यहोशू बूढ़ा हो चला था। उम्र के उस पड़ाव पर जहाँ शरीर में वह पहले वाली ताकत नहीं रहती, जहाँ हड्डियों में एक स्थिर थकान बस जाती है। शिलो के डेरे में बैठा, वह आसपास के शोरगुल से परे कुछ सुनने की कोशिश कर रहा था। लोग जश्न मना रहे थे, बहुत-सी ज़मीनें जीत ली गई थीं, पर उसके मन में एक अधूरापन था। ठीक वैसा ही जैसे कोई बड़ा काम करने के बाद भी सामने पड़ी छोटी-सी चीज़ आँखों में खटकती रहती है।
एक दिन, जब सांझ का सूरज पहाड़ियों को सुनहरा-लाल रंग दे रहा था, यहोशू को वह आवाज़ सुनाई दी। वह आवाज़ जो उसे यरीहो की दीवारों के सामने सुनाई दी थी, जो उसे गिबोन की ढलान पर चढ़ाती रही थी।
“तू बूढ़ा हो गया है,” आवाज़ ने कहा, “और अभी भी बहुत-सी भूमि लेने को शेष है।”
यहोशू का दिल एक पल को धड़क रुक सा गया। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। सामने एक नक्शा-सा तैरने लगा – उत्तर की ओर सिदोनियों का पहाड़ी इलाका, जहाँ लेबानान के देवदार के जंगल हवा में सरसराहट भरते थे। पूर्व की ओर बाशान के मैदान, जहाँ ओग नाम का राजा, उस विशालकाय राजा की स्मृति अब भी ताज़ा थी। दक्षिण में फिलिस्तीनियों का तटवर्ती भूभाग, जहाँ गाजा, अशदोद, और अश्कलोन के गढ़ अभी भी अपनी चुनौती बने हुए थे। पश्चिम में समुद्र तट के नगर, जहाँ व्यापारी जहाज़ लंगर डालते और दूर-दूर तक सफेद रेत फैली थी।
परमेश्वर की आवाज़ ने उससे कहा कि वह इस शेष भूमि को भी इस्त्राएल के गोत्रों में बाँट दे। “मैं स्वयं उनके सामने से इन सबको निकाल दूँगा,” वह आश्वासन था।
यहोशू ने अपनी पलकें खोलीं। उसकी उम्र के बावजूद, उसके चेहरे पर एक दृढ़ता लौट आई थी। उसने अपने सहायकों को बुलाया और उन सब गोत्रप्रमुखों का आह्वान किया जो अभी तक अपना पूरा भूभाग नहीं पा सके थे।
एक शाम, सभा जुटी। आग की लपटों की रोशनी में चेहरे उज्ज्वल दिख रहे थे। रूबेन, गाद और आधे मनश्शे के गोत्र के लोग, जिन्होंने यरदन नदी के पार के उपजाऊ मैदानों को अपना बसाया था, वे भी मौजूद थे। यहोशू ने उनकी ओर देखा। उसे याद आया कि कैसे मूसा ने उन्हें ये भूमि दी थी, इस शर्त पर कि वे अपने भाइयों के साथ तब तक लड़ें जब तक सबका काम न हो जाए। और उन्होंने वादा निभाया था। उनकी निष्ठा अटूट थी।
“तुम्हारा भाग तय है,” यहोशू ने उनसे कहा, उसकी आवाज़ में एक पिता जैसा स्नेह था। “अरनोन नदी से लेकर हेशबोन तक का पहाड़ी इलाका, मेदबा का मैदान, दीबोन, बामोत-बाल… यह सब तुम्हारा है।” उसने उन नगरों और गाँवों के नाम लिए, जो अब उनके घर थे। बेओर के पुत्र बिलाम की कहानी भी यहीं जुड़ी थी, जिसे मिड्यानियों ने मार डाला था। इतिहास और भूगोल एक दूसरे में गुंथे हुए थे।
फिर उसने लेवीयों की बात की। उसका स्वर गम्भीर हो गया। “लेकिन लेवी के गोत्र को कोई भूमि का भाग नहीं मिलेगा।” कुछ लोगों ने हैरानी से देखा। यहोशू ने समझाया, जैसे मूसा ने कभी समझाया था। “परमेश्वर स्वयं उनकी विरासत हैं। वे उसकी सेवा में रहेंगे, उसके निवास और वेदी की देखभाल करेंगे। बलिदानों की आग और प्रार्थनाओं का धुआँ ही उनकी भूमि होगी।”
अगले कई दिनों तक यहोशू ने नक्शे और स्मृति के सहारे भूमि का बँटवारा किया। उसने दक्षिण के रेगिस्तान की गर्म हवाओं का वर्णन किया, जहाँ अमालेकी भटकते थे। उसने उत्तर के बर्फ से ढके पहाड़ों का ज़िक्र किया, जहाँ हित्ती और सिदोनी रहते थे। हर गोत्र के लिए एक चुनौती थी, एक वादा था।
एक युवा प्रमुख ने पूछा, “लेकिन हे यहोशू, इन सब शक्तिशाली जातियों को कौन हराएगा? हम थके हुए हैं।”
यहोशू ने उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में एक चिंगारी दौड़ गई। “परमेश्वर ने कहा है, ‘मैं स्वयं उन्हें तुम्हारे सामने से निकाल दूँगा।’ तुम्हारा काम है विश्वास के साथ आगे बढ़ना, और उसकी आज्ञा के अनुसार भूमि का अधिकार लेना। बूढ़ा होने का अर्थ यह नहीं कि उसकी प्रतिज्ञाएँ बूढ़ी हो गई हैं।”
जब सभा समाप्त हुई, यहोशू डेरे से बाहर निकला। रात ठंडी थी, आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे कई साल पहले मोआब के मैदान में दिखते थे। एक ऊँची पहाड़ी पर खड़ा होकर उसने पश्चिम की ओर देखा – कनान की वह भूमि, जो अभी पूरी तरह उनकी नहीं हुई थी। उसमें अब भय नहीं, एक गहरी शांति थी। उसका काम पूरा होने को था, पर परमेश्वर का काम चलता रहता है। एक पीढ़ी की ज़िम्मेदारी दूसरी पीढ़ी को सौंपी जाती है। विश्वास की यह दौड़ एक स्थान पर समाप्त नहीं होती।
उसने एक लम्बी सांस ली। हवा में नमक और जलाई हुई लकड़ी की गंध थी। अभी बहुत काम बाकी था। अभी बहुत-सी भूमि लेने को शेष थी। पर अब वह निश्चिंत था। वह बूढ़ा योद्धा अपने तम्बू में लौट आया, यह जानकर कि इतिहास की पटकथा लिखने वाला कोई और है, और वह उसकी लिखी हुई पंक्तियों को साकार करने का केवल एक उपकरण है।




