पवित्र बाइबल

सुंदर द्वार पर चमत्कार

दोपहर की झुलसाती धूप यरूशलेम की पथरीली गलियों को तपा रही थी। शहर अभी भी त्योहार की थकान और उल्लास दोनों को झेल रहा था। मंदिर का विशाल परिसर, जो सुबह से ही भीड़ से गूंज रहा था, अब दोपहर की निस्तब्धता में थोड़ा शांत हो रहा था। ‘सुंदर’ कहलाने वाले उस दरवाज़े के पास, एक आदमी रोज़ की तरह बैठा हुआ था। उसका नाम कोई नहीं जानता था, लेकिन उसकी जगह सब जानते थे। चालीस साल से ज़्यादा हो गए थे जब से वह लँगड़ा पैदा हुआ था। उसकी दुनिया उसी पत्थर के फर्श तक सिमटी हुई थी, जहाँ उसे हर रोज़ उसके रिश्तेदार उठाकर लाते और भीख माँगने के लिए बैठा देते।

उस दिन भी वही दिनचर्या थी। उसने अपना कम्बल समेटा, टूटी हुई कटोरी सामने रखी और आने-जाने वालों के चेहरों की ओर देखने लगा। उनकी आँखों में वही दो भाव पढ़ता – कुछ में दया का झलकता हुआ स्पर्श, तो अधिकतर में एक ऐसी उदासीनता, जो देखते हुए भी न देखने जैसी होती। वह आवाज़ लगाता, “भाई, दया करो। माँ-बाप की कब्र पर एक दिया जला आऊँगा।” कुछ सिक्के कटोरे में गिरते, ज़्यादातर लोग नज़र फेरकर मंदिर के भव्य द्वार से अंदर चले जाते।

तभी उसने दो आदमियों को आते देखा। वे गलीली लगते थे, साधारण कपड़े पहने, चेहरों पर एक अलग ही तेज था। वे प्रार्थना के लिए आने वाले भीड़ के साथ मंदिर में प्रवेश करने वाले थे। भिखारी ने रस्मी तौर पर अपना वाक्य दोहराया, हाथ फैलाया। उनमें से एक, जिसका नाम पतरस था, रुक गया। उसने यूहन्ना की ओर देखा, फिर उस आदमी की तरफ गहरी, स्थिर नज़रों से देखने लगा। ऐसा नहीं था कि वह भिखारी को नज़रअंदाज़ कर रहा था; बल्कि उसे जैसे पूरी तरह से देख रहा था।

“हमारी तरफ देखो,” पतरस ने कहा। उसकी आवाज़ में अधिकार था, परन्तु कठोरता नहीं।

भिखारी ने उम्मीद से देखा। शायद ये दोनों कोई उदार दान देने वाले हैं। उसने अपनी टूटी कटोरी और ज़ोर से आगे की ओर बढ़ाई।

पतरस ने धीरे से सिर हिलाया। “चाँदी-सोना तो मेरे पास है नहीं,” उसने कहा, “पर जो मेरे पास है, वही तुझे देता हूँ। नासरत के यीशु मसीह के नाम पर, उठ और चल!”

ये शब्द हवा में लटके रह गए। भिखारी की आँखों में एक पल के लिए अविश्वास की झलक दौड़ गई। फिर, पतरस ने उसका दायाँ हाथ पकड़ा और उसे सहारा देकर ऊपर की ओर खींचा।

और तब वह घटना घटी, जिसे वह आदमी अपने जीवन के चालीस सालों में एक पल के लिए भी सपने में नहीं देख सकता था। उसके पाँव और टखनों में एक अजीब-सी गर्मी दौड़ गई। जो हड्डियाँ और स्नायु कभी काम नहीं करते थे, वे अचानक जीवित हो उठे। एक ऐसी ताक़त, जो उसके भीतर से नहीं, बल्कि कहीं बाहर से आ रही थी, उसकी टूटी देह में भर गई। वह अपने पैरों के बल खड़ा हो गया – पहली बार। जमीन का स्पर्श उसे एक नया अनुभव लगा। उसने ज़ोर देकर अपने पैरों पर वज़न डाला, और वे हिले नहीं। उसने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर दूसरा।

