पवित्र बाइबल

योना और करुणा का रेंड़

योना नगर के पूर्व की ओर बैठा था। वहाँ उसने एक झोंपड़ी सी बना ली थी, धूप से बचने को। मन उसका उबल रहा था—एक गहरी, कसैली उबाल, जो उसके भीतर सुलगती रहती। नीनवे बच गया था। उसका विनाश नहीं हुआ था। और यह बात उसके लिए आग के समान थी।

उसने प्रभु से कहा भी था, “क्या यही नहीं मैं अपने देश में रहते हुए कहता था? इसीलिए तो मैं तर्शीश भागा था। मैं जानता था कि तू कृपालु और दयावान ईश्वर है, विलम्ब से कोप करने वाला, और अत्यधिक दयालु। अब, हे प्रभु, कृपया मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मेरे लिए मरना जीने से अच्छा है।”

लेकिन प्रभु ने उत्तर दिया, “क्या तेरा क्रोध करना उचित है?”

योना ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह चुपचाप नगर की ओर देखने लगा, यह देखने को कि क्या होता है। सूरज तप रहा था, और हवा में रेत के कण चमक रहे थे। उसने अपनी झोंपड़ी के सहारे खड़े होकर, दूर नगर की विशाल दीवारों को निहारा। इतने लोग… इतने पशु… सब मन फिरा लिए थे। और उसे ऐसा लगा जैसे उसकी सारी भविष्यवाणी, उसका सारा संघर्ष, समुद्र की गहराई में डूबा हुआ अनुभव—सब व्यर्थ गया। उसकी प्रतिष्ठा का क्या होगा? लोग कहेंगे—देखो, योना ने विनाश की घोषणा की, और कुछ नहीं हुआ।

तभी प्रभु ईश्वर ने एक रेंड़ का पेड़ उगाया, जो योना के सिर पर छाया करे, ताकि उसकी पीड़ा दूर हो। योना उस पेड़ के कारण अत्यधिक प्रसन्न हुआ। छाया ठंडी थी, कोमल। पत्ते चौड़े और हरेभरे, जैसे हाथ फैलाए कोई दयालु प्राणी। उसने आँखें मूँद लीं। शायद, अब कुछ सुख तो मिलेगा। शायद इस छाया में बैठकर वह अपने मन की जलन को शांत कर पाएगा।

लेकिन प्रसन्नता एक दिन ही टिकी। भोर होते ही, परमेश्वर ने एक कीट बनाया, जिसने रेंड़ के पेड़ को काट डाला, और वह सूख गया। सूरज फिर उगा, और इस बार पूर्वी हवा का एक तेज झोंका आया, जो रेत और गर्मी को साथ लाया। सूरज योना के सिर पर चिपक गया, और वह बेहोश होने लगा। छाया गायब थी। केवल तपती धूप, चिलचिलाती हवा, और सूखे पेड़ का ठूँठ।

फिर वही पुराना क्रोध, पर अब उसमें एक निराशा मिली हुई थी। उसने फिर मृत्यु की इच्छा की। “मरना ही उचित है,” वह बड़बड़ाया।

तब परमेश्वर ने योना से कहा, “क्या इस रेंड़ के पेड़ के लिए तेरा क्रोध करना उचित है?”

योना ने, अपनी थकान और गर्मी से तप्त होकर, जवाब दिया, “हाँ, उचित है। मैं क्रोध करता हूँ, इतना कि मरना चाहता हूँ।”

यहाँ परमेश्वर की वाणी में कोमलता थी, पर दृढ़ता भी। “तू इस पेड़ पर दया करता है, जिसके लिए तूने कोई परिश्रम नहीं किया, न ही इसे बढ़ाया। यह एक रात में हुआ, और एक रात में नष्ट हो गया। फिर क्या मैं नीनवे उस महान नगर पर दया न करूँ, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं, जो अपने दाएँ-बाएँ को पहचानते भी नहीं; और साथ ही बहुत से पशु भी?”

योना चुप रहा। उसने नगर की ओर देखा, जहाँ से धुँए की कुछ रेखाएँ उठ रही थीं—रसोई के चूल्हे जल रहे होंगे। उसे बच्चों की किलकारियाँ सुनाई दीं, जो दूर से हवा में तैर रही थीं। पशुओं की रंभाहट। जीवन।

उसकी आँखें अचानक भीग गईं। क्रोध की आग पर, करुणा की एक हल्की फुहार पड़ी। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह आँसू हैं या पसीना। उसने अपना सिर घुटनों पर रख लिया। छाया नहीं थी, पर एक विचित्र शांति थी—वह शांति जो पराजय के बाद आती है, जब अपनी सभी निश्चितताओं को धूल में मिलता हुआ देखते हैं।

हवा चलती रही। सूरज अभी भी तप रहा था। पर अब गर्मी उतनी कष्टदायक नहीं लग रही थी। शायद इसलिए क्योंकि उसने महसूस किया कि उसकी तपन के बगल में ही, एक विशाल नगर की साँसें चल रही थीं, और प्रभु उन साँसों को सुन रहे थे। और शायद, उसकी अपनी साँस भी।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *