उन दिनों की बात है, जब शोमरोन का पहाड़़ अभी भी हरा-भरा था, और उसकी तलहटी में बसा इज़राइल का राज्य, एक लहलहाती दाख की बारी की तरह फैला हुआ था। लोग कहते थे कि उसकी उपज इतनी भरपूर थी कि दूर-दूर से लोग उसे देखने आते। पर मैं, एक बूढ़ा आदमी, उन दिनों को याद करता हूं तो मन भारी हो जाता है। क्योंकि जिस ज़मीन ने इतना दिया, उस पर खड़े होकर हमने क्या किया?
हमारे पास सब कुछ था। खेतों में गेहूं की बालियाँ इतनी भारी थीं कि डंठल झुक जाते। जैतून के पेड़ों से तेल की धार बहती। और हमारे देवता? उनकी संख्या इतनी बढ़ गई थी कि कोई गिनती नहीं रख पाता। हर चौराहे पर एक मूर्ति, हर ऊँचे टीले पर एक बलिपीठ। मुख्य था तो वह बेत-अवेन का सुनहरा बछड़ा। क्या शानदार मंदिर था उसका! शोमरोन के मैदान में चमकता हुआ, लोगों की आशाओं का केंद्र। लोग दूर-दूर से चलकर आते, सोना-चाँदी चढ़ाते, और मानते कि यही उनकी समृद्धि का राज है। उनके राजा, ओह, उनकी तो बात ही क्या… वे सिंहासन पर बैठे रहते, षड्यंत्र रचते, और लोगों से वचन लेते कि उनके देवताओं ने ही उन्हें यह राज दिया है।
पर जब बारिश कम हुई, और आकाश लोहे की तरह चमकने लगा, तो लोगों के चेहरे बदलने लगे। वे और भी ज़्यादा बलिदान देने लगे। और फिर वह वसंत आया, जब खेतों में काम शुरू होना था। लेकिन जुताई करने वाले बैलों की जगह, हमने क्या देखा? हमारे ही राजा के सिपाही, हमारे ही खेतों से सबसे उम्दा, सबसे ताकतवर बैलों को खींचते हुए ले जा रहे थे। “यह बलिदान के लिए चाहिए,” उन्होंने कहा। “तभी देवता प्रसन्न होंगे और बारिश देगें।” उस दिन मेरे पिता ने, जो बहुत बूढ़े हो चले थे, अपनी लाठी ज़मीन पर पटकी और कहा, “जिस बैल से हम जुताई करते हैं, उसी की बलि? यह देश अब दाख की बारी नहीं, काँटों का जंगल बन जाएगा।”
और ऐसा ही हुआ। वह प्रसिद्ध बेत-अवेन का मंदिर, जिस पर हमें इतना घमंड था, उसकी महिमा धूमिल होने लगी। लोगों के मन में डर घर कर गया। वे कहते, “कहीं उसका भारी सोने का बछड़ा हमसे दूर न हो जाए।” दूर? वह तो हमसे दूर जाने वाला था ही। अस्सुरिया के लोग आए, उनकी सेना बादलों की तरह घिर आई। उन्होंने हमारे देवता को, उस सोने-चाँदी के ढेर को, तोड़ा-फोड़ा, और लूटकर ले गए। जिसे हमने अपनी शक्ति माना, वह हमें बचा न सका। बल्कि, हमारी शर्म का कारण बन गया।
तब हमें याद आया प्रभु की बातें। हमारे पूर्वजों ने जिस परमेश्वर के सामने प्रण किया था, उसे हमने कब का भुला दिया था। अब हमारे पास क्या बचा? टूटे हुए बलिपीठ के पत्थर, जो खेतों में बिखरे पड़े थे, जैसे कोई कब्रिस्तान हो। और डर… इतना गहरा डर कि लोग पहाड़ियों से कहते, “हमें ढक लो। हमें इन फलों-फूलों वाली पहाड़ियों के नीचे दफना दो। क्योंकि जो पाप हमने किया है, उसकी सजा अब सिर पर आ गई है।”
सच तो यह है कि हमने जो बोया था, वही काट रहे थे। अधर्म का बीज बोकर हमने अनर्थ की फसल काटी। अब हमारी ज़मीन रोएगी, हमारे खेत बंजर होंगे। क्योंकि हमने वह जुताई नहीं की जो करनी चाहिए थी – अपने हृदय की कठोर ज़मीन को नर्म करने की, सच्चाई बोने की। हमने काँटे बोए थे, और अब काँटों में ही उलझकर रह गए।
पर इतने सब के बाद भी, एक आशा की किरण बची है। शायद, जब यह सब टूट चुकेगा, जब हमारा घमंड चूर-चूर हो जाएगा, तब हम फिर से विनम्र होकर उस एक सच्चे परमेश्वर की ओर मुड़ेंगे। और शायद, तब वह फिर से आएगा, और हमें उसके साथ चलना सिखाएगा। यही हमारी अंतिम, टिमटिमाती आशा है। बस, यही।




