खंडहरों के बीच बैठा एलियाकीम अपनी लाठी को रेत में घुमा रहा था। शाम की लाली दीवारों के अधजले पत्थरों पर पड़ रही थी, और हवा में धूल के साथ-साथ एक उदासी भी थी, जो बाबुल से लौटे इस छोटे से झुंड के साथ चली आई थी। वह यहाँ, इस पहाड़ी पर, अपने पुरखों के शहर के खोल में बैठा था, पर लगता था जैसे वह शहर अभी भी कैद में है। लोग लौटे तो थे, पर उनकी आत्माओं पर जंग लगी हुई थी।
उसकी बूढ़ी आँखें उन घरों की ओर देख रही थीं जिन्हें फिर से बसाया जा रहा था। कुछ युवक पत्थर ढो रहे थे, कुछ स्त्रियाँ चूल्हे जला रही थीं। पर एलियाकीम को दिख रहा था वह दूसरा हिस्सा, वह टेढ़ा रास्ता जो शहर के किनारे की ओर जाता था। वहाँ, एक पुराने बाल देवता के उसी टूटे हुए मंदिर के सामने, कुछ लोग इकट्ठा थे। उन्होंने उसकी जगह फिर से साफ की थी। वह सुबह की बात थी जब उसने देखा था – ज़दोक का बेटा, मनश्शे, एक सफेद बकरे को ले जा रहा था, और उसके पीछे कुछ और युवा चल रहे थे। उनके चेहरे पर एक अलग तरह का उत्साह था, गुप्त और उत्तेजित। वे उन बागों में जाते, जहाँ पुरानी मूर्तियाँ छिपी पड़ी थीं, और वहाँ घंटों रहते। रात को अजीब गंध हवा में आती – मांस की, और कुछ और की, जिसे एलियाकीम पहचानता था – विदेशी धूप की।
एलियाकीम का सिर दर्द करने लगा। वह यहोवा का नाम फुसफुसाया, पर उसका मन भारी था। क्या यही वापसी थी? क्या यही वह वाचा थी? वे लोग, उसकी ही भाई-बंधु, पत्थरों और पेड़ों के पीछे भाग रहे थे, उन देवताओं को पुकार रहे थे जिन्होंने उन्हें कभी नहीं सुना। वह सोचता, “वे कब्रों में बैठकर गुप्त बातें करते हैं, सुअर का मांस रखकर पात्रों में भोजन करते हैं, और एक-दूसरे से कहते हैं, ‘तू मेरे पास रह, और मुझे छू नहीं, क्योंकि मैं तेरे लिए पवित्र हूँ।’” ये शब्द उसके मन में किसी सुदूर स्मृति की तरह उठे, जैसे कोई पुराना गीत जो अचानक कंठ में फंस गया हो।
एक दिन, जब वह शहर के बाहर एक छोटी सी खेतिहर ज़मीन पर बैठा था जिसे वह फिर से उपजाऊ बनाने की कोशिश कर रहा था, तब उस पर एक विचित्र सी नींद छा गई। नींद नहीं, एक तरह की जागृत दर्शन की अवस्था। उसे लगा जैसे आकाश चीख रहा है। कोई आवाज़ नहीं थी, पर एक गूँज थी, एक दर्द जो हवा में कंपन पैदा कर रहा था। और फिर उसे स्पष्ट सुनाई दिया – “मैंने अपनों को पुकारा, और उन्होंने उत्तर नहीं दिया। मैंने कहा, ‘देख, मैं यहाँ हूँ, देख, मैं यहाँ हूँ।’”
एलियाकीम की साँस रुक गई। यह उसका प्रभु था, उसका परमेश्वर, और उसकी वाणी में एक ऐसा विषाद था जो किसी माँ के दर्द से कम नहीं लगता था, जिसका बेटा उससे मुँह फेरकर चला गया हो। वह दृश्य बदला। अब वह उन लोगों को देख रहा था जो उन पहाड़ियों पर मूर्तियों के सामने धूप जलाते थे। परमेश्वर की वाणी गरजी – “ये लोग मेरी नाक के सामने धूप जलाते हैं। वे बागों में बलि देते हैं और ईंटों पर धूप जलाते रहते हैं। देख, मैं उनके कर्मों के अनुसार, उनके और उनके पितरों के पापों के अनुसार उन्हें दण्ड दूँगा।”
एलियाकीम का हृदय डूब गया। न्याय। शब्द इतना भारी था। पर तभी, उस दर्शन में, एक कोमल मोड़ आया। बादलों के पार से, जैसे सूर्य की पहली किरण रात को चीरती है, एक और स्वर आया, शांत और दृढ़। “परन्तु जो मेरी खोज में रहते हैं, उनके लिए मैं कुछ और कहता हूँ।”
