पवित्र बाइबल

सृष्टि का महान गीत

सुबह की पहली किरण ने कैलाश पर्वत के बर्फीले शिखर को सोने जैसा रंग दिया था। वृद्ध बाबा मातानाथ, जिनकी दाढ़ी हिमखंडों जैसी सफ़ेद हो चुकी थी, अपनी कुटिया के बाहर बने पत्थर के चबूतरे पर बैठे चूल्हे पर चाय चढ़ा रहे थे। धुएं की एक लहर हवा में उठी और ऊपर, एक गिद्ध के चक्कर काटते हुए आकार में विलीन हो गई। उनकी आँखें, समय और तपस्या से धुँधली पड़ चुकी थीं, फिर भी उस दृश्य को पी लेने की कोशिश कर रही थीं।

आज सुबह से ही एक अजीब सी व्याकुलता उनके भीतर थी। शायद बदलते मौसम की वजह से, या फिर उस सपने की वजह से जो रातभर उनके पीछे पड़ा रहा था—एक सपना जिसमें आकाश और पृथ्वी, दोनों एक साथ कोई प्राचीन मन्त्र गा रहे थे। चाय की केतली चूल्हे पर खदबदा रही थी। उन्होंने एक चुस्की ली, और तभी दूर से आती हुई आवाज़ ने उनका ध्यान खींचा।

नदी की गर्जना थी, जो बर्फ़ पिघलने के साथ और तेज़ हो गई थी। उसका शोर कोई गुस्सैल स्वर नहीं था, बल्कि एक ज़बरदस्त, अटूट गीत जैसा था—एक लयबद्ध धारा जो चट्टानों से टकराकर झनझनाहट पैदा कर रही थी। मातानाथ ने अपनी आँखें बंद कर लीं। यह आवाज़ उनके भीतर उतर गई। “सुनो,” उनके मन ने कहा, या शायद कोई और आवाज़ थी, “यह नदी भी तो उसी की गाथा गा रही है।”

उनका दिन अक्सर मौन और प्रार्थना में बीतता था, पर आज पैरों में एक अजीब सी चंचलता थी। उन्होंने अपना लकड़ी का डंडा उठाया और ऊपर, एक छोटी सी चोटी की ओर चल पड़े, जहाँ से पूरी घाटी नज़र आती थी। रास्ता कठिन था। जूते के नीचे पत्थर खिसकते, कंटीली झाड़ियाँ कपड़े खींचतीं। एक जगह उन्हें रुककर साँस लेनी पड़ी। तभी उन्होंने देखा, एक छोटा सा पक्षी, चट्टान की दरार में घास और पत्तियों से अपना घोंसला बना रहा था। वह इतना मगन था, इतना तल्लीन, मानो संसार की कोई और चिंता ही न हो। उसकी छोटी सी चोंच में तिनका दबाए, वह फुदक-फुदक कर अपना काम कर रहा था।

“तू भी,” मातानाथ ने मुस्कुराते हुए फुसफुसाया, “किसी महान शिल्पी की व्यस्त सन्तान लगता है।”

चोटी पर पहुँचते-पहुँचते सूरज पूरी तरह से उग आया था। नीचे, घाटी एक हरी-भरी चादर बिछाए लेटी थी। देवदार के पेड़ हवा में सरसरा रहे थे, और उनकी गंध—तेज़, शुद्ध, पवित्र—हवा में घुल मिल गई थी। तभी एक तेज़ हवा का झोंका आया, और सारे पेड़ एक साथ झुक गए, पत्तियों की सरसराहट एक ऐसा संगीत बन गया जिसे सुनकर मातानाथ की रूह तक काँप उठी। यह कोई साधारण हवा नहीं थी। यह तो वह श्वास थी जो सब कुछ चलाती है, जो बादलों को ढकेलती है और समुद्र की लहरों में साँस भरती है। उन्हें लगा जैसे स्वयं आकाश उनसे कुछ कह रहा हो।

उन्होंने अपना सिर ऊपर उठाया। आकाश नीला और अनंत था। कुछ बादल, पतले और सफ़ेद, मानो भेड़ों के झुंड हों, धीरे-धीरे बह रहे थे। और फिर, ऊपर, बहुत ऊपर, एक बाज़ तैर रहा था। उसकी उड़ान में एक ऐसी स्वतंत्रता और शक्ति थी कि देखते ही बनती थी। वह सूरज की रोशनी में चमकता हुआ, चक्कर काटता रहा, मानो आकाश के उस विशाल मंदिर का कोई पुजारी हो।

तभी मातानाथ के होठों से शब्द फूट पड़े, वही शब्द जो सदियों से मनुष्य की जुबान पर रहे हैं, पर आज एक नए अर्थ के साथ:

“आकाश से उसकी स्तुति हो!
फरिश्तों और सारे स्वर्गदूतों से उसकी प्रशंसा हो!
सूरज और चाँद उसकी महिमा बखानें!
तेजतेज सितारे उसके नाम का जयजयकार करें!”

