पवित्र बाइबल

राजाओं का उत्थान पतन

यरूशलेम के राजमहल में सुबह की ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी। उज्जिय्याह, जिसे आजकल लोग अजर्याह कहते थे, अपने सिंहासन पर बैठा हुआ था। बाहर शहर जाग रहा था, पर उसके मन में एक अजीब बेचैनी थी। छत्तीस साल शासन कर चुका था वह, और अब शरीर में कोढ़ के चिन्ह उभरने लगे थे। यहोवा का मंदिर, जहाँ वह हर सुबह धूप जलाने जाता था, अब उसके लिए वर्जित हो गया था। अजर्याह ने आह भरकर खिड़की से बाहर देखा। नीचे यहोदा के लोग अपने-अपने काम में लगे हुए थे। वह सोच रहा था कि कैसे उसके पिता अमस्याह की मृत्यु के बाद, सोलह वर्ष की आयु में उसने राज्य संभाला था। पचास से अधिक वर्षों तक यहूदा पर शासन किया था उसने। पर आज, कोढ़ के कारण, उसे महल के एक अलग हिस्से में रहना पड़ रहा था। उसका पुत्र योताम अब राजकाज देख रहा था।

उधर इज़राइल के राज्य में, शोमरोन के महलों में अलग ही उथल-पुथल थी। यारोबाम का पुत्र जकर्याह सिर्फ छह महीने ही राज कर पाया था। एक दिन, जब वह महल के आँगन में अपने सैनिकों से बात कर रहा था, तभी शल्लूम नामक एक व्यक्ति, जो यबेस के लोगों में से था, भीड़ में से निकलकर आगे आया। उसके हाथ में तेज चाकू चमक रहा था। किसी को कुछ समझने का मौका भी नहीं मिला। जकर्याह की आँखों में आश्चर्य का भाव जम गया, और वह ढेर हो गया। यहोवा की वह भविष्यवाणी पूरी हुई, जो यहू द्वारा यारोबाम के वंश के बारे में कही गई थी – कि उसकी पीढ़ी चौथी पीढ़ी तक ही इज़राइल के सिंहासन पर टिक पाएगी।

शल्लूम ने स्वयं को इज़राइल का राजा घोषित कर दिया। पर उसका राज भी एक पूर्णिमा से दूसरी पूर्णिमा तक भी नहीं टिक पाया। मनहेम, जो तिर्सा से आया था, एक बड़ी सेना लेकर शोमरोन आ पहुँचा। शल्दूम तो जैसे खुद ही अपनी किस्मत को कोस रहा था। मनहेम के आदमियों ने महल को घेर लिया, और शल्लूम का अंत उसी तरह हुआ जैसे उसने जकर्याह का किया था। रक्त से सनी धरती शोमरोन की सत्ता की नश्वरता का प्रमाण दे रही थी।

मनहेम ने जब राजगद्दी संभाली, तो उसकी पहली चिंता अपनी स्थिति मजबूत करना था। तफ्त्स नगर ने, जो अपनी दीवारों के लिए प्रसिद्ध था, उसके आगे घुटने टेकने से इनकार कर दिया। इससे क्रोधित मनहेम ने पूरे नगर पर चढ़ाई कर दी। उसने न केवल नगर को जीत लिया, बल्कि एक एक कर गर्भवती स्त्रियों के पेट भी चीर डाले। यह क्रूरता इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई, एक ऐसा कृत्य जिसने उसके चरित्र को हमेशा के लिए कलंकित कर दिया।

इधर अस्सूर का साम्राज्य, जो उत्तर में फैला हुआ था, अपनी शक्ति बढ़ा रहा था। राजा पूल ने इज़राइल की ओर लालची नज़रों से देखना शुरू कर दिया था। मनहेम, जो अपनी सत्ता बचाना चाहता था, ने एक उपाय सोचा। उसने इज़राइल के सभी धनी लोगों से पचास-पचास शेकेल वसूले, और हज़ार टैलेंट चाँदी लेकर अस्सूर के राजा पूल के पास भेज दिए। इसके बदले में, पूल ने उसके राज्य को मान्यता दे दी और अपनी सेना वापस बुला ली। मनहेम को लगा कि उसने राजनीति में चतुराई दिखाई है, पर उसने यह नहीं सोचा कि उसने अपने ही लोगों का खून चूसकर एक विदेशी शक्ति को महज़ ख़रीदा था। दस साल तक वह शासन करता रहा, और फिर उसकी मृत्यु हो गई। उसका पुत्र पेकह्याह सिंहासन पर बैठा।

