पवित्र बाइबल

आगूर की शिक्षाएँ

यह बात है आगूर की, याकीन के पुत्र की। वह दमिश्क के उत्तर में, एक ऐसे गाँव में रहता था जहाँ से हेर्मोन पर्वत की बर्फ़ीली चोटियाँ दिखाई देती थीं। दिन ढलने का समय था। आगूर अपनी कुटिया के सामने, एक जैतून के पेड़ के नीचे बैठा था। हवा में धूल के कण तैर रहे थे, और दूर से किसी चरवाहे की सीटी की आवाज़ आ रही थी। उसका मन अशांत था।

उसने अपने शिष्य इताई की ओर देखा, जो चट्टान पर बैठकर मेम्नों के झुंड पर नज़र रखे हुए था। “इताई,” आगूर ने आवाज़ दी, उसकी आवाज़ में एक थकान थी, “मैं तो हर दृष्टि से अयोग्य हूँ। मेरी समझ में मनुष्य की बुद्धि नहीं आती। मैंने न तो पवित्र ज्ञान पाया है, न ही परमपिता का गहन ज्ञान।”

इताई चला आया। वह जवान था, उसकी आँखों में सीखने की एक प्यास थी। आगूर ने जमीन पर एक सूखी टहनी से कुछ रेखाएँ खींचीं। “सुन, कौन ऊपर आकाश पर चढ़कर आया और उतरा? किसने अपनी मुट्ठी में हवाओं को बाँध रखा है? किसने पानी को चादर में लपेटा? किसने पृथ्वी की सब सीमाएँ निश्चित कीं? अगर तुझे पता हो, तो बता, उसका नाम क्या है, और उसके पुत्र का नाम क्या है? क्या तू जानता है?”

इताई चुप रहा। उसकी समझ में ये बातें नहीं आ रही थीं। आगूर ने एक लम्बी सांस ली। “हर वचन परमेश्वर का शुद्ध है। उसकी शरण लेने वाले के लिए वह ढाल है। उसके वचनों में कुछ मत मिला, न ही घटा। वरना वह तुझे ठीक करेगा, और तू झूठा ठहरेगा।”

अगले दिन, वे दोनों एक खेत के किनारे से गुज़रे। वहाँ, एक पत्थर के नीचे, चींटियों की एक लंबी कतार चल रही थी। आगूर ने ठहर कर देखा। “देख इताई, इन चींटियों को। ये न तो बलवान हैं, न ही इनके पास कोई अधिपति है। फिर भी गर्मी के दिनों में ये अपनी खुराक जमा कर लेती हैं। ये समझदार हैं।”

थोड़ा आगे चलकर, एक बबूल के पेड़ पर काँटों का एक घोंसला था। पहाड़ी बाज़ वहाँ बैठी थी, अपने बच्चों को दाना खिला रही थी। “और वह देख,” आगूर ने उंगली उठाई, “बाज़ आकाश में उड़ती है, उसकी छाती हवा से टकराती है। उसके उड़ने का रहस्य कौन जानता है? पर वह अपने घोंसले को काँटों में बनाती है, चट्टान की दरार में उसे सुरक्षित रखती है।”

दोपहर को, जब वे एक संकरे रास्ते से लौट रहे थे, रास्ते में एक छोटा सा कीड़ा दिखाई दिया जो अपने सारे पैरों से ज़मीन पर टेढ़ा-मेढ़ा चल रहा था। “साँप,” आगूर बोला, “वह चट्टान पर हाथों के बल चलता है, फिर भी उसका ज़हर राजाओं को डरा देता है।”

इताई ने पूछा, “गुरु, ये सब बातें तू क्यों बता रहा है?”