धीरे-धीरे, फिर तेज़, और फिर एक उन्माद की गति से। वह उछलने लगा, भागने लगा, वह मंदिर के उस आँगन में जहाँ वह कभी प्रवेश नहीं कर पाया था, दौड़ लगाने लगा। वह चिल्ला रहा था, पर शब्द नहीं निकल रहे थे, केवल आनन्द के विस्मय भरे रोने निकल रहे थे। उसके आँसू उसकी दाढ़ी पर बह रहे थे, पर उसने उन्हें पोंछा नहीं। वह ईश्वर की स्तुति करता हुआ, लोगों के बीच घूम रहा था।

भीड़ एकत्र हो गई। लोग हैरान थे। उसे पहचानने वाले एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे। “क्या यह वही नहीं है जो सुंदर द्वार पर भीख माँगा करता था?” “हाँ, वही तो है! पर अब यह कैसे चल फिर रहा है?” एक सनसनी सी फैल गई।

लोगों का झुंड पतरस और यूहन्ना के इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गया, जो सुलैमान के खम्भों के पास खड़े थे। उनके चेहरे पर विस्मय था, पर शोर-शराबा नहीं।

तब पतरस ने लोगों की ओर रुख किया। उसकी आवाज़ गम्भीर और स्पष्ट थी। “हे इस्राएल के लोग,” उसने कहा, “तुम इस पर इतने आश्चर्य क्यों करते हो? हमारी ओर क्यों देख रहे हो, मानो हमने अपनी शक्ति या धर्म से इसको चलने की सामर्थ्य दी है?”

भीड़ स्तब्ध थी। पतरस ने अपनी बात जारी रखी। उसने अब्राहम, इसहाक और याकूब के परमेश्वर का नाम लिया। फिर सीधे बात की। “तुमने उस पवित्र और धर्मी को, यीशु को, अस्वीकार कर दिया। तुमने एक हत्यारे की क्षमा माँगी, और उस जीवन के स्रोत को मरवा डाला। परन्तु परमेश्वर ने उसे मृत्यु से जिला दिया, हम इस बात के गवाह हैं। और इस आदमी को जो चंगाई मिली है, वह उसी यीशु के नाम के विश्वास से, उसी की सामर्थ्य से मिली है। नाम जिसे तुमने क्रूस पर ठोका, वही नाम उसे यह सबलता दे रहा है जिसे तुम देख रहे हो।”

उसकी बातों में ताड़ना थी, पर निराशा नहीं। उसने उनसे पश्चाताप का आह्वान किया, ताकि उनके पाप मिटाए जा सकें और वे विश्राम के समय प्रभु के पास लौट सकें। उसने कहा, “तुम वंश के लोग, वह भविष्यवक्ता जिसकी चर्चा मूसा ने की थी, वह यीशु ही है। उसी की बात मानो।”

कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। वह चंगा हुआ आदमी अब भी पतरस और यूहन्ना के साथ था, चिपटा हुआ सा। जब मंदिर के अधिकारियों ने, सदूकियों ने, जो मरे हुओं के जी उठने में विश्वास नहीं करते थे, यह सब देखा-सुना, तो वे बहुत क्षुब्ध हुए। उन्होंने दोनों प्रेरितों को पकड़ लिया, और अगले दिन तक हवालात में डाल दिया। पर उस समय तक, पाँच हज़ार से ज़्यादा लोग उस सन्देश पर विश्वास कर चुके थे।

और वह आदमी? वह अगली सुबह भी मंदिर में था। अब भीख माँगने के लिए नहीं, बल्कि उस स्थान पर खड़ा होकर देखने के लिए जहाँ उसकी ज़िन्दगी बदल गई थी। उसके पैर अब भी मज़बूत थे। वह अब भी चल सकता था। और हर कदम के साथ, वह उस नाम का स्मरण करता, जिसने उसे न केवल चलना सिखाया, बल्कि उसे जीना सिखाया था।

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