(यह कहानी प्रथम शताब्दी के मकिदुनिया के नगर थिस्सलुनीके की पृष्ठभूमि में रची गई है, और पौलुस के दूसरे पत्र के सन्दर्भ को एक कथा का रूप देती है।)
हवा में पहले से ही एक तीखी सर्दी का आभास था, हालाँकि पतझड़ अभी पूरी तरह बीता भी नहीं था। एग्नाटियस सड़क के किनारे खड़ा, अपनी बुनाई हुई ऊन की चादर को कसकर शरीर पर लपेटे हुए था। उसकी नज़रें पूर्व की ओर, उस मार्ग पर टिकी थीं जहाँ से यात्री आते थे। उसके मन में एक अजीब सा मिश्रण था – आशा की एक किरण, और डर की एक गहरी, गूँजती हुई पीड़ा। कल रात फिर सेमुअल के घर पर इकट्ठा हुए थे, वे कुछ लोग जो ‘मार्ग’ पर चलने का साहस जुटा पाए थे। बातचीत के दौरान लूकास का चेहरा गम्भीर हो गया था जब उसने यरूशलेम से आई उन अफवाहों के बारे में बताया, जिनमें कहा जा रहा था कि मसीह की वापसी तो हो चुकी है, और अब सब कुछ समाप्त हो गया है। यह बात उन सबके मन में सन्देह की एक काली लकीर खींच गई थी। प्रताड़ना तो वैसे भी बढ़ती जा रही थी। कल ही मार्कस की दुकान के सामने लोग जमा हो गए थे, उसे ‘यहूदी-प्रेमी’ और ‘रोमन रीति-रिवाजों का तिरस्कार करने वाला’ कहकर चिल्लाते हुए। उसका सारा माल बिखेर दिया गया था। ऐसे में, वह सन्देश जो पौलुस ने दिया था, वह धुंधला पड़ता जा रहा था, मानो दूर पहाड़ों पर छाई कोहरे की चादर ने सूरज की रोशनी को ढक लिया हो।
तभी दूर, मार्ग के मोड़ पर, धूल का एक बादल उठा। एग्नाटियस का दिल जोर से धड़का। दो आकृतियाँ धीरे-धीरे स्पष्ट होती गईं – एक लम्बा, थका हुआ पथिक, और दूसरा जवान, सख्त दिखने वाला व्यक्ति। वे तिमुथियुस और सिलास थे। उनके चेहरे धूल और थकान से सने हुए थे, परन्तु आँखों में वही पुरानी, अडिग चमक बाकी थी। खबर फैल गई, और जैसे ही सूरज ढलने लगा, सेमुअल के घर के उस छोटे से कमरे में वही चेहरे जमा हो गए, जिन पर चिंता की रेखाएँ गहरी हो चुकी थीं। हवा में जैतून के तेल के दीपक की गंध और बेचैनी का सन्नाटा मिला हुआ था।
तिमुथियुस ने एक छोटा सा चमड़े का रोल निकाला। उसकी आवाज़ थकी हुई थी, पर शब्द स्पष्ट और वजनदार थे। “भाइयो और बहनो,” उसने कहा, “पौलुस, और सिल्वानुस, और मैं… हम सदैव तुम्हारे लिए परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं।” उसने रुककर उन चेहरों को देखा, जो प्रतीक्षा में थे। “तुम्हारा विश्वास अत्यधिक बढ़ रहा है, और तुम सबके प्रति तुम्हारा प्रेम भी।” लीदिया, जो एक कोने में चुपचाप बैठी थी, की आँखों में पानी आ गया। यह सुनना कि उनका संघर्ष व्यर्थ नहीं, उनकी निरंतर प्रार्थनाएँ, वे गुप्त मुलाकातें, डर के बावजूद एक-दूसरे की मदद करना – यह सब परमेश्वर की नज़र में है… इस सोच से उसके शरीर में एक गर्मी दौड़ गई।
पर फिर तिमुथियुस की आवाज़ गम्भीर हो गई। उसने उन सतावों और क्लेशों की बात की, जो वे सह रहे थे। “यह सब,” उसने कहा, उसका स्वर दृढ़ था, “इस बात का सबूत है कि परमेश्वर का न्याय धर्मी है। वह तुम्हें इस योग्य समझता है कि तुम उसके राज्य के लिए दुख सहो, जिसके लिए तुम सह रहे हो।” मार्कस, जिसकी पसलियों पर अभी भी कल के धक्कों के निशान थे, ने सिर उठाया। उसकी आँखों में अब केवल पीड़ा नहीं, बल्कि एक समझदारी भरा आश्चर्य था। उसका दुःख कोई दण्ड नहीं, बल्कि एक गवाही थी? एक तरह का इम्तिहान था जिसे वह पास कर रहा था?
