उसकी आवाज़ में एक भारीपन था, “तुम्हारे भाई का घर बना हुआ है। तुम्हारे पास अपनी ज़मीन है। पर एक बात याद रखो। अगर तुम दोनों एक साथ रहते, और तुम्हारा भाई बिना संतान के मर जाता, तो तुम्हारा कर्तव्य था कि उसकी विधवा से विवाह करके, मरे हुए भाई का नाम इस्राएल में बचाए रखते।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया। हनन ने ज़मीन की ओर देखा। यह कानून सब जानते थे, पर आज के समय में कौन सोचता था ऐसी बातों पर? मीराम ने बिना सिर उठाए, अपने घूँघट के भीतर से, एक ठंडी साँस भरी।
“पर यहाँ,” एलियाब ने अपनी बात जारी रखी, “तुम दोनों अलग रहते आए हो। तुम्हारे भाई की मृत्यु के समय तुम एक थे, यह सिद्ध नहीं। इसलिए यह विधि लागू नहीं होती। पर फिर भी… यह स्त्री तुम्हारी भाभी है। उसके प्रति तुम्हारा व्यवहार कैसा है?”
हनन चुप रहा। उसके चेहरे पर संघर्ष के भाव थे। ज़मीन का लालच था, पर पुराने रीति-रिवाजों का डर भी। एलियाब ने फैसला सुनाया : ज़मीन का बँटवारा नाप-तोल से किया जाएगा, और हनन मीराम को उसके जीवनयापन के लिए अनाज का एक हिस्सा देगा। “पर याद रखो,” एलियाब ने दोनों भाइयों की ओर देखकर कहा, “अगर कोई पुरुष ऐसी स्थिति में हो, और वह अपने भाई का नाम बचाने से इनकार करे, तो शहर के बुजुर्गों के सामने उसकी पत्नी उसका जूता उतारकर उसके मुँह पर थूक सकती है। और उसका घर हमेशा के लिए ‘जिसका जूता उतारा गया’ कहलाएगा। यह अपमान का चिह्न होगा।”
भीड़ में कुछ लोग सहमते से दिखे। यह कठोर लगता था, पर यही व्यवस्था थी। समाज की नींव, न्याय और दया, दोनों पर टिकी थी।
कुछ दिन बाद, शहर के बाज़ार में एक और घटना घटी। एलियाब वहाँ से गुज़र रहा था, जब उसने एक तेज़ आवाज़ सुनी। एक युवक, जिसके हाथ में दो तराजू थे, एक बूढ़े किसान से बहस कर रहा था। “यह देखो! इसमें एक पत्थर कम है! तुम ठगी कर रहे हो!”
बूढ़ा किसान, जिसका नाम बारूक था, हाथ जोड़कर खड़ा था। “मैंने ऐसा कभी नहीं किया, साहब। यह तराजू मेरे बाप-दादों का है…”
एलियाब ने हस्तक्षेप किया। उसने तराजू अपने हाथ में लिए। पत्थर के बाट थे, चिकने, समय के साथ घिसे हुए। उसने अपनी थैली से अपने बाट निकाले, जो उसने हमेशा सँभालकर रखे थे। जब उसने दोनों तुलना की, तो सच सामने आया। बारूक के बाट वास्तव में हल्के थे। शायद समय के साथ घिस गए थे, शायद जानबूझकर। पर फर्क तो था।
“बारूक,” एलियाब की आवाज़ में दुख था, “क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर हमारे साथ कैसा व्यवहार चाहता है? जैसे तुम अपने खेत में बोने और काटने के समय नापते हो, वैसे ही तुम्हें दूसरों के साथ करना चाहिए। दो तरह के बाट रखना, एक बड़ा बेचने के लिए और एक छोटा खरीदने के लिए – यह घृणित है प्रभु की दृष्टि में। यह केवल अनाज का मामला नहीं है, बारूक। यह हमारी आत्मा का मामला है।”
बारूक का सिर शर्म से झुक गया। उसने वादा किया कि वह नए, सही बाट बनवाएगा। बाज़ार में खड़े लोग चुपचाप सब देख रहे थे। यह छोटा सा न्याय, यह छोटा सा सबक, उनके दैनिक जीवन का हिस्सा था।
उसी शाम, एलियाब अपने घर के आँगन में बैठा था। उसका पोता, शमूएल, जो दमिश्क से व्यापार करके लौटा था, उसके पास आकर बैठ गया। उसने रास्ते में सुनी कहानियाँ सुनानी शुरू कीं – दूर देशों के लोग, अजीबोगरीब रीति-रिवाज। फिर अचानक उसने पूछा, “दादा, मैंने कुछ व्यापारियों से सुना है अमालेकियों के बारे में। वे दूर दक्षिण में रहते हैं, है न?”
एलियाब का चेहरा गंभीर हो गया। उसने अपनी लाठी को जमीन पर टिकाया। “अमालेक…” उसने शब्द को धीरे-धीरे दोहराया, जैसे कोई पुराना, कड़वा स्वाद याद कर रहा हो। “हाँ, शमूएल। तुम्हें याद होगा जब हम मिस्र से निकले थे? रास्ते में, जब हम थके-मांदे, कमजोर थे, तब अमालेक ने पीछे से हमला किया था। उन्होंने निःशस्त्र, थके हुए लोगों पर वार किया। वह दुष्टता थी, शमूएल। न्याय या युद्ध का कोई नियम नहीं, बस क्रूरता।”
आँगन में लैम्प की लौ टिमटिमा रही थी। एलियाब की आवाज़ भारी हो गई। “इसलिए परमेश्वर ने हमें आज्ञा दी है कि हम यह बात कभी न भूलें। जब प्रभु तुम्हें शांति दे, तब तुम्हें अमालेक का स्मरण करना है। उनकी बुराई का स्मरण। क्योंकि जो बुराई को भूल जाता है, वह उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होता है। यह कोई प्रतिशोध की बात नहीं है, शमूएल। यह स्मृति की बात है। इसलिए कि हम कभी वैसे न बनें। इसलिए कि हम हमेशा उन कमजोरों की रक्षा करें, जिन पर अमालेक ने वार किया था।”
शमूएल चुपचाप सुनता रहा। बाहर, अवध का रेगिस्तान ठंडी रात की चादर ओढ़कर सो रहा था। भीतर, एक बूढ़े व्यक्ति की यादों में, एक पुरानी चेतावनी जीवित थी। यह सब जुड़ा हुआ था – विधवा मीराम का अधिकार, बाज़ार के तराजू की ईमानदारी, और इतिहास की वह कड़वी याद। यह व्यवस्था का ताना-बाना था, जिसमें से एक भी धागा निकाल देने पर, सबकुछ बिखर सकता था। और एलियाब जानता था कि ईश्वर का न्याय, अंततः, इन्हीं छोटे-छोटे, रोजमर्रा के चुनावों में निहित है।