पेकह्याह दो साल भी शासन नहीं कर पाया। उसके अपने ही सेनापतियों में से एक, पेकह, जिसके पचास गिलादी सैनिक थे, ने विद्रोह कर दिया। एक दिन, जब पेकह्याह महल के ऊपरी कक्ष में आराम कर रहा था, तभी पेकह और उसके साथी अर्गोब और अर्ये के साथ अंदर घुस आए। संघर्ष ज्यादा देर नहीं चला। पेकह्याह के रक्षक भी कुछ न कर सके। यह इज़राइल का नियति बन चुका था – राजहत्या, रक्तपात, और अस्थिरता।

पेकह ने बीस साल तक शासन किया। उसके दिनों में भी यहोवा की दृष्टि में वह बुरा ही था। वह नबत के पुत्र यारोबाम के पापों से दूर नहीं हुआ, जिसने इज़राइल को पाप में डाल दिया था। उसके कार्यों ने इज़राइल को और भी कमजोर कर दिया।

यरूशलेम में वापस, अजर्याह का लंबा जीवन समाप्त हो गया था। उसे राजाओं की कब्र में दफनाया गया। उसका पुत्र योताम अब पूरी तरह से राजा बन गया। योताम अपने पिता से सबक लेकर चल रहा था। उसने यहोवा के मंदिर के ऊपरी फाटक का निर्माण करवाया, और ओपेल की शहरपनाह पर भी बहुत काम करवाया। वह यहोवा की दृष्टि में ठीक काम करता था, हालाँकि वह उस तरह से यहोवा की आराधना नहीं करता था जैसे दाऊद करता था। लोग अब भी अपनी पहाड़ियों पर बने उच्च स्थानों पर जाकर बलि चढ़ाते और धूप जलाते थे। योताम ने उन्हें रोका नहीं। उसने अम्मोन के लोगों पर विजय प्राप्त की, और उनसे भारी कर वसूला। उसका शासन मजबूत था, और यहूदा में कुछ स्थिरता दिखाई दे रही थी।

पर इज़राइल में, अंत आना तय था। राजा पेकह के दिन पूरे हो रहे थे। एक और सेनापति, होशे नाम के, ने विश्वासघात किया। उसने पेकह पर धावा बोल दिया, उसे मार डाला, और स्वयं राजा बन बैठा। यह अशूर के राजा तिगलत पिलेसेर के शासनकाल का बीसवाँ वर्ष था।

सब कुछ इतनी तेजी से बदल रहा था। राजा आते और जाते रहे। कुछ महीनों के लिए, कुछ वर्षों के लिए। हर कोई सत्ता की चमक में चूर हो जाता, पर यहोवा की आँखें सब कुछ देख रही थीं। इज़राइल के राजा, एक के बाद एक, यारोबाम के पापों को दोहराते रहे – सुनहरे बछड़ों की पूजा, उच्च स्थानों का निर्माण, और यहोवा की व्यवस्था से दूरी। हर हत्या, हर विद्रोह, उनके अपने ही किए का फल था।

योताम छब्बीस साल तक यहूदा पर राज करने के बाद सो गया, और उसे अपने पिता की कब्र में दफनाया गया। उसका पुत्र आहाज अब राजा बना। उत्तर में, इज़राइल का अंतिम अध्याय लिखा जा रहा था, जबकि यहूदा अभी भी टिका हुआ था, हालाँकि उसमें भी दरारें पड़ने लगी थीं।

शाम का सूरज शोमरोन के महलों के पीछे डूब रहा था। कहीं दूर, एक बूढ़ा लेवीय याजक अपने घर के दरवाजे पर बैठा, इन सब घटनाओं के बारे में सोच रहा था। उसने अपने जीवनकाल में कितने राजाओं को आते-जाते देखा था। उसकी आँखों में एक गहरा दुख था। वह जानता था कि यहोवा का धैर्य समाप्त हो रहा है। हवा में एक सनसनी थी, मानो कोई बड़ी आँधी आने वाली हो। इज़राइल के गिरजाघरों में सुनहरे बछड़े अभी भी चमक रहे थे, पर उनकी चमक खोखली लगती थी। असली शक्ति, असली राज्य, किसी और के हाथ में था। और इतिहास की पटकथा, पहले ही लिखी जा चुकी थी।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *