पवित्र बाइबल

हबक्कूक का विश्वास संघर्ष

हबक्कूक उस ऊँची पहाड़ी पर खड़ा था जहाँ से यरूशलेम के पत्थर घरों की छतें और मंदिर का शिखर दिखाई देते थे। दिन ढल रहा था, और पश्चिमी आकाश में सिंदूरी लपटें फैल रही थीं, मानो आग सुलग रही हो। पर उसके मन में शांति नहीं थी, बल्कि एक गहरी, कसकने वाली पीड़ा थी, जो साँसों में घुलकर हर विचार को कड़वा बना देती थी।

वह प्रार्थना के लिए वहाँ गया था, पर उसके होंठों से कोई मधुर स्तुति नहीं निकली। उसकी आवाज़, जो आम दिनों में लोगों को न्याय और दया का पाठ पढ़ाती थी, आज एक कराहन बन गई थी। “यहोवा,” उसने कहा, हवा में बात करते हुए, “मैं कब तक पुकारता रहूँगा, और तू नहीं सुनता? हिंसा देखकर मैं तुझे पुकारता हूँ, पर तू बचाता नहीं?”

उसकी नज़र नीचे शहर पर पड़ी। बाज़ारों में लालच और छल-कपट का बोलबाला था। न्याय करने वाले न्याय के लिए तरसते थे, और दुष्ट अपनी बुराई में मग्न थे। कानून, जो परमेश्वर की देन था, अब तोड़े-मरोड़े जाने लगा था, जैसे कोई मलमल का बारीक कपड़ा मोटे हाथों में फट जाता है। विवाद और झगड़े ने शांति को निगल लिया था। हबक्कूक के लिए, यह सब केवल सामाजिक अराजकता नहीं थी; यह एक आध्यात्मिक त्रासदी थी, ऐसा लगता था मानो परमेश्वर ने अपनी आँखें मूँद ली हों।

दिनों तक, हफ्तों तक, यही उसका दुख रहा। वह मंदिर के आँगन में जाता, बलिदान की सुगंध उसके वस्त्रों में समा जाती, पर उसका हृदय निराशा से भरा रहता। अन्य भविष्यद्वक्ता बड़ी-बड़ी भविष्यवाणियाँ करते, पर हबक्कूक सरल, कड़वे सवालों में उलझा रहता: क्यों? कब तक?

फिर एक दिन, जब वह अपनी छोटी कोठरी में बैठा परमेश्वर के वचन पर मनन कर रहा था, कुछ हुआ। यह कोई जोरदार आवाज़ या दर्शन नहीं था, बल्कि उसके भीतर एक ज्ञान की लहर दौड़ गई, जैसे नदी का पानी सूखे खेत को अचानक भर देता है। परमेश्वर ने उत्तर दिया। और वह उत्तर हबक्कूक की अपेक्षा से कहीं अधिक भयानक और विचलित करने वाला था।

“देखो, जाति-जाति में तुम्हारी आँखें उठाकर देखो, और अचम्भा करके चकित हो जाओ,” परमेश्वर का सन्देश था। “क्योंकि मैं तुम्हारे दिनों में एक ऐसा काम करने पर हूँ, कि यदि कोई उसे बताया जाए, तो भी उसका विश्वास न होगा।”

परमेश्वर एक नए साधन को उठा रहा था – कसदियों। उसने उन्हें एक दण्ड की छड़ी के रूप में चुना था। हबक्कूक के मन में उस जाति की छवि उभर आई: घोड़ों पर सवार, बर्बर, अधीर, अपनी शक्ति पर घमंड करने वाले। वे रेगिस्तान के बवंडर की तरह आएँगे, न्याय या दया की कोई चिंता किए बिना। उनके लिए बंदी और मृत्यु में कोई अंतर नहीं होगा; वे सब कुछ लूट लेंगे, बर्बाद कर देंगे।

हबक्कूक स्तब्ध रह गया। यह कैसा उत्तर था? क्या परमेश्वर उससे भी अधिक बुरे लोगों को अपने लोगों को सज़ा देने के लिए चुन सकता है? यह तो ऐसा था जैसे किसी बीमार को ठीक करने के लिए उसे और भी घातक जहर दे दिया जाए। उसने कल्पना की – कसदी सैनिक, उनके भाले और ढाल चमकते हुए, यरूशलेम की दीवारों पर चढ़ते हुए। उसने उनके घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनने का दावा किया, जो धरती को कंपा देती थी। उनका अपना धर्म उनकी शक्ति था, उनका अपना घमंडी देवता, और वे उसकी पूजा हिंसा के द्वारा करते थे।

यह विचार असह्य था। पहले तो हबक्कूक ने समझा था कि परमेश्वर उनके पापों के लिए यहूदा को सुधारेगा, शायद सूखे या महामारी के द्वारा। पर इतनी निर्दयता? क्या परमेश्वर मौन रहकर, इस भयानक न्याय को होते हुए देखेगा? क्या वह उन दुष्टों को, जो मछली पकड़ने के जाल की तरह लोगों को इकट्ठा करते हैं, बिना रोक-टोक अपना काम करने देगा?

उसकी प्रार्थना अब शिकायत से आगे बढ़कर एक गहन, दर्द भरी जिरह बन गई। “तू जो निर्मल आँखों वाला है, वह बुराई को क्यों देखता रहेगा?” उसने पूछा। वह चट्टान के किनारे पर बैठ गया, उसके हाथ काँप रहे थे। यह एक ऐसी पहेली थी जिसने उसकी आस्था की जड़ों को हिला दिया था। परमेश्वर का न्याय, अगर वह इतना भयानक और समझ से बाहर है, तो फिर वह न्याय है या केवल निर्मम शक्ति का प्रदर्शन?

शाम की हवा ठंडी होने लगी थी। अँधेरे ने धीरे-धीरे घाटी को अपने आगोश में लेना शुरू कर दिया। हबक्कूक के मन में तूफान था, पर उसके भीतर एक संकल्प भी जगा था। उसने फैसला किया कि वह इससे भागेगा नहीं। वह प्रार्थना के अपने स्थान पर वापस आएगा। वह परमेश्वर के इस उत्तर को, इस भयानक रहस्य को, अपने हृदय में रखेगा। शायद, उत्तर उसी क्षण न मिले, शायद वह इसे कभी पूरी तरह न समझ पाए, पर वह चुप नहीं रहेगा। वह अपनी पुकार जारी रखेगा, जैसे कोई रात-रात भर जागता हुआ प्रहरी, प्रभात की प्रतीक्षा करता है। क्योंकि उसका विश्वास, अब एक सरल विश्वास न रहकर, एक संघर्षशील, जिरह करने वाला विश्वास बन गया था – और शायद, यही वह पुकार था जिसे परमेश्वर सुनना चाहता था।

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