उनकी आवाज़ भरी हुई नहीं थी, पर वह पहाड़ की चुप्पी में स्पष्ट सुनाई दे रही थी। और जैसे ही वे बोले, लगा जैसे पूरी सृष्टि उनके साथ सुर मिला रही हो। हवा ने उनके शब्दों को उठा लिया। नदी की गर्जना उनके पीछे-पीछे चलने लगी। पेड़ों की सरसराहट एक ताल बन गई।

वे नीचे की ओर देखने लगे—उस धरती की ओर, जो इतनी जीवंत थी। दूर, घाटी में, गाँव के खेत हरे-हरे चादर बिछाए थे। भेड़-बकरियों के झुंड, दूधिया बादलों के टुकड़े लगते, पहाड़ी ढलानों पर चर रहे थे। एक गड़रिया लड़का अपनी सीटी बजा रहा था, और उसकी धुन हवा में तैरती हुई ऊपर तक आ रही थी।

“धरती से उसकी बड़ाई हो!
समुद्र के सारे जीव और गहराइयाँ उसका गुणगान करें!
बिजली और ओले, बर्फ़ और धुंध, उसकी आज्ञा मानने वाली हवाएँ, सब उसकी प्रशंसा करें!”

उन्हें अपना बचपन याद आ गया, जब वे मैदानी इलाके में रहते थे और भयंकर गरज के बाद आसमान साफ़ हो जाता था। बिजली का कड़कना भी एक तरह का भजन ही तो था—प्रचंड, भयावह, पर फिर भी उसी की महिमा का प्रमाण।

अब उनकी नज़र पहाड़ की तलहटी में बसे छोटे से गाँव पर पड़ी। वहाँ लोग जाग चुके थे। खेतों में हल चल रहे थे। महिलाएँ कुएँ से पानी भरकर ले जा रही थीं, उनके घड़े सिर पर सधे हुए। बच्चों की किलकारियाँ, कुत्तों के भौंकने की आवाज़, लोहे के हथौड़े की टनटनाहट—ये सब मिलकर एक जीवंत सिम्फनी बना रहे थे। राजा और रंक, जवान और बूढ़े, स्त्री और पुरुष… सब अपने-अपने काम में लगे हुए थे।

और तब मातानाथ ने महसूस किया—यही तो असली भजन है। यह संपूर्ण जगत, हर पल, हर सांस में उसी के नाम का जयघोष कर रहा है। नदी का बहना, पक्षी का घोंसला बनाना, हवा का बहना, बाज़ का उड़ना, किसान का हल चलाना, बच्चे का हँसना… ये सब अलग-अलग स्वर हैं एक ही महान गीत के। यह गीत बिना शब्दों का है, पर हर चीज़ उसे गा रही है।

उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने अपना माथा ज़मीन पर टेक दिया। अब उनकी प्रार्थना में कोई अकेलापन नहीं था। वे अब अकेले नहीं थे। वे उस विशाल, जीवित, गाती हुई सृष्टि का एक अंग थे। उनके होठों से फिर वही पुराने शब्द निकले, पर अब वे नए थे, उनके अपने थे:

“वह एक है, उसका नाम अद्भुत है। उसकी महिमा पृथ्वी और आकाश दोनों पर छाई हुई है। और हम… हम सब, पहाड़ और पक्षी, नदी और बच्चे, हवा और तारे… हम सब मिलकर केवल एक ही गवाही देते हैं—कि वही है। और यही हमारा धर्म है, यही हमारा गीत है।”

शाम ढलने लगी थी। पहाड़ों की चोटियाँ एक बार फिर सोने जैसी लग रही थीं। मातानाथ ने अपना डंडा उठाया और वापस कुटिया की ओर चल पड़े। अब उनके कदमों में वही पुरानी थकान नहीं थी। उनके भीतर एक संगीत भर गया था—वही संगीत जो सारे ब्रह्मांड को थामे हुए था। और जैसे-जैसे अँधेरा घिरने लगा, आकाश में पहला तारा टिमटिमाया, मानो उस महान गीत का अंतिम स्वर, एक मधुर विराम।

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