पवित्र बाइबल

पापी नगर की दिव्य चेतावनी

यरूशलेम की सड़कें उस गर्मी में तपती थीं, जैसे कोई अदृश्य आग नगर की नींव तक को भस्म करने पर तुली हो। हवा में धुआँ था, न कि युद्ध का, बल्कि मन्दिर से उठते हब्बे-हब्बे बलि-पशुओं के चमड़े के जलने की गन्ध, जो भक्ति के नाम पर एक नियमित, नीरस कर्मकाण्ड बनकर रह गया था। शहर की चहारदीवारी के भीतर जीवन अपनी धुन में मस्त था। बाजारों में सौदागर जोर-जोर से मोलभाव कर रहे थे, और सिक्कों की खनखनाहट उस सामूहिक स्वर में मिल जाती थी जो यह दर्शाने को काफी था कि राजा उज्जिय्याह के मरणोपरान्त भी, रोजमर्रा का चक्का बिना रुके घूम रहा था।

लेकिन हवा में एक और चीज़ थी। एक तिक्तता, जैसे खराब हो चुके फल का स्वाद। यह उन चेहरों में दिखती थी जो मन्दिर की ओर जाते समय भी उदासीन थे। यह उन हाथों में थी जो भेंट चढ़ाते थे परन्तु मन से कहीं और भटक रहे होते थे। यहूदा और यरूशलेम, वे दाखलता जिसे स्वयं परमेश्वर ने रोपा था, अब बेकार की डालियों से लदी हुई थी, और उसके फल में एक अजीब सी सड़न समाई हुई थी।

एक व्यक्ति, यशायाह, शहर के किनारे एक ऊँचे स्थान पर खड़ा था। उसकी आँखें, जो सामान्यतः गहरी चिंतनशील होती थीं, आज एक विचित्र ज्वाला से भरी हुई थीं। वह सब कुछ देख रहा था — झूठी भक्ति का नाटक, विधवाओं के प्रति अन्याय, अनाथों की दुहाई को अनसुना करते हुए शासक वर्ग। उसे एक स्वप्न सा दिखाई दिया, या यूँ कहो कि एक दर्शन जो स्वप्न से भी अधिक स्पष्ट था। वह देख रहा था कि ये लोग, ये विशेषाधिकार प्राप्त लोग, कैसे एक बीमार शरीर की भाँति हो गए थे। सिर से लेकर पैर तक, कोई अंग ऐसा नहीं बचा था जो तंदुरुस्त हो। घाव, फोड़े, पीप से भरे चोट के निशान — सब खुले थे, बिना मरहम-पट्टी के, और हवा उनमें संक्रमण भर रही थी।

वह मन्दिर की ओर मुड़ा। वहाँ भीड़ थी। बलि की वेदी पर रक्त की धाराएँ बह रही थीं। याजक व्यस्त थे, उनके वस्त्र भव्य थे, उनके हावभाव पवित्र थे। परन्तु यशायाह के कानों में एक और आवाज़ गूँज रही थी, जो उनकी प्रार्थनाओं से कहीं ऊपर, आकाश को चीरती हुई सी आ रही थी। वह आवाज कह रही थी — “इन बलिदानों से मेरा जी भर गया है। मैं मेढ़ों की होम-बलियों, और मेद के धुएँ से प्रसन्न नहीं होता। बैलों, मेम्नों, बकरों का लहू देखने को मेरी आत्मा घृणा करती है।”

यह घोषणा इतनी भयानक थी कि यशायाह का शरीर सुन्न हो गया। परमेश्वर अपनी ही भक्ति से, अपने ही नियमित कर्मकाण्ड से ऊब गया था! यह कैसे संभव था? तब वह आवाज फिर गूँजी, धीमी पर स्पष्ट — “अपने हाथ धो लो, अधर्म से अपने को पवित्र करो। बुरे काम करना छोड़ो, भलाई करना सीखो। अन्याय करने वालों से न्याय चाहो, अनाथ का हक दिलाओ, विधवा की सुनो।”

यशायाह नीचे उतरा और शहर की गलियों में चल पड़ा। उसकी आवाज अब मन्दिर के गूँजते भवन तक सीमित नहीं थी। वह लोगों के बीच खड़ा होकर बोला। उसके शब्द कविता की तरह नहीं, बल्कि एक चेतावनी की तरह थे, जैसे किसी आने वाले तूफान की पहली ठंडी हवा के झोंके।

“सुनो, तुम अधर्म के अगुवाओ! तुम उस दाखलता के रक्षक हो जिसे तुम ही नष्ट कर रहे हो। तुम्हारे उत्सव? मेरी दृष्टि में वे बोझ हैं। मैं उन्हें सह नहीं सकता। तुम नए चाँद के उत्सव मनाओ, सब्त का दिन मनाओ, पर मेरी आत्मा उनसे विमुख है। तुम्हारे हाथ खून से रंगे हैं!”

लोग रुककर देखते, कुछ हँसते, कुछ चिंतित होते। कोई कहता, “यह फिर कौन सा पागल है?” पर यशायाह रुका नहीं। उसने उनकी ओर इशारा किया जो समाज में सबसे कमजोर थे। “देखो,” उसकी आवाज दर्द से भरी थी, “यह अनाथ तुमसे न्याय माँगता है, और तुम उसे दो कोड़े देते हो। यह विधवा तुमसे दया चाहती है, और तुम उसकी जमीन हड़प लेते हो। और फिर तुम मन्दिर आकर झुकते हो? क्या तुम समझते हो कि वह सब देखने वाला अंधा है?”

फिर, अचानक, उसके स्वर में एक विचित्र कोमलता आ गई, जैसे कोई चिकित्सक रोगी से बात कर रहा हो जिसका अंत समीप है। “आओ,” उसने कहा, “हम आपस में निपटारा कर लें। यदि तुम्हारे पाप लाल रंग के भी हों तो वे हिम के समान श्वेत हो जाएँगे। यदि तुम राजी हो और आज्ञा मानो, तो देश की उत्तम वस्तुएँ भोगोगे। पर यदि मना करोगे और विद्रोह करोगे, तो तलवार से खाए जाओगे।”

उस दिन सूर्य अस्त होते समय एक अजीब शान्ति छा गई। मन्दिर से धुआँ उठना बन्द हो गया था। शहर में सन्नाटा फैला था, जैसे कोई बड़ी गर्जना के बाद का मौन हो। यशायाह की बातें हवा में लटकी रह गई थीं — एक प्रस्ताव, एक चुनौती। परमेश्वर ने अपनी प्रजा को दो रास्ते दिखा दिए थे: शुद्धिकरण की अग्नि, या पुनर्निर्माण की कृपा। नगर की दीवारें, जो सुरक्षा का भ्रम देती थीं, अब एक न्यायी की दृष्टि में खुली किताब की तरह लग रही थीं। और कहीं दूर, एक भविष्य की झलक दिखाई दे रही थी — जहाँ सिय्योन धर्म के बदले न्याय से, और यरूशलेम विश्वासयोग्यता से बचे रह जाएँगे। शेष सब, उस बेकार की दाखलता की डालियों की तरह, आग के हवाले कर दिया जाएगा। रात की हवा में अब भी बलि-पशुओं की गन्ध थी, पर उसमें एक नई सी गन्ध, लोहे और आग की, मिल गई थी।

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