पवित्र बाइबल

स्तुति का असली रहस्य

सूरज ढलने लगा था, और आकाश में केसरिया और बैंगनी रंग फैल रहे थे। नदी किनारे बैठा वह बूढ़ा, एलिय्याह, अपनी लकड़ी की सहारे वाली छड़ी को रेत में धीरे-धीरे घुमा रहा था। उसकी आँखों में एक दूर की चमक थी, जैसे कोई पुरानी याद ताज़ा हो रही हो। उसने एक लम्बी साँस ली और अपने पास बैठे युवा शिष्य, मीका, की ओर देखा।

“तुम जानना चाहते हो कि सच्ची स्तुति क्या है, है न?” एलिय्याह की आवाज़ में घर्षण था, समय और अनुभव की रेत लगी हुई। “यह कोई शब्दों का खेल नहीं है। न ही यह केवल खुशी के पलों का गीत है। यह तो… वह पहला ध्यान है जब तुम्हें एहसास होता है कि तुम्हारी सारी ताकत धोखा है, और उसकी दया ही सच्चा आश्रय।”

मीका ने ध्यान से सुना। उसने देखा कि गुरु की निगाहें नदी के उस पार जाती हुई लग रही थीं, जहाँ जंगल का घना अँधेरा शुरू होता था।

“मैं एक बार उस जंगल में खो गया था,” एलिय्याह ने कहना शुरू किया, उसकी आवाज़ अब एक कहानी की लय में ढलने लगी। “नौजवान था, अभिमान से भरा हुआ। लोग कहते थे मेरे पास परमेश्वर का वरदान है, मैंने सोचा यह मेरी अपनी योग्यता है। एक सख्त यात्रा पर निकला, बिना किसी सलाह के, बस अपने विश्वास पर। और फिर… फिर रास्ता भटक गया। बारिश होने लगी, ऐसी भयंकर बारिश कि आकाश फटा जा रहा था। अँधेरा इतना गहरा कि हाथ को हाथ सूझना मुश्किल। मैं एक पेड़ के नीचे दुबका, भीगा, काँपता हुआ। डर नहीं लग रहा था, गुस्सा आ रहा था। मैं चिल्लाया, ‘तू कहाँ है? मैंने तेरी सेवा की है!'”

एलिय्याह ने रुककर अपना खुरदुरा हाथ बढ़ाया और नदी से थोड़ा पानी लेकर पिया। “लेकिन जवाब में केवल बारिश की आवाज़ थी, और जंगल की सिसकी। फिर, धीरे-धीरे, जब मेरी सारी हवा निकल गई, जब मैं थककर चुप हो गया… तभी वह हुआ। एक आवाज़ नहीं, कोई दर्शन नहीं। बस… एक ज्ञान। एक स्पष्टता, जैसे कोई बादल हट गया हो। मैंने महसूस किया कि मैं जिसके सामने गुस्सा कर रहा था, वही इस बारिश को बना रहा है, ये पेड़ बना रहा है, और यह नन्हीं चींटी भी जो मेरे हाथ पर रेंग रही थी। उसकी महिमा इतनी विशाल, और मैं इतना तुच्छ। और तब, मेरे होंठ अपने आप खुले। मैंने कहा, ‘मैं तेरा धन्यवाद करूंगा… मैं तेरी स्तुति करूंगा।’ यह डर से नहीं, न ही इनाम की आशा से। यह उस सत्य के सामने झुक जाने से था। उसकी करुणा और सच्चाई, वह प्रतिज्ञा जो उसने की है, वह मेरे छोटेपन से कहीं बड़ी है।”

मीका ने पूछा, “फिर क्या हुआ, गुरु?”

“फिर?” एलिय्याह मुस्कुराया, उसके चेहरे की झुर्रियाँ और गहरी हो गईं। “फिर कुछ ख़ास नहीं। बारिश रुकी नहीं, रास्ता तुरंत नहीं मिला। लेकिन मेरे भीतर एक शांति आ गई। जैसे कोई बच्चा, जो भटक गया हो, उसे यह ज्ञान हो गया हो कि उसके पिता की नज़र उस पर है, भले ही वह उन्हें देख न पा रहा हो। सुबह हुई, और एक बंदरों का झुंड शोर मचाता हुआ गुज़रा। मैंने उनका पीछा किया, और वे मुझे एक रास्ते पर ले आए जो गाँव को जाता था। लेकिन असली मुक्ति तो उस रात ही हो गई थी, जब मैंने अपनी पूरी नज़ाकत में उसके सामने सिर झुकाया था।”

उसने अपना सिर हिलाया, जैसे आश्चर्य में हो। “स्तुति का रहस्य यही है। जब तू दुख में हो, तब भी उसकी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रह। वह दूर से ही सही, तुझे सामर्थ्य देगा। वह दीनों को देखता है, अभिमानियों से दूर रहता है। मेरे जीवन में, मैंने देखा है। जब भी मैंने अपनी मुट्ठी खोली और कहा ‘तेरी इच्छा पूरी हो’, तो उसने मुझे ऐसी बुलंदियों पर पहुँचाया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। और उसकी करुणा… वह कभी समाप्त नहीं होती। तू जो कुछ भी है, उसके सामने ले आ। डर, कमज़ोरी, शर्म। उसके सामने सच्चा बन। तब तेरे होंठों से निकली हर स्तुति, हर धन्यवाद, उस तक एक मधुर गंध की तरह पहुँचेगा।”

अब अँधेरा पूरी तरह छा गया था। पहला तारा टिमटिमा रहा था। एलिय्याह ने छड़ी का सहारा लेकर खड़े होने की कोशिश की। मीका ने उसका हाथ पकड़कर सहारा दिया।

“चलो,” बूढ़े ने कहा। “स्तुति सिर्फ शब्द नहीं है। यह जीवन जीने का ढंग है। इस नदी की धारा की तरह, जो हमेशा बहती है, चाहे कोई देखे या न देखे। उसके प्रेम की धारा भी ऐसी ही है। हमेशा।”

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