पवित्र बाइबल

यिशै के ठूंठ से आशा का अंकुर

यहूदा के सुनसान पहाड़ों पर एक दोपहर, हवा में ठंडक थी और आसमान सीसे जैसा भारी लग रहा था। यशायाह ने अपनी कुटिया के सामने बैठकर जैतून के एक पुराने पेड़ की जड़ों को देखा। वह पेड़ काफी पहले कट गया था, बस ज़मीन से सटा हुआ एक मोटा, काला ठूंठ रह गया था। उसकी सतह दरारों से भरी थी, जैसे समय की लकीरें हों। पर उस ठूंठ के बिलकुल पास, जहाँ से पुरानी जड़ें ज़मीन में धंसी थीं, वहाँ से एक नन्हा, हरा अंकुर फूट निकला था। कोमल, लेकिन जिद्दी। हवा के झोंकों में वह लचक तो रहा था, पर टूटा नहीं।

यशायाह की आँखें उस अंकुर पर टिक गईं। और फिर, ऐसा लगा जैसे समय की परतें खिसकने लगीं। वह अंकुर बढ़ने लगा, न एक साधारण पौधे की तरह, बल्कि एक सुगंधित, जीवित खम्बे की तरह। उसकी डालियाँ फैलीं, और उन पर सात प्रकार के रंग दिखाई देने लगे – ज्ञान का गहरा नीला, समझ का शांत हरा, सलाह का सुनहरा, सामर्थ्य का लाल, ज्ञान का बैंगनी, यहोवा-भय का श्वेत, और चाक्षुष सत्य का तेजोमय प्रकाश। ये सब रंग उस एक ही तने में समाये हुए थे, जैसे इंद्रधनुष की शांति एक ही बूंद में कैद हो।

और फिर उस डाली पर एक फूल खिला – एक राजसी, शांत पुरुष। उसकी आँखों में केवल न्याय नहीं, बल्कि न्याय की प्यास थी। उसके कान गरीब की दबी हुई आह तक सुनने को बेताब थे। वह दीन-हीनों के लिए साँस लेने जैसा न्याय करता, और दुष्टों के लिए उसकी सांस ही तलवार बन जाती। उसकी कमर सच्चाई की करधनी से कसी थी, और कंधे विश्वासनीयता के चोगे से ढके।

तभी दृष्टि और फैल गई। वह पहाड़ी इलाका बदलने लगा। वह ठूंठ और उसका विस्तारित वृक्ष अब एक ऐसे जंगल के बीच में था, जहाँ शांति का एक अजीब नियम राज कर रहा था। भेड़िया मेमने के साथ चर रहा था, पर उसके दांतों में घास की एक पतली सी कटी हुई डंठल दिखी। चीता बकरी के बच्चे के पास बैठा था, और बच्चा उसकी खाल पर हाथ फेर रहा था, जैसे कोई बिलौने को सहला रहा हो। बछड़ा और शेर का बच्चा एक ही घास के ढेर पर लेटे थे, और एक छोटा बच्चा, शायद चरवाहे का बेटा, उन दोनों को हाँककर लिए जा रहा था। बच्चे का हाथ शेर के बच्चे की अयाल पर था, और बछड़ा उसकी दूसरी बाँह के नीचे चल रहा था।

गाय और रीछ एक ही घास चर रहे थे। उनके बच्चे, एक दूसरे से सटकर, एक ही छाया में सोए हुए थे। सबसे अद्भुत तो यह था कि एक दूधमुँहा शिशु विषैले नाग के बिल के मुहाने पर खेल रहा था, और एक नन्हा बच्चा, जिसके दाँत भी नहीं निकले थे, कोबरा की उस गुफा पर हाथ रखे हुआ था जहाँ से जहर टपकता है। कोई डर नहीं, कोई नुकसान नहीं। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी सृष्टि उस एक ठूंठ से निकले वृक्ष की जड़ों से जुड़ गई हो, और उस जुड़ाव ने सारी शत्रुता, सारी भय की आग बुझा दी हो।

वह पुरुष, वह अंकुर, पहाड़ी की चोटी पर खड़ा था। उसने एक झंडा उठा रखा था – यूसुफ के लिए, उन लोगों के लिए जो बिखरे हुए थे, जो हर कोने में फैले हुए थे। और लोग, समुद्र के पार से, दूर-दूर के द्वीपों से, उस झंडे की ओर आने लगे। उनके चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में एक नई चमक। वह शांति का राज्य सिर्फ जानवरों का नहीं था; वह उन लोगों का भी था जो तितर-बितर हो गए थे।

यशायाह ने एक लम्बी सांस ली। आँखें खोलीं तो वही पुराना ठूंठ और उसका नन्हा अंकुर था। पर अब वह अंकुर उसे वैसा नहीं लग रहा था। वह एक वादा था। एक आश्वासन कि जब सब कुछ कटा हुआ, मरा हुआ, निराश दिखे, तब भी जड़ें जीवित हैं। और उन जड़ों से कोई न कोई अंकुर, कोई न कोई शाखा, अवश्य फूटेगी। और उस दिन, डर का राज नहीं, बल्कि परमेश्वर का ज्ञान पृथ्वी को भर देगा, जैसे समुद्र का पानी गहराइयों को ढक लेता है।

शाम ढल रही थी। यशायाह ने अपनी तख्ती और शीशा उठाया। उस कोमल हरियाले अंकुर को एक आखिरी नज़र देखकर, उसने वे शब्द लिखने शुरू किए, जो सदियों तक गूंजने वाले थे। “और यिशै के ठूंठ में से एक डाली फूटेगी, और उसकी जड़ों में से एक अंकुर फलेगा…” शब्द उसकी उंगलियों से निकलकर चर्म पर उतरने लगे, एक ऐसे भविष्य का नक्शा, जो अभी देखा नहीं जा सकता था, पर जिसकी सुगंध हवा में तैर रही थी।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *