पवित्र बाइबल

बिन्यामीन गोत्र का विवाह उपाय

वह साल था जब हमारी याददाश्तें अब भी धुँधली नहीं हुई थीं। हवा में जैतून के पेड़ों की सुगंध थी, और धूल हमारे चेहरों पर जमी रहती थी। मैं बूढ़ा हो चला हूँ, लेकिन उन दिनों की बातें… वे आँखों के सामने घूम जाती हैं, जैसे कल की ही बात हो।

यह सब उस युद्ध के बाद हुआ, जब बिन्यामीन के पुरुषों ने उस लेवी और उसकी पत्नी के साथ वह भयानक काम किया था। गुस्सा एक जंगल की आग की तरह सारे इस्राएल में फैल गया। ग्यारह गोत्र इकट्ठा हुए, और हमने शपथ खाई कि हम अपनी बेटियों का विवाह बिन्यामीन के लोगों से नहीं करेंगे। यह एक पक्की सौगंध थी, प्रभु के सामने। और फिर युद्ध हुआ… बिन्यामीन का सफाया सा हो गया। सिर्फ छ सौ मर्द बचे, जो रिम्मोन की चट्टानों में छिप गए। बाकी सब – औरतें, बच्चे, बूढ़े – सब खत्म।

जब गुस्सा ठंडा हुआ, तो एक सन्नाटा छा गया। लोग शीलो में, प्रभु के सामने, जमीन पर पड़े रोते थे। क्योंकि सच तो यह था कि एक गोत्र – बिन्यामीन – इस्राएल से मिटने के कगार पर था। और प्रभु के वादे? वह तो बारह गोत्रों से था। हमने अपने ही भाई को मिटा दिया था। सुबह से शाम तक चिल्लाहट और विलाप होता। “क्यों, हे इस्राएल के परमेश्वर? एक गोत्र इस्राएल में से क्यों मिट जाए?”

फिर उन्होंने जाँच की – किसने युद्ध में सम्मिलित नहीं होने की शपथ नहीं खाई थी? यबेश गिलाद का नाम सामने आया। वे लोग नहीं आए थे सभा में। तो हमारे योद्धाओं ने एक बार फिर तलवार उठाई, पर इस बार अपने ही लोगों के खिलाफ। यबेश गिलाद पर चढ़ाई हुई। हर पुरुष, हर विवाहित स्त्री… सब। सिर्फ चार सौ कुमारी कन्याएँ बचीं। उन्हें खींचता-घसीटता शीलो की ओर लाया गया, और उन बचे हुए छ सौ बिन्यामीनियों के सामने पेश किया गया। “लो, अपने लिए पत्नियाँ।”

पर चार सौ में तो छ सौ नहीं भरते। दो सौ पुरुष अभी भी अकेले थे। और वह सौगंध तो अब भी हमारे गले की हड्डी बनी हुई थी – कोई अपनी बेटी बिन्यामीन को नहीं देगा।

तब एक बूढ़े ने, जिसकी आवाज़ काँपती थी, सुझाव दिया। “शीलो में हर साल प्रभु के सम्मान में नाच होता है। और शीलो तो… वह एप्रैम के पहाड़ी प्रदेश में है। और हमने तो बिन्यामीन के लोगों से शपथ खाई थी, शीलो के लोगों से नहीं।”

एक हैरान कर देने वाली चुप्पी छा गई। फिर फुसफुसाहट शुरू हुई। यह तो… ठीक था? शब्दों के बीच का फर्क? पर आत्मा तो टूट चुकी थी। हमने उन दो सौ बिन्यामीनियों को समझाया। “जाओ, दाख की बारियों में छिपकर बैठो। जब शीलो की कन्याएँ नाचने निकलें, तो तुम निकल आना। हर एक अपने लिए एक कन्या पकड़ लेना। और अगर उनके पिता या भाई शिकायत करें, तो हम कहेंगे – हमारे लिए उनपर दया करो, क्योंकि युद्ध में हमने हर एक के लिए पत्नी नहीं जुटाई। और तुम लोगों ने उन्हें स्वेच्छा से नहीं दिया, इसलिए तुम निर्दोष हो।”

शब्द हवा में लटके रह गए। कितना घुमावदार तर्क था। कितना दुखद।

मैं वहाँ था, जब वे दो सौ पुरुष गए। चेहरे पर युद्ध के घावों के निशान, आँखों में एक खालीपन। वे दाख की बारियों में ओझल हो गए। और फिर जब ढोल बजे, और युवतियाँ सफेद वस्त्रों में नाचने लगीं, उनकी हँसती आवाज़ें हवा में गूँजीं… अचानक वे पुरुष निकले। चीखें गूँजीं। धूल का बादल उठा। और फिर सन्नाटा।

उन दो सौ कन्याओं को उनके नए पति, अजनबी, विजित पुरुषों के साथ बिन्यामीन के बचे हुए नगरों की ओर जाते देखा। कुछ रो रही थीं। कुछ स्तब्ध। कुछ के चेहरे पर तो समझ ही नहीं थी कि क्या हुआ।

हम सब वापस अपने-अपने तंबुओं और घरों को लौट आए। कोई जश्न नहीं था। कोई विजय नहीं। बस एक भारीपन था, जैसे प्रभु की आँखें हम पर थीं, और हम उनका सामना नहीं कर पा रहे थे।

बिन्यामीन बच गया था। बारह गोत्र फिर से पूरे हो गए थे। पर किस कीमत पर? शपथों के छलने से? निर्दोषों के खून से? और उन औरतों के जीवन से, जो केवल एक समस्या के हल का साधन बनकर रह गईं?

उन दिनों में इस्राएल में कोई राजा नहीं था। हर एक वही करता था, जो उसे ठीक लगता था। और कभी-कभी, जो ठीक लगता है, वह गहरा घाव छोड़ जाता है, जो पीढ़ियों तक रिसता रहता है। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि जब इंसान परमेश्वर की बात भूलकर, सिर्फ अपनी ही बुद्धि से चलता है, तो वह कितना उलझा हुआ, कितना दुखद रास्ता बना लेता है। और फिर भी, उसी उलझन के बीच से, परमेश्वर अपनी योजना को आगे बढ़ाता है। यही सबसे बड़ा रहस्य है। और सबसे बड़ा दुख भी।

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