कारागार की उस कोठरी में हवा तक जम गई लगती थी। नमी थी, जिसमें सड़न और मिट्टी की गंध रच-बस गई थी। यूसुफ को अब इसकी आदत सी हो गई थी। दिन बीतते थे, पर समय का अहसास धुंधला सा था। एक दिन, जेल के दरवाजे खुलने की आवाज़ सुनाई दी, और नए चेहरे अंदर धकेले गए। दो व्यक्ति, उनके कपड़े बता रहे थे कि वे कोई साधारण कैदी नहीं हैं, हालांकि अब उनकी हालत भी खस्ता थी। एक के हाथ में अंगूठियों के निशान थे, दूसरे की मुद्रा में एक अलग तरह का अभिमान टूटा हुआ दिख रहा था। पता चला, ये फिरौन के शाही भंडारी और प्रधान रसोइया थे। कोई अपराध, किसी षड्यंत्र में फंसकर आ गए थे।
कुछ दिन बीते। यूसुफ ने देखा, दोनों उदास बैठे हैं, मन में कोई बात पल रही है। वह उनके पास गया, शायद सेवा का कोई काम। भंडारी ने सिर उठाकर देखा, और बोला, “तुम… यूसुफ? सुना है तुम्हारी बातें। आज रात… एक अजीब स्वप्न देखा है मैंने। पर यहाँ कौन सुनता है स्वप्न की बातें?”
यूसुफ ने धीरे से कहा, “क्या स्वप्न देखा, महाशय?”
भंडारी ने बताना शुरू किया, उसकी आवाज़ में एक अजीब कंपन था। “स्वप्न में, मैं देख रहा हूँ… एक दाखलता। उस पर तीन शाखाएं हैं। और वे शाखाएं, जैसे कलियाँ फूटते ही फूल गईं, फिर अंगूर लग गए, पके हुए। और मेरे हाथ में… मेरे हाथ में फिरौन का प्याला है। मैं उन अंगूरों को निचोड़ता हूँ, और उस रस को फिरौन के प्याले में भरकर, उनके हाथों में दे देता हूँ।”
यूसुफ चुपचाप सुनता रहा। वह कुछ पलों तक खामोश रहा, मानो कोई बात सुन रहा हो जो केवल वही सुन सकता है। फिर बोला, “इस स्वप्न का अर्थ यह है कि तीन दिनों के भीतर फिरौन आपको फिर से याद करेगा। आपको कारागार से बाहर निकालकर, अपने पुराने पद पर, उनके प्याले को सौंपने के लिए बुलाया जाएगा। आप फिर से शाही भंडारी होंगे।”
भंडारी की आँखों में एक चमक आई, पर यूसुफ ने अपनी बात जारी रखी, उसकी आवाज़ गम्भीर थी। “पर जब आपकी भलाई हो, जब आप फिर से उस ऊँचे स्थान पर पहुँच जाएँ, तो एक बात याद रखना। मेरा स्मरण करना। मुझ पर दया दिखाना, और फिरौन से मेरे विषय में बात करना। क्योंकि मैं भी अन्यायपूर्वक, इस गड्ढे में से हिब्रू देश से उठा लाया गया हूँ। मैंने कोई अपराध नहीं किया है।”
भंडारी ने उत्साह से सिर हिलाया, वादे किए। इतने में रसोइया, जो चुपचाप सब सुन रहा था, बोल पड़ा। उसका चेहरा फीका था। “मैंने भी एक स्वप्न देखा है। और वह… वह अच्छा नहीं लगा। मैंने देखा, मेरे सिर पर तीन टोकरियाँ हैं, सफेद पकवान से ढकी हुई। सबसे ऊपर वाली टोकरी में, फिरौन के लिए बने हर प्रकार के पकवान हैं। पर पक्षी… आकाश के पक्षी उन्हें चोंच मार-मारकर खा रहे हैं।”
यूसुफ ने रसोइए की ओर देखा। उसकी आँखों में एक दुखद सच्चाई थी। वह बोला, धीरे से, पर स्पष्ट। “इस स्वप्न का अर्थ भी तीन दिन है। तीन दिनों के भीतर, फिरौन आपका सिर… आपके शरीर से अलग करवा देगा। और आपको एक पेड़ पर लटका दिया जाएगा, और पक्षी आपके मांस को चुगेंगे।”
कोठरी में सन्नाटा छा गया। रसोइया स्तब्ध था, उसकी साँसें रुक सी गईं। भविष्यवाणी कर दी गई थी। तीसरा दिन आया। फिरौन का जन्मदिन था। दावत हुई। और जैसा कहा गया था, वैसा ही हुआ। प्रधान रसोइया को फाँसी पर चढ़ा दिया गया, और शाही भंडारी को उसके पद पर बहाल कर दिया गया। उसने खुशी-खुशी अपना पद संभाल लिया। वह यूसुफ के वादों और उसकी मदद की बात भूल गया। शायद नई जिम्मेदारियों में, शायद डर से, या शायद सिर्फ इसलिए कि यूसुफ उसकी दुनिया से बाहर का एक साधारण कैदी था, जिसकी याद दिलाने की कोई जल्दी नहीं थी।
यूसुफ कोठरी में वापस रह गया। उसने किसी से कुछ नहीं कहा। उसने ऊपर देखा, उस छोटी सी खिड़की से आती रोशनी की किरण को देखता रहा। उसे विश्वास था। स्वप्न उसके द्वारा नहीं, परमेश्वर के द्वारा सुलझाए जाते थे। और जिसका हाथ उस पर था, वह उसे भूला नहीं था। भंडारी ने भुला दिया, पर एक दिन, फिरौन को एक स्वप्न आएगा। और तब… तब यह कोठरी भी उसकी गवाह बनेगी। हवा में नमी अब भी थी, पर यूसुफ के भीतर एक प्रतीक्षा थी, जो निराशा नहीं, एक गहरी शांति में डूबी हुई थी। समय आएगा। सब कुछ उसी के हाथ में है।




