पवित्र बाइबल

विश्वास का विस्तार

(यह कहानी यशायाह 33 के भाव और विषयों पर आधारित एक कल्पनाशील विस्तार है, जो ऐतिहासिक संदर्भ में एक मूल कथा प्रस्तुत करती है।)

हवा में जलने की गंध थी। दूर, अश्शूरियों के शिविर की आग से उठता धुआँ, काले बादलों की तरह पश्चिमी आकाश को धुंधला किए दे रहा था। यरूशलेम की शहरपनाह पर खड़े एलिय्याह की आँखें उस धुएँ को टकटकी बाँधे देख रही थीं, पर उसका मन शहर के भीतर हलचल कर रही भीड़ में भटक रहा था। भय, अफवाहों और टूटी हुई प्रार्थनाओं का एक समंदर था वह।

कुछ महीने पहले तक, एलिय्याह मिस्र के साथ गठबंधन की बातों पर उत्साह से चर्चा करता था। “हमें अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी,” वह कहता, “देखो, फ़िरौन की सेना कितनी विशाल है। वे हमारे लिए सहारा बनेंगे।” पर अब, जब अश्शूर के राजा शल्मनेसर की सेनाओं ने सारे गढ़ों को चूर-चूर कर दिया था, तब वे सारी बातें खोखली लग रही थीं। मिस्र की ओर से कोई सहायता नहीं आई थी, केवल चांदी के लालच में भेजे गए दूत आए थे, जो अब तक खाली हाथ लौट चुके थे। एलिय्याह को अपने ही शब्द याद आते – “वे ऐसे हैं जैसे टूटी हुई नाव, जिस पर भरोसा करना मृत्यु को न्योता देना है।”

एक दिन, शहर के फाटक के पास भीड़ जमा थी। एक बूढ़ा भविष्यद्वक्ता, जिसके कपड़े सादे और आँखें आग की तरह जलती थीं, चिल्ला रहा था। “हमने शांति के लिए धोखेबाज़ों से समझौता किया! हमने छुटकारे के लिए लुटेरों पर भरोसा किया! अब काटने वाले की कमाई खेतों में आग की लपट बनकर रह गई है। सुनो, यहोवा क्या कहता है: ‘मैं अब उठ खड़ा होऊँगा, मैं अब ऊँचा हो जाऊँगा। तुम्हारी सांसें घास के समान होंगी, तुम्हारा तन भटकती ज्वाला सा भस्म हो जाएगा!'”

भीड़ में सन्नाटा छा गया। एलिय्याह की रूह काँप उठी। यह कोई साधारण धमकी नहीं थी। इसमें एक विचित्र न्याय का भाव था – जो लुटेरा है, वह अब लूटा जाएगा। जो धोखेबाज़ है, उसके साथ धोखा होगा। पर भविष्यद्वक्ता की आवाज़ नरम पड़ गई, जैसे बारिश की पहली बूंदें गिर रही हों। “पर हे सिय्योन के रहने वालो, जो यहोवा पर भरोसा रखते हो, तुम्हारे लिए एक राजा अपनी सुन्दरता में दिखाई देगा। तुम दूर-दूर तक फैली हुई भूमि को देखोगे। तुम्हारा हृदय पुरानी आश्चर्यकथाओं की स्मृति से भर जाएगा।”

इन शब्दों ने एलिय्याह के भीतर एक तड़प पैदा की। ‘दूर-दूर तक फैली हुई भूमि’ – क्या यह उजाड़ पहाड़ियों और जलते हुए खेतों का विवरण था? या कोई और ही दृष्टि थी? उस रात, जब शहर में अंधेरा और डर का साम्राज्य था, एलिय्याह ने अपने छोटे से घर की छत पर बैठकर प्रार्थना की। उसकी प्रार्थना में शब्द नहीं थे, केवल एक गहरी प्यास थी – उस सत्य के लिए जो टल नहीं सकता, उस सुरक्षा के लिए जो टूट नहीं सकती।

कुछ हफ्ते बाद, एक अजीब घटना घटी। अश्शूरी सेना, जो यरूशलेम को घेरे हुए थी, अचानक बीमार पड़ने लगी। छावनी में रोज़ मौत का तांडव होता। कहा जाता कि आकाश की एक रात में, यहोवा का दूत उतरा और उसने उन शक्तिशाली योद्धाओं को ऐसी विचित्र नींद सुला दिया, जिससे वे कभी नहीं जागे। सुबह होते-होते, डर का वह पहाड़, जो शहर के सामने खड़ा था, मिट्टी के ढेर में तब्दील हो गया। लाशों के ढेर लगे थे। चीख़ें सुनाई देना बंद हो गईं। केवल एक भयानक खामोशी थी।

शहर के लोग डरते-डरते दीवारों से बाहर झाँके। उन्होंने देखा कि वह भूमि, जो कल तक शत्रु के डेरों से अटी पड़ी थी, आज खाली और विस्तृत थी। और तब एलिय्याह को उस भविष्यद्वक्ता के शब्द समझ आए – ‘दूर-दूर तक फैली हुई भूमि’। यह विनाश का विस्तार नहीं, बल्कि मुक्ति का विस्तार था। एक ऐसा स्थान जहाँ शत्रु का नामोनिशान नहीं था।

उसके बाद के दिनों में, शहर में एक नया चलन शुरू हुआ। लोग अब केवल मंदिर ही नहीं जाते थे। वे एक-दूसरे के घरों में जमा होते, बूढ़ों से व्यवस्था की पवित्र बातें सुनते। चोरी और झूठी गवाही धीरे-धीरे गायब होने लगी। एक नई ईमानदारी का राज्य स्थापित हो रहा था। एलिय्याह अक्सर उस पहाड़ी पर जाता, जहाँ से यरूशलेम का विहंगम दृश्य दिखता। अब उसे वह शहर केवल पत्थरों का ढेर नहीं लगता था। वह एक ‘अटल निवास’ दिखता, एक ‘शान्तिपूर्ण निवास-स्थान’, जैसे भविष्यद्वक्ता ने कहा था। उसकी नींव अब मनुष्यों के बनाए गठबंधनों पर नहीं, बल्कि उस अटल प्रतिज्ञा पर टिकी थी, जो सभी प्रतिज्ञाओं से ऊपर थी।

एक शाम, जब सूरज पहाड़ियों के पीछे डूब रहा था और आकाश में सुनहरी और लाल रेखाएँ फैली हुई थीं, एलिय्याह ने अपने बेटे से कहा, “सीखना, बेटा। सच्चा राजा वह नहीं जिसके पास सबसे बड़ी सेना है। सच्चा राजा वह है जिसकी उपस्थिति ही तुम्हारे भीतर के डर को जलाकर राख कर दे, और तुम्हारी आँखों के सामने ऐसा विस्तार खोल दे, जिसमें केवल उसकी ही सुन्दरता दिखाई दे।”

हवा फिर से बह रही थी, पर अब उसमें जलने की गंध नहीं थी। केवल जैतून के पेड़ों की हल्की सी खुशबू थी, और दूर, यरदन नदी के जल की तरोताजा कर देने वाली सुगंध।

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