वह नदी के किनारे बैठा था, और पानी की धारा में उसका प्रतिबिंब टूट-टूट कर बह रहा था। हवा ठंडी थी, पर उसके मन की गर्मी से वह ठंड कहीं नहीं लग रही थी। दूर, उस पार के पहाड़ों पर बादलों का एक गहरा, स्लेटी रंग छाया हुआ था, जैसे स्वयं आकाश ही शोक मना रहा हो। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। कानों में अब भी गूँज रही थी वह आवाज़, वह प्रश्न, जो दिन-रात उसकी हड्डियों में कूट-कूट कर भरा हुआ था — “तेरा परमेश्वर कहाँ है?”
यह सवाल उसके लिए कोई नया नहीं था। उत्तरी राज्यों के लोगों ने, जब उन्होंने उसके शहर पर धावा बोला था, तब भी यही पूछा था। उनकी आँखों में अविश्वास और तिरस्कार का भाव था। और अब, इस दूर देश की नदी के किनारे, यही सवाल उसके अपने ही मन की आवाज़ बन गया था। वह एक लेवीवंशीय याजक था, और उसका सारा जीवन, उसकी सारी पहचान, सिय्योन के पर्वत, उस पवित्र नगर और वहाँ के मंदिर से बनी थी। और अब वह सब कहाँ था? धुएँ और धूल में मिल चुका था। वह स्वयं यहाँ, इस अजनबी धरती पर, एक बन्धुआ की तरह जी रहा था।
उसकी साँसों में एक कराहन सी उठी। “जैसे हिरनी पानी की धाराओं के लिए तरसती है, वैसे ही, हे परमेश्वर, मैं तेरे लिए तरसता हूँ।” ये शब्द उसके हृदय से निकले, बिना किसी सोच-विचार के। यह कोई प्रार्थना नहीं थी, यह तो एक चीख थी, एक ऐसी पुकार जो उसकी आत्मा के सबसे सूखे कोनों से निकल कर आ रही थी। उसे लगा जैसे उसका सारा अस्तित्व एक विशाल, सूखे मरुस्थल में तब्दील हो गया है, और वहाँ एक बूँद पानी के लिए उसकी आत्मा छटपटा रही है। परमेश्वर का विस्मरण — यही उसकी प्यास थी। उसकी उपस्थिति की स्मृति, वह आनन्द जो उसके भजन गाते समय उसके भीतर उमड़ता था, वह शान्ति जो पवित्र स्थान में मिलती थी — सब कुछ ऐसे छिन गया था जैसे किसी ने उसकी जीवन-रेखा ही काट दी हो।
उसने अपनी आँखें खोलीं। नदी का पानी शान्त चाल से बह रहा था, लेकिन उसके भीतर तो झर-झर का शोर मचा हुआ था। “मेरे आँसू दिन-रात मेरा भोजन बन गए हैं,” उसने फुसफुसाते हुए कहा। यह सच था। भोजन तो उसके सामने रखा जाता, पर उसकी ग्रासनली में तो एक कड़वाहट भर गई थी, जो केवल आँसुओं के स्वाद से ही धुलती थी। लोग कहते थे, “तेरा परमेश्वर कहाँ है?” और वह चुप रह जाता। उत्तर देना कैसे सम्भव था? वह स्वयं भी तो यही जानना चाहता था।
तभी, एक स्मृति, तीखी और स्पष्ट, उसके मन के परदे पर चमक उठी। वह बरसों पहले का दृश्य था। वह एक लड़का था, और भीड़ के साथ पर्वत की ओर चल रहा था। हजारों लोग, सबके चेहरे पर एक अद्भुत प्रफुल्लता, सब एक साथ गाते हुए, “चलो, हम यहोवा के घर को चलें!” उस दिन की हवा में भी एक मिठास थी, जैसे स्वयं सृष्टि ही उत्सव मना रही हो। और फिर वह दृश्य — विशालकाय द्वार, चाँदी के तुरहियों की ध्वनि, वेदी पर धूप की सुगन्ध, और वह गहन, दिव्य उपस्थिति जो सब कुछ में व्याप्त थी। उसने अपने हाथ बढ़ाए थे, और ऐसा लगा था जैसे वह स्पर्श कर सकता है उस अनन्त शक्ति को। वह आनन्द… वह आनन्द अब कहाँ था?