और फिर एलियाकीम ने देखा। उसने अपने ही खेत को देखा, पर वह खेत अब जैसे स्वर्ग का हिस्सा था। अंगूर के बेल इतने लदे हुए थे कि दाखरस के कुण्ड उफान दे रहे थे। जिस ज़मीन पर आज वह मुश्किल से कुछ अनाज उगा पाता था, वहाँ उज्ज्वल हरियाली फैली थी। उसने शिमशोन को देखा, जिसका बेटा बीमारी से सूखकर कांटा हो गया था, अब एक दृढ़ युवक की तरह अपने बच्चों के साथ खेलते हुए। उसने मिरियम को देखा, जिसकी आँखें रोते-रोते खराब हो गई थीं, अब वह हँस रही थी, और उसकी आँखों में जवानी की चमक लौट आई थी। एक आवाज़ गूँजी – “वे बनाएंगे और दूसरा उजाड़ेगा, ऐसा नहीं होगा। वे बनाएंगे और बसाएंगे। वे दाख की बारियां लगाएंगे और उनका फल खाएंगे।”
फिर सबसे अद्भुत दृश्य। पहाड़ियाँ धुंधली पड़ गईं, और एक नया आकाश, एक नई पृथ्वी, उसकी आँखों के सामने प्रकट हुई। यह उसकी पहाड़ी थी, पर उसमें कोई पीड़ा नहीं थी। कोई रोने की, पुकारने की आवाज़ नहीं। भेड़िए और मेम्ना साथ-साथ चर रहे थे, और सिंह भूसा खा रहा था। एक छोटा बच्चा, बिना किसी डर के, एक बिल्ली के समान शांत रहने वाले सर्प के बिल के पास खेल रहा था। और लोगों के चेहरे… उनके चेहरे पर वह तनाव नहीं था जो एलियाकीम ने अपनी पीढ़ी के हर व्यक्ति में देखा था। एक शांति थी, गहरी और पूर्ण, जैसे किसी ने उनके भीतर के सभी युद्धों को शांत कर दिया हो।
आवाज़ फिर आई, और इस बार वह सीधे एलियाकीम के हृदय में उतर रही थी। “देख, मैं नया आकाश और नई पृथ्वी रचने पर हूँ। पहली बातें स्मरण न रहेंगी, और सोच-विचार में न लाई जाएंगी। परन्तु तुम मेरे चुने हुए लोग मेरे नाम पर आनन्दित और मगन रहोगे।”
दर्शन धीरे-धीरे विलीन हो गया। एलियाकीम अपनी ज़मीन पर वापस आ गया। शाम ढल रही थी, और पहाड़ियों पर ठंडी हवा चलने लगी थी। पर अब उसके भीतर कुछ बदल गया था। उसका डर, उसकी उदासी, वह सब एक दूर की याद की तरह हो गया था। उसने अपने हाथ में मिट्टी उठाई। वह सूखी और बंजर थी। पर एलियाकीम के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। उसने उस मिट्टी को निहारा, जैसे वह कोई बहुमूल्य रत्न हो।
वह धीरे-धीरे उठा, और अपनी लाठी का सहारा लेकर वह उस पहाड़ी के किनारे पर गया जहाँ से पूरा यरूशलेम दिखाई देता था। खंडहर अब भी वहाँ थे। उस टेढ़े रास्ते पर आग की लपटें दिखाई दीं – वे फिर से अपनी गुप्त पूजा में लगे होंगे। पर एलियाकीम का हृदय अब दुखी नहीं था। एक अटूट आशा ने उसे सहारा दिया। परमेश्वर ने देख लिया था। वह जानता था। और वह कार्य करेगा।
उसने आकाश की ओर देखा, जहाँ पहले तारे टिमटिमा रहे थे। वह नया आकाश अभी नहीं आया था। पर वह आने वाला था। और जब तक वह नहीं आता, तब तक एलियाकीम के पास करने को काम था। उसे इस बंजर ज़मीन में बीज बोने थे। उसे उन लोगों से बातें करनी थीं जो भटक गए थे। उसे याद दिलाना था कि उनका परमेश्वर अब भी पुकार रहा है – “देख, मैं यहाँ हूँ।”
उसने एक लम्बी साँस ली, और हवा में अब धूल के साथ-साथ संभावना की एक सुगंध भी थी। वह मुड़ा, और अपने झोपड़े की ओर चल पड़ा। रात हो रही थी, पर उसके कदमों में एक नई स्फूर्ति थी। अँधेरा गहर