आगूर ने एक पत्थर पर बैठते हुए कहा, “क्योंकि इस संसार में तीन बातें हैं, बल्कि चार, जो कभी नहीं कहतीं ‘बस, बहुत हो गया’। कब्र की लालसा कभी नहीं भरती। बाँझ गर्भ, जो संतान के लिए तरसता है, कभी शांत नहीं होता। पानी, जो बरसने की लालसा रखता है, कभी नहीं थकता। और आग, जो कहती ही नहीं, ‘अब बस करो’।”

उसकी बात सुनकर इताई सोच में पड़ गया। फिर आगूर ने उन चीज़ों के बारे में बताना शुरू किया जो पृथ्वी पर उसे हैरान करती थीं। “ऐसी पीढ़ी है जो अपनी आँखें ऊँची रखती है, जिनकी पलकें गर्व से उठी रहती हैं। ऐसे लोग हैं, जिनके दाँत तलवारें हैं, जबड़े छुरे हैं, जो धरती के दीन-हीनों को खा जाना चाहते हैं।”

वह रुका, और उसकी आवाज़ में एक दर्द उतर आया। “चींचड़ी के पास दो बेटियाँ हैं, जो ‘लाओ, लाओ’ कहती रहती हैं। तीन बातें हैं जो कभी नहीं भरतीं, चार जो कभी नहीं कहतीं ‘बस’। वह है अधोलोक, बाँझ गर्भ, प्यासी धरती, और आग। ऐसी ही एक और बात है—ऐसा मनुष्य जो अपने पिता की अवज्ञा करता है, और अपनी माँ को दुत्कारता है। उसकी आँखें नदी के कगार पर कौवों से नोची जाएँगी, और गिद्ध उन्हें खा जाएँगी।”

शाम होने लगी थी। आगूर ने अंत में कुछ छोटी-छोटी बातें कहीं, जैसे कोई बुजुर्ग अपने जीवन का निचोड़ बता रहा हो। “मेरे लिए दो बातें मांग, इससे पहले कि मैं मर जाऊँ। निर्धनता न भेजना, न ही धन। केवल उतना ही भोजन दे जो मेरे लिए ठीक हो। नहीं तो, हो सकता है मैं तुझे झुठलाकर कहूँ, ‘यहोवा कौन है?’ या फिर धन पाकर मैं यह न कहूँ, ‘परमेश्वर की आवश्यकता ही क्या है?’ किसी सेवक के बारे में बुरी बात न कहना, वरना वह तुझे श्राप देगा, और तू दोषी ठहरेगा।”

उसने आँखें बंद कर लीं, और धीरे-धीरे बोला, “ऐसी पीढ़ी है जो अपने पिता पर श्राप डालती है, और अपनी माँ को आशीर्वाद नहीं देती। ऐसी पीढ़ी है जो अपने आप को शुद्ध समझती है, पर अपने कलंक से धुली नहीं है। ऐसी पीढ़ी है, जिनकी आँखें कितनी ऊँची हैं, और जिनकी पलकें गर्व से उठी हैं। ऐसी पीढ़ी है, जिनके दाँत तलवारें हैं… वे भूखों को खाते हैं।”

हवा ने जैतून के पत्तों को हिलाया। आगूर ने अंतिम बात कही, जैसे कोई प्रार्थना हो: “चार छोटे प्राणी हैं, पर बड़े बुद्धिमान। चींटी—बलवान न होने पर भी गर्मी में भोजन जमा कर लेती है। खरगोश—निर्बल है, पर चट्टानों में अपना घर बना लेता है। टिड्डी—इनका कोई राजा नहीं, पर सब मिलकर टिड़ियों की सेना बना लेते हैं। गिरगिट—जो हाथों से पकड़ा जाता है, पर राजमहलों में पाया जाता है।”

वह चुप हो गया। इताई ने देखा, उसके गुरु का चेहरा अब शांत लग रहा था, जैसे बादल छट गए हों। उसने इन बातों को अपने मन में उतार लिया, जैसे कोई बीज बोता है। दूर हेर्मोन पर्वत पर सूरज की आखिरी किरणें लालसा लिए फिसल रही थीं, और गाँव में चिराग जलने लगे थे। सत्य कितना साधारण, और कितना गहरा था। सब कुछ उसकी जगह पर था, और हर छोटी चीज़ में उसकी महिमा के दर्शन होते थे। बस, देखने वाली आँख चाहिए।

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