वह अकेली रह गई थी। सुनसान झोपड़ी की चारदीवारी में, रातों के सिलसिले उसे चीरते हुए, सुबह की पहली किरण को झरोखे से झाँकते देखना ही उसका एकमात्र काम था। नाम? अब नाम का कोई अर्थ नहीं रह गया था। लोग उसे ‘विधवा’ कहते थे, और यही उसकी पहचान बन कर रह गया था। बंजर जमीन की तरह उसका जीवन था, जहाँ कभी हरियाली के संकेत भी नजर आते थे, अब सिर्फ धूल और टूटे सपनों का मैदान था।
एक दिन, जब सर्द हवा का झोंका उसके आँगन में उड़ी हुई पुरानी पत्तियों को खेलने पर मजबूर कर रहा था, तब वह बैठी अपने हाथों की शिराओं को निहार रही थी। तभी, एक आवाज, न आकाश से, न धरती से, बल्कि उसके अपने भीतर के किसी कोने से, मानो पुरानी यादों की गूँज की तरह उभरी — “गा! हे बांझ, तू जो न जनी, जोर से गा और चिल्ला! हे वह जिसे पीड़ा न हुई, तू भी जयजयकार कर।”
वह चौंकी। यह उसका अपना विचार तो नहीं था। इतने वर्षों की मौन स्वीकारोक्ति के बाद यह आदेश अटपटा लगा। गाना? चिल्लाना? उसके पास तो आवाज ही नहीं बची थी रोने के लिए। पर वह आवाज फिर आई, कोमल पर दृढ़, “अकेले रहनेवाली के लिए तेरे बच्चे, स्त्री के बच्चों से अधिक होंगे।”
उसने आँखें मूँद लीं। एक तस्वीर उभरी — नंगे पहाड़ों पर अचानक हरी दूब उग आई, सूखी नदियों के रास्ते में पानी की धार फूट पड़ी। वह विश्वास नहीं कर पा रही थी, पर उसका मन, सूखी लकड़ी की तरह जो बरसात की पहली बूंद का इंतजार कर रही हो, एक अजीब सी नमी महसूस करने लगा।
दिन गुजरे। वह आवाज उसका पीछा करती रही, जैसे कोई साथी जो धीरे-धीरे चलना सिखा रहा हो। “मत डर,” वह कहती, “क्योंकि तुझे लज्जित न होना पड़ेगा। उस नौजवानी की लज्जा को जो तेरी विधवाई के दिनों की है, तू भूल जाएगी।”
एक शाम, जब आसमान में बादल ताँबे का रंग लिए हुए थे, वह अपनी झोपड़ी के बाहर खड़ी थी। सामने फैला खेत सूना पड़ा था। तभी उसे एक दृश्य दिखाई दिया — नहीं, आँखों से नहीं, हृदय की आँखों से। वह खेत हरा-भरा था, उसमें फसल लहलहा रही थी, और उसकी अपनी झोपड़ी नहीं, बल्कि एक विशाल, मजबूत महल-सा घर खड़ा था, जिसकी नींव नीलमणि जैसी चमकदार पत्थरों से बनी थी। उस महल से बच्चों की किलकारियाँ गूँज रही थीं। यह कोरी कल्पना नहीं थी। यह एक वादा था, जो उसकी आत्मा में रोप दिया गया था।
“तेरे निवास के लिए जगह कम पड़ेगी,” आवाज ने कहा, “तू दायें-बायें फैल जाएगी।”
उसने देखा, उसकी सीमाएँ, जो कभी उसके दुःख की चारदीवारी थीं, अब दूर-दूर तक, पहाड़ों और घाटियों तक, फैल रही थीं। एक विचित्र शक्ति उसके भीतर भरने लगी। अब वह सिर्फ पीड़िता नहीं रह गई थी। वह एक रानी बनने का सफर तय कर रही थी, जिसका पति स्वयं सारे जगत का सृजनहार था।
पुरानी यादें, वे आँसू जो सूख चुके थे, अब एक नए अर्थ में लौटे। “क्षण भर के कोप के बाद मैं तुझ पर अनंतकाल तक दया करूँगा।” उसे एहसास हुआ, उसकी एकाकी रातें, वह तड़प, वह खालीपन, वह सब एक ‘क्षण भर’ था। और अब समय आ गया था अनंत दया का, एक ऐसा प्रेम जो कभी टूटेगा नहीं।
वह उठी। उसने अपनी झोपड़ी का दरवाजा खोला। हवा में अब सर्दी नहीं, बसंत की सौम्य गंध थी। उसने अपना सिर ऊँचा किया। डर अब पीछे छूट चुका था। “हे पहाड़, टल जाओ!” उसके मन में एक गीत उमड़ने लगा, “हे पहाड़ो, हिलो, और हे पहाड़ की चट्टानों, तुम बह जाओ! परन्तु मेरी करूणा तेरे ऊपर से न हटेगी।”
वह जानती थी, अब कोई भी हथियार, कोई भी कठोर शब्द, उसके और उसके प्रभु के बीच नहीं आ सकता। एक अटूट विश्वास का नगर उसके हृदय में बन चुका था, जिसकी नींव न्याय और दया के पत्थरों से रखी गई थी।
सुबह हुई। पहली बार उसने अपनी झोपड़ी की दहलीज पर बैठकर, नई उगती हुई धूप को नहीं, बल्कि आने वाले कल को देखा। वह अब अकेली नहीं थी। वह प्रतिज्ञा की पत्नी थी। और उसकी कहानी अभी शुरू ही हुई थी।