और फिर आया वह भाग, जिसने कमरे की हवा को ही बदल दिया। तिमुथियुस ने उन शब्दों को पढ़ा, जो लौटते हुए प्रभु यीशु के विषय में थे – शक्तिशाली स्वर्गदूतों के साथ, आग की लपटों में प्रगट होते हुए। यह कोमल यीशु का चित्र नहीं था, बल्कि राजा का, न्यायी का था। “वह उन्हें दण्ड देगा जो परमेश्वर को नहीं पहचानते, और जो हमारे प्रभु यीशु के सुसमाचार को नहीं मानते।” शब्द कमरे में गूँजे। उन लोगों के लिए, जिन्होंने उनका मज़ाक उड़ाया था, जिन्होंने उन्हें धक्के दिए थे, जिन्होंने उन पर पत्थर फेंके थे – उनके लिए यह चित्र भयानक था। अनन्त विनाश, प्रभु के उस सामने से दूर, जो उसकी महिमा में प्रगट होगा।
किन्तु तिमुथियुस की आवाज़ फिर से कोमल हो गई। “पर हमारे लिए,” उसने कहा, और उसकी नज़र हर एक चेहरे पर गई, “जो विश्वास करते हैं, उस दिन आराम और शान्ति होगी। जब वह आएगा, तो अपने सभी पवित्र लोगों में महिमामय होगा, और तुममें भी – क्योंकि तुमने हमारी गवाही पर विश्वास किया।” ‘आराम’ शब्द हवा में ऐसे लहराया मानो कोई मरहम हो। एग्नाटियस ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसने कल्पना की – न कोई डर, न कोई छिपने की ज़रूरत, न धक्के, न अपमान। केवल एक गहरी, अथाह शान्ति, जैसे किसी थके हुए यात्री को लम्बी यात्रा के बाद अपने घर का द्वार मिल जाए।
पत्र समाप्त हुआ। कमरे में सन्नाटा था, पर अब वह बेचैनी का सन्नाटा नहीं था। यह एक पवित्र, गम्भीर चुप्पी थी। लीदिया ने धीरे से अपने बच्चे को सीने से लगा लिया, जो सो चुका था। मार्कस के चेहरे पर एक दृढ़ता आ गई थी, मानो उसने किसी ऐसी चीज़ का निर्णय कर लिया हो जिसे कोई छीन नहीं सकता। एग्नाटियस ने खिड़की से बाहर देखा। अंधेरा गहरा हो चुका था, और आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे – छोटे-छोटे दीपक, अनन्तता में जलते हुए। वह सोचने लगा। यह प्रतीक्षा व्यर्थ नहीं है। यह दुःख अर्थहीन नहीं है। प्रभु आएगा। वह न्याय करेगा। और वह दिन… वह दिन निश्चित ही आराम लेकर आएगा। उसने अपनी चादर ठीक की, और मन ही मन एक प्रार्थना कही – पौलुस, तिमुथियुस, और उन सबके लिए जो संसार में कहीं भी इसी आशा को थामे हुए थे। रात ठंडी थी, पर उसके भीतर एक ऊष्मा धीरे-धीरे फैल रही थी।