स्मृति का यह झोंका एक तूफान बन गया। अब वह अपने आप से बातें करने लगा। “मेरी आत्मा, तू क्यों उदास है? और तू मुझ में क्यों बैचैन है?” यह एक तरह का आत्म-साक्षात्कार था। वह अपनी ही टूटी हुई आत्मा को समझाने की कोशिश कर रहा था। “परमेश्वर की बाट जोह; क्योंकि मैं अब भी उसका धन्यवाद करूँगा, जो मेरे मुख का उद्धार और मेरा परमेश्वर है।”
पर यह विश्वास, यह आशा, एक नाव की तरह थी जो भीषण लहरों में डगमगा रही थी। एक पल में वह उस पर टिकता, दूसरे ही पल वह डूबते हुए अनुभव करता। उसकी स्थिति ऐसी थी जैसे कोई गहरे समुद्र में डूब रहा हो, और ऊपर से भारी लहरें उस पर टूट रही हों। “तूने मुझे भुला दिया है,” यह विचार एक सुई की तरह चुभता। “मैं शोक मनाता हुआ शत्रु के उत्पीड़न के कारण क्यों चला फिरूँ?” वह जानता था कि परमेश्वर ही उसकी चट्टान है, फिर भी उस चट्टान से वह अब दूर क्यों महसूस कर रहा था? यह विरोधाभास, यह आंतरिक युद्ध, उसे थका देता था।
दिन ढलने लगा। नदी का पानी सुनहरे और लाल रंग में नहा गया। दूर के पहाड़ों पर बादल अब भी मंडरा रहे थे, और उनकी गर्जना दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी। बादल गरजते, बिजली कड़कती। प्रकृति का यह प्रचण्ड रूप उसके भीतर के कोलाहल से मेल खाता प्रतीत होता था। “यहोवा अपनी करुणा के दिन अपनी ओर से आज्ञा देगा,” उसने कहा, और उसके शब्द हवा में खो गए। यह एक दृढ़ विश्वास की घोषणा थी, या फिर एक डूबते हुए व्यक्ति का आखिरी सहारा? वह स्वयं भी नहीं जानता था।
रात हो आई। आकाश में तारे टिमटिमाने लगे, ठंड और बढ़ गई। उसने अपने चारों ओर एक ओढ़नी और लपेट ली। अँधेरे में, उसकी आत्मा फिर से बोल उठी। “मेरी आत्मा, तू क्यों उदास है? और तू मुझ में क्यों बैचैन है?” यही प्रश्न, फिर से। पर इस बार, उत्तर में कोई शब्द नहीं आया। केवल एक निश्चलता, एक प्रतीक्षा। वह जानता था कि उसकी प्यास, उसका दुख, उसकी यह सारी उथल-पुथल, एक ही स्थान की ओर इशारा कर रही है — उस परमेश्वर की ओर, जिसने उसे बनाया था। भले ही वह उसे महसूस न कर पा रहा हो, भले ही लहरें उसे डुबोने पर आमादा हों, पर वह चट्टान अभी भी वहीं थी।
उसने अपना सिर घुटनों पर रख लिया। आँसू फिर आ गए, पर अब वे केवल दुख के नहीं थे। उनमें एक समर्पण भी था। “मैं अब भी उसका धन्यवाद करूँगा,” उसने दोहराया, और इस बार यह वाक्य उसकी आत्मा में गूँजा। यह विश्वास का एक दीपक था, जो भीषण अँधेरे में एक टिमटिमाती लौ जलाए हुए था। वह नहीं जानता था कि सुबह क्या लाएगी। शत्रु की हँसी अभी भी जारी रहेगी, उसका दिल अभी भी टूटा रहेगा। पर उसने एक बात तय कर ली थी — वह चुप नहीं रहेगा। वह पुकारता रहेगा। क्योंकि उसकी प्यास ही सबूत थी कि पानी कहीं न कहीं अवश्य है। और उस पानी का स्रोत, उसका परमेश्वर, चाहे कितनी भी दूर क्यों न प्रतीत हो, अन्ततः उसकी ही आत्मा का उद्धारकर्ता था।
वह वहीं, नदी के किनारे, उसी अँधेरे में बैठा रहा, अपनी टूटी हुई आत्मा को परमेश्वर के हाथों में सौंपे हुए, उसकी प्रतीक्षा में, बिना किसी दृश्यमान आशा के, पर फिर भी आशा करते हुए।